UGC Row: 'बिना सलाह के फैसले लेना सरकार की आदत', कपिल सिब्बल ने यूजीसी नियमों के साथ RTI पर भी कही ये बात
UGC Row: यूजीसी के नए संसदीय नियमों पर विवाद के बीच कपिल सिब्बल ने सरकार पर बिना परामर्श फैसले लेने का आरोप लगाया। सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर अंतरिम रोक लगाते हुए उन्हें अस्पष्ट बताया है। हालांकि छात्रों के विरोध के बीच सरकार ने भरोसा दिया है कि भेदभाव नहीं होगा।
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यूजीसी के संसदीय नियमों को लेकर जारी विवाद के बीच राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि सरकार का किसी से सलाह-मशविरा न करने का रवैया उसके हर फैसले में दिखाई देता है। सिब्बल ने चेतावनी दी कि समाज के किसी भी वर्ग को नजरअंदाज करना देश के भविष्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है।
सिब्बल ने एक इंटरव्यू में कहा कि यूजीसी के नए संसदीय नियमों पर मामला उच्चतम न्यायालय में लंबित है, इसलिए इस पर सीधे टिप्पणी करना उचित नहीं होगा। लेकिन व्यापक दृष्टिकोण से उन्होंने कहा कि भारत तभी विकसित राष्ट्र बन सकता है, जब हर वर्ग को साथ लेकर नीतियां बनाई जाएं। उन्होंने कहा कि समाज में विभाजन पैदा करने वाली कोई भी कोशिश देश के हित में नहीं है।
यूजीसी पर क्या बोले सिब्बल?
सिब्बल ने कहा कि 2014 से जब भारत सरकार में मौजूदा नेतृत्व आया, तब से नीतियां बिना व्यापक चर्चा के बनाई जा रही हैं। उनके अनुसार, सरकार अपने विचार किसी से साझा नहीं करती और यही प्रवृत्ति हर बड़े फैसले में नजर आती है। उन्होंने कहा कि भारत जैसे विविधता वाले देश में सभी समुदायों की चिंताओं को ध्यान में रखना जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक
शीर्ष अदालत ने हाल ही में यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के 2026 के संसदीय रेगुलेशंस पर अंतरिम रोक लगा दी। अदालत ने कहा कि नियम पहली नजर में अस्पष्ट हैं, इनके परिणाम बहुत व्यापक हो सकते हैं और समाज पर खतरनाक असर डाल सकते हैं। कोर्ट ने केंद्र और यूजीसी से 19 मार्च तक जवाब मांगा है। इन याचिकाओं में कहा गया है कि नियमों में जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा सीमित कर दी गई है।
आरटीआई पर कही ये बात
- कपिल सिब्बल ने आर्थिक सर्वेक्षण में सूचना के अधिकार (आरटीआई) कानून की समीक्षा की बात पर चिंता जताई।
- उन्होंने कहा कि सूचना का अधिकार अधिनियम लोकतंत्र का एक बुनियादी अधिकार है।
- आरटीआई के जरिए नागरिकों को सरकार के कामकाज की जानकारी मिलती है।
- सिब्बल के अनुसार, यह कानून पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करता है।
- उन्होंने चेतावनी दी कि अगर इस अधिकार को सीमित किया गया, तो समाज को बड़ा नुकसान हो सकता है।
क्या हैं यूजीसी के नए नियम?
13 जनवरी को अधिसूचित इन नियमों के तहत सभी उच्च शिक्षण संस्थानों को भेदभाव की शिकायतों की जांच और समानता बढ़ाने के लिए 'संसदीय कमेटी' बनाना अनिवार्य किया गया है। इन समितियों में ओबीसी, एससी, एसटी, दिव्यांग और महिलाओं के प्रतिनिधियों को शामिल करने का प्रावधान है। ये नियम 2012 के पुराने दिशानिर्देशों की जगह लाए गए हैं, जो केवल सलाहात्मक प्रकृति के थे।
छात्रों का विरोध के बीच सरकार का आश्वासन
कई राज्यों में छात्र संगठनों ने इन नियमों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किए हैं। इस बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भरोसा दिलाया कि किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा और नियमों का दुरुपयोग नहीं होने दिया जाएगा। अदालत ने भी माना है कि याचिकाओं में कानून से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल उठाए गए हैं।
