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Lok Sabha Polls: बंगाल में मुस्लिम है बड़ा फैक्टर, लोकसभा की 42 में से 13 सीटों पर हार-जीत करते हैं तय
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सार
वैसे तो पश्चिम बंगाल में पूरे साल राजनीतिक पार्टियां मुस्लिम वोट बैंक को लेकर काफी चर्चा में रहती हैं। ऐसे में जब चुनाव का मौसम आते ही इसकी चर्चा और तेज हो गई है। 2011 की जनगणना के मुताबिक पश्चिम बंगाल में 27.1 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है।
मुस्लिम हैं बंगाल की राजनीति का बड़ा फैक्टर।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
एक तरफ जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या में भगवान राम लला की प्राण प्रतिष्ठा कर रहे थे तो दूसरी तरफ अयोध्या से काफी दूर पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मुस्लिम बहुल इलाके पार्क सर्कस इलाके में सर्व धर्म समारोह का आयोजन कर रही थीं। साथ ही सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस को खरी-खरी सुना रही थीं। भाजपा हमेशा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर आरोप लगाती रही है कि मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए वे सुबह 'जय मां काली' का जाप करेंगी और शाम को मुस्लिम रैलियों में भाग लेंगी।
वैसे तो पश्चिम बंगाल में पूरे साल राजनीतिक पार्टियां मुस्लिम वोट बैंक को लेकर काफी चर्चा में रहती हैं। ऐसे में जब चुनाव का मौसम आते ही इसकी चर्चा और तेज हो गई है। 2011 की जनगणना के मुताबिक पश्चिम बंगाल में 27.1 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। लोकसभा की 42 में से 13 और विधानसभा की 294 सीटों में से करीब सौ सीटों पर इनका प्रभाव है। इसलिए बंगाल में मुस्लिम फैक्टर को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। भले ही कांग्रेस या वाममोर्चा इसमें सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी मुस्लिम वोट बैंक को बिखरने से रोकने के लिए कमर कस ली है। दूसरी ओर भाजपा को भी इस बार सबका साथ और सबका विकास से आस है।
इन जिलों में है सबसे अधिक मुस्लिम
इस समय बंगाल कुल आबादी में मुस्लिम आबादी का लगभग 28 प्रतिशत से अधिक हैं। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में सबसे अधिक मुस्लिम आबादी है। यहां पर 66.8 प्रतिशत और इसके नंबर आता है मालदा जिले का, जहां 51.27 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। इसके अलावा चार और जिलों, उत्तर दिनाजपुर में 49.92 प्रतिशत, बीरभूम में 37.06 प्रतिशत, दक्षिण 24 परगना में 35.57 प्रतिशत और उत्तर 24 परगना में 30 प्रतिशत से अधिक आबादी है। उल्लेखनीय है कि बांग्लादेश की सीमा से लगने वाले जिलों में मुस्लिमों की आबादी ज्यादा है और दबदबा है। भाजपा हमेशा इन जिलों में अवैध घुसपैठ का आरोप लगाती रही है और तृणमूल पर वोट बैंक के लिए इन बांग्लादेशी घुसपैठियों को तृणमूल संरक्षण देने का भी आरोप लगाती रही है। घुसपैठियों ने कथित तौर पर वोटर कार्ड से लेकर राशन, आधार कार्ड व पासपोर्ट जैसे दस्तावेज तक बना लिए हैं, जो चुनाव में अहम रोल निभाते हैं। सीएसडीएस-लोकनीति पोस्ट पोल विश्लेषण के अनुसार, 2021 के चुनावों में 10 में से लगभग 8 मुसलमानों ने टीएमसी को वोट दिया।
13 लोकसभा सीटों पर असर, कांग्रेस पर प्रहार
राज्य के करीब 42 लोकसभा सीटों में से सात लोकसभा सीटें मुस्लिम बहुसंख्यक हैं। छह ऐसी सीटें हैं जहां पर मुस्लिम वोटर निर्णायक हो सकते हैं। इस तरह से देखें तो 13 लोकसभा और करीब सौ विधानसभा की सीटों पर मुस्लिम वोटरों का असर साफ दिखाई देता है। 2019 लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने सात मुस्लिम बहुल सीटों में से तीन पर जीत हासिल की थी, जबकि बड़ी मुस्लिम बहुल वाली सभी छह सीटों पर जीत हासिल की थी। इस बीच जब राहुल गांधी की न्याय यात्रा मुर्शिदाबाद और मालदा जिलों में पहुंची तो ममता बनर्जी ने कांग्रेस पर तीखा प्रहार करते हुए कहा था, सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी 40 सीटें भी जीत नहीं पाएगी। यह मुस्लिम फैक्टर का ही असर है कि बंगाल में तृणमूल ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया। ताकि कहीं मुस्लिम कुनबा बिखर नहीं जाए।
...और वे ही बने तृणमूल के कोर वोटर
2011 में सत्ता में आने के बाद से तृणमूल कांग्रेस राज्य में मजबूत होती गई। इसके लिए अल्पसंख्यक समुदाय के साथ को नकारा नहीं जा सकता। इसी 22 जनवरी को ममता बनर्जी ने मंच से अल्पसंख्यक वोटरों को किसी अन्य को वोट देकर अपना वोट बर्बाद नहीं करने की अपील की थी। तृणमूल से पहले वाम दल राज्य में मजबूत थे, लेकिन 2007 में रिजवानुर रहमान का केस सामने आया। उसके बाद 2006 और 2008 नंदीग्राम और सिंगूर से तृणमूल का ग्राफ बढ़ने लगा। लोकप्रियता ऐसी बढ़ी कि गठबंधन के बावजूद कांग्रेस और वाम कुछ खास नहीं कर पाए।
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वैसे तो पश्चिम बंगाल में पूरे साल राजनीतिक पार्टियां मुस्लिम वोट बैंक को लेकर काफी चर्चा में रहती हैं। ऐसे में जब चुनाव का मौसम आते ही इसकी चर्चा और तेज हो गई है। 2011 की जनगणना के मुताबिक पश्चिम बंगाल में 27.1 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। लोकसभा की 42 में से 13 और विधानसभा की 294 सीटों में से करीब सौ सीटों पर इनका प्रभाव है। इसलिए बंगाल में मुस्लिम फैक्टर को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। भले ही कांग्रेस या वाममोर्चा इसमें सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हों, लेकिन तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी मुस्लिम वोट बैंक को बिखरने से रोकने के लिए कमर कस ली है। दूसरी ओर भाजपा को भी इस बार सबका साथ और सबका विकास से आस है।
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इन जिलों में है सबसे अधिक मुस्लिम
इस समय बंगाल कुल आबादी में मुस्लिम आबादी का लगभग 28 प्रतिशत से अधिक हैं। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में सबसे अधिक मुस्लिम आबादी है। यहां पर 66.8 प्रतिशत और इसके नंबर आता है मालदा जिले का, जहां 51.27 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। इसके अलावा चार और जिलों, उत्तर दिनाजपुर में 49.92 प्रतिशत, बीरभूम में 37.06 प्रतिशत, दक्षिण 24 परगना में 35.57 प्रतिशत और उत्तर 24 परगना में 30 प्रतिशत से अधिक आबादी है। उल्लेखनीय है कि बांग्लादेश की सीमा से लगने वाले जिलों में मुस्लिमों की आबादी ज्यादा है और दबदबा है। भाजपा हमेशा इन जिलों में अवैध घुसपैठ का आरोप लगाती रही है और तृणमूल पर वोट बैंक के लिए इन बांग्लादेशी घुसपैठियों को तृणमूल संरक्षण देने का भी आरोप लगाती रही है। घुसपैठियों ने कथित तौर पर वोटर कार्ड से लेकर राशन, आधार कार्ड व पासपोर्ट जैसे दस्तावेज तक बना लिए हैं, जो चुनाव में अहम रोल निभाते हैं। सीएसडीएस-लोकनीति पोस्ट पोल विश्लेषण के अनुसार, 2021 के चुनावों में 10 में से लगभग 8 मुसलमानों ने टीएमसी को वोट दिया।
13 लोकसभा सीटों पर असर, कांग्रेस पर प्रहार
राज्य के करीब 42 लोकसभा सीटों में से सात लोकसभा सीटें मुस्लिम बहुसंख्यक हैं। छह ऐसी सीटें हैं जहां पर मुस्लिम वोटर निर्णायक हो सकते हैं। इस तरह से देखें तो 13 लोकसभा और करीब सौ विधानसभा की सीटों पर मुस्लिम वोटरों का असर साफ दिखाई देता है। 2019 लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने सात मुस्लिम बहुल सीटों में से तीन पर जीत हासिल की थी, जबकि बड़ी मुस्लिम बहुल वाली सभी छह सीटों पर जीत हासिल की थी। इस बीच जब राहुल गांधी की न्याय यात्रा मुर्शिदाबाद और मालदा जिलों में पहुंची तो ममता बनर्जी ने कांग्रेस पर तीखा प्रहार करते हुए कहा था, सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी 40 सीटें भी जीत नहीं पाएगी। यह मुस्लिम फैक्टर का ही असर है कि बंगाल में तृणमूल ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया। ताकि कहीं मुस्लिम कुनबा बिखर नहीं जाए।
...और वे ही बने तृणमूल के कोर वोटर
2011 में सत्ता में आने के बाद से तृणमूल कांग्रेस राज्य में मजबूत होती गई। इसके लिए अल्पसंख्यक समुदाय के साथ को नकारा नहीं जा सकता। इसी 22 जनवरी को ममता बनर्जी ने मंच से अल्पसंख्यक वोटरों को किसी अन्य को वोट देकर अपना वोट बर्बाद नहीं करने की अपील की थी। तृणमूल से पहले वाम दल राज्य में मजबूत थे, लेकिन 2007 में रिजवानुर रहमान का केस सामने आया। उसके बाद 2006 और 2008 नंदीग्राम और सिंगूर से तृणमूल का ग्राफ बढ़ने लगा। लोकप्रियता ऐसी बढ़ी कि गठबंधन के बावजूद कांग्रेस और वाम कुछ खास नहीं कर पाए।