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नक्सलवाद मुक्त भारत: 60 साल में कैसे नौ राज्यों से चंद जिलों तक सिमटा, किन कदमों से हुआ इसका सफाया?
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: Kirtivardhan Mishra
Updated Mon, 30 Mar 2026 06:39 PM IST
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सार
गृह मंत्री अमित शाह की तरफ से 2024 में नक्सलवाद के अंत के लिए 31 मार्च 2026 की डेडलाइन निर्धारित की गई थी। इसके बाद से ही रेड कॉरिडोर के नाम से जाना जाने वाले नक्सल प्रभावित क्षेत्र तेजी से घटा है। बड़ी संख्या में प्रमुख नक्सल कमांडरों को मार गिराया गया है, वहीं हजारों की संख्या में नक्सल कैडरों का आत्मसमर्पण हुआ है।
अमित शाह ने बताए देश में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के आंकड़े।
- फोटो : अमर उजाला/AI
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विस्तार
बीते करीब छह दशक से नक्सलवाद भारत के लिए सबसे बड़ी आंतरिक चुनौती बना हुआ था। हालांकि, 31 मार्च (मंगलवार) इस बड़े खतरे के अंत की घोषणा का दिन साबित हो सकता है। दरअसल, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 2024 के मध्य में छत्तीसगढ़ में हुई कुछ बैठकों में इस तारीख को नक्सलवाद के अंतिम दिन के तौर पर तय करने का प्रण लिया था। इसके बाद से ओडिशा से लेकर छत्तीसगढ़ और झारखंड से लेकर आंध्र प्रदेश तक न सिर्फ नक्सली नेतृत्व को ध्वस्त किया गया, बल्कि कैडर के कैडर का सफाया कर दिया गया।
चौंकाने वाली बात यह है कि 1967 में एक छोटी सी क्रांति के नाम पर शुरू हुआ नक्सल आंदोलन बीते करीब 60 साल से आम लोगों और सुरक्षा बलों के लिए खतरा बना हुआ था। हालांकि, 2010 के दंतेवाड़ा नक्सल हमले, जिसमें सीआरपीएफ के 76 जवानों की जान चली गई थी, के बाद पहले यूपीए सरकार और इसके बाद एनडीए सरकार ने वामपंथी चरमपंथ पर लगाम लगाने की कोशिशें शुरू कर दीं।
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चौंकाने वाली बात यह है कि 1967 में एक छोटी सी क्रांति के नाम पर शुरू हुआ नक्सल आंदोलन बीते करीब 60 साल से आम लोगों और सुरक्षा बलों के लिए खतरा बना हुआ था। हालांकि, 2010 के दंतेवाड़ा नक्सल हमले, जिसमें सीआरपीएफ के 76 जवानों की जान चली गई थी, के बाद पहले यूपीए सरकार और इसके बाद एनडीए सरकार ने वामपंथी चरमपंथ पर लगाम लगाने की कोशिशें शुरू कर दीं।
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आइये जानते हैं कि बीते 60 वर्षों में नक्सलवाद कहां से कहां तक फैला? इस वाम चरमपंथ पर लगाम लगाने की कोशिशें कब से शुरू हुईं? बीते कुछ वर्षो में कैसे नक्सलवाद के खात्मे को लक्ष्य बना लिया गया? इसके लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने क्या-क्या कदम उठाए? किन बड़े नक्सल चेहरों को सुरक्षाबलों ने इस दौरान मार गिराया? मौजूदा समय में देश में नक्सलवाद के फैलाव की क्या स्थिति है?
पहले जानें- 1967 के बाद कितना बड़ा हो चुका था नक्सलवाद का फैलाव
पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव में एक छोटे से किसान विद्रोह के रूप में यह जन्मा था। दरअसल, यहां कट्टरपंथी वाम नेताओं ने मजदूरों और किसानों को स्थानीय जमींदारों के खिलाफ एकजुट कर लिया। शुरुआत में तो इस आंदोलन का लक्ष्य अपने अधिकार मांगने तक था, लेकिन बाद में यह हिंसक हो गया।
देखते ही देखते नक्सलबाड़ी में किसानों के इस हिंसक आंदोलन का असर पूरे देश में दिखने लगा और जमींदारों के खिलाफ हिंसा की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई। यहीं से नक्सलवाद का उभार हुआ। एक के बाद एक बिहार से लेकर ओडिशा तक कई वाम चरमपंथी संगठनों का उभार हुआ। 1970 के दशक में यह सभी संगठन एक साथ आ गए और जन्म हुआ- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी-माओवादी का, जो कि चीन के शासक माओ जिदॉन्ग के आंदोलन से प्रेरित थी और हिंसा के जरिए अपने हक हासिल करने का समर्थन करती थी। इस संगठन ने भारत सरकार के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया। रिपोर्ट्स की मानें तो एक समय नक्सलवाद बड़े-छोटे स्तर पर 10 राज्यों तक फैला था। उस दौर में वामपंथी उग्रवाद ने भारत में कम से कम 180 जिलों को प्रभावित किया था।
सरकारी रिकॉर्ड्स के मुताबिक, 2004 से 2014 के बीच नक्सली हिंसा की 16,463 घटनाएं दर्ज की गईं। इस दौरान नक्सल हमलों में 1,851 सुरक्षाकर्मियों की जान जाने का भी रिकॉर्ड है। इसी समय में 4,766 आम लोगों की भी जान गई।
वाम चरमपंथ पर लगाम लगाने की कोशिशें कब से शुरू हुईं?
शुरुआती कार्रवाई (1960-70 का दशक): 1967 में नक्सलबाड़ी विद्रोह के बाद जब यह आंदोलन फैलने लगा, तब सरकार ने नक्सलियों पर कड़ी कार्रवाई की। इस कार्रवाई से यह मूल आंदोलन एक तरह से खत्म हो गया। इसके मुख्य विचारक चारू मजूमदार को गिरफ्तार कर लिया गया, जिनकी 1972 में पुलिस हिरासत में मौत हो गई। हालांकि, यह आंदोलन तब तक सिर्फ नक्सलबाड़ी तक सीमित नहीं था। यह कई और राज्यों में फैल चुका था। केंद्र और राज्य सरकार एक साथ इसे खत्म करने के लिए साथ नहीं आ पाईं।शांति वार्ता के प्रयास (2004): जब 2000 के दशक में नक्सली हिंसा अपने चरम पर थी, तब जून 2004 में तत्कालीन अविभाजित आंध्र प्रदेश की मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी (वाईएसआर) की सरकार ने नक्सलियों के साथ शांति समझौता करने की कोशिश की थी। हालांकि, तब भी दोनों पक्षों के बीच गहरे अविश्वास के कारण यह वार्ता कुछ ही महीनों में विफल हो गई और इसके बाद हिंसा में और तेजी आ गई।
दंतेवाड़ा हमले के बाद भी बनी रहीं मुश्किलें: 2010 में दंतेवाड़ा में हुए एक घातक नक्सली हमले में सीआरपीएफ के 76 जवानों की जान चली गई थी। इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने 2009 के बयान को दोहराया था और नक्सलवाद के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की बात कही। हालांकि, एक बार फिर यह कोशिशें समन्वय की कमी से जूझती दिखीं। नतीजतन मई 2013 में नक्सलियों ने एक और बड़े हमले को अंजाम दिया। बस्तर जिले की झीरम घाटी में नक्सलियों ने 29 लोगों को हत्या कर दी, जिसमें कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेशाध्यक्ष नंद कुमार पटेल, पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा और पूर्व केंद्रीय मंत्री- विद्याचरण शुक्ल भी शामिल थे।
2014 के बाद से कैसे बदली केंद्र-राज्यों की रणनीति?
2014 के बाद केंद्र सरकार ने राज्यों के साथ मिलकर एक एकीकृत, बहुआयामी और निर्णायक रणनीति तैयार की।1. संयुक्त अभियान और सटीक खुफिया तंत्र
- विशेषज्ञों के मुताबिक, पहले जंगलों में बड़े पैमाने पर की जाने वाली सामान्य तलाशी की जगह अब सटीक खुफिया जानकारी पर आधारित स्ट्राइक ने ले ली।
- केंद्रीय अर्धसैनिक बलों और राज्य की पुलिस इकाइयों के बीच बेहतरीन तालमेल स्थापित किया गया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, पहले गृह मंत्री राजनाथ सिंह और अब अमित शाह ने खुद इस तालमेल की निगरानी शुरू की।
- नक्सली कमांड को खत्म करने के लिए अब केंद्र-राज्य टास्क फोर्स मिलकर काम कर रही हैं और ड्रोन तथा सैटेलाइट मैपिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
2. राज्यों का क्षमता निर्माण
- केंद्र सरकार ने राज्यों की पुलिस और खुफिया तंत्र को मजबूत करने के लिए भारी वित्तीय सहायता दी है। राज्यों को दी जाने वाली राशि में 155% की बढ़ोतरी की गई।
- सरकार ने 2022 में स्पेशल इंफ्रास्ट्रक्चर स्कीम (एसआईएस) के तहत राज्य के स्पेशल फोर्सेज और स्पेशल इंटेलिजेंस ब्रांच को भी मजबूत किया।
- पिछले 10 वर्षों में राज्य पुलिस के लिए नक्सल प्रभावित इलाकों में 586 किलेबंद पुलिस स्टेशन बनाए हैं, जिससे पुलिस की पकड़ मजबूत हुई।
3. फंडिंग नेटवर्क को पूरी तरह तोड़ना
केंद्र सरकार की राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने भी नक्सलवाद की कमर तोड़ने में अहम भूमिका निभाई है। एनआईए ने नक्सलवाद विरोधी एक अलग विंग बनाया है। इसके अलावा एजेंसी ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और राज्य की एजेंसियों ने मिलकर संयुक्त रूप से कार्रवाई करते हुए नक्सलियों की लगभग 92 करोड़ रुपये की संपत्तियां जब्त की हैं।
4. तेज ढांचागत विकास
सुरक्षा बलों की आवाजाही और स्थानीय लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए केंद्र और राज्यों ने मिलकर रेड कॉरिडोर में 12,000 किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया है। इसके अलावा दुर्गम इलाकों में खुफिया जानकारी और संचार को बेहतर बनाने के लिए 8,500 से अधिक 4जी मोबाइल टावर चालू किए गए हैं।
5. आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति में मजबूती
आत्मसमर्पण नीति के तहत बड़े माओवादी नेताओं को हथियार डालने पर पांच लाख रुपये, निचले कैडर को ढाई लाख रुपये और व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए 36 महीने तक 10,000 रुपये का मासिक वजीफा देने की योजना लागू की है।
किन बड़े नक्सल चेहरों के खात्मे से तय हुआ नक्सलवाद का अंत?
नम्बाला केशव राव उर्फ बसवराजू: यह भाकपा (माओवादी) का महासचिव और संगठन का सर्वोच्च रणनीतिकार था। मई 2025 में छत्तीसगढ़ के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले नक्सली गढ़ अबूझमाड़ में हुए एक बड़े ऑपरेशन में इसे 26 अन्य नक्सलियों के साथ मार गिराया गया।माडवी हिडमा: यह केंद्रीय समिति का खूंखार कमांडर था और 2010 में 76 सीआरपीएफ जवानों की जान लेने वाले दंतेवाड़ा हमले का मुख्य मास्टरमाइंड था। नवंबर 2025 में आंध्र प्रदेश-छत्तीसगढ़ सीमा पर हुई एक लंबी मुठभेड़ में सुरक्षाबलों ने इसे ढेर कर दिया।
प्रताप रेड्डी रामचंद्र रेड्डी उर्फ चलपति: केंद्रीय समिति का यह वरिष्ठ सदस्य नक्सलियों की रसद, भर्ती और विभिन्न राज्यों के बीच समन्वय का काम देखता था। जनवरी 2025 में छत्तीसगढ़-ओडिशा सीमा के पास हुए एक संयुक्त अभियान में इसे मार गिराया गया।
अन्य शीर्ष नेता: इन बड़े चेहरों के अलावा, कट्टा रामचंद्र रेड्डी, कदारी सत्यनारायण रेड्डी, गजरला रवि, सहदेव सोरेन, बालकृष्ण, नरसिम्हा और चेलम जैसे केंद्रीय समिति के कई अन्य सदस्य भी हाल के अभियानों में मारे गए हैं। फरवरी 2026 में हुए एक अन्य एनकाउंटर में प्रभाकर राव, पारकल वीर, स्वामी, पडकाला स्वामी और लोकेटी चंदर राव समेत सात नक्सली नेताओं को मार गिराया गया।
आंकड़ों की बात करें तो, 2024 और 2025 के दौरान कुल 28 शीर्ष नक्सली नेताओं को ढेर किया गया है, जिनमें से 6 केंद्रीय समिति के सदस्य थे। इन शीर्ष कमांडरों के खात्मे से माओवादी संगठन का ढांचा और उनकी सैन्य ताकत लगभग पूरी तरह से चरमरा गई है।
मौजूदा समय (2026) में भारत में नक्सलवाद या वामपंथी उग्रवाद का फैलाव अपने सबसे निचले स्तर पर आ चुका है। केंद्र-राज्य सरकारों के अलावा कई स्वतंत्र संगठनों ने भी पुष्टि की है कि कभी कई राज्यों में फैला विशाल रेड कॉरिडोर अब लगभग खत्म होने की कगार पर है।
प्रभावित जिलों में आई कमी
जहां 2014 में देश के 126 जिले नक्सलवाद से प्रभावित थे, वहीं 2025 में यह संख्या घटकर मात्र 11 रह गई थी। फरवरी 2026 को गृह मंत्रालय की एक समीक्षा बैठक में सामने आया कि अब देश में केवल सात जिले ही वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित बचे हैं। इसके अलावा 2014 में 36 जिले नक्सलवाद से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों की श्रेणी में आते थे, जिनकी संख्या अब घटकर सिर्फ तीन रह गई है।
मौजूदा समय में देश में नक्सलवाद के फैलाव की क्या स्थिति है?
मौजूदा समय (2026) में भारत में नक्सलवाद या वामपंथी उग्रवाद का फैलाव अपने सबसे निचले स्तर पर आ चुका है। केंद्र-राज्य सरकारों के अलावा कई स्वतंत्र संगठनों ने भी पुष्टि की है कि कभी कई राज्यों में फैला विशाल रेड कॉरिडोर अब लगभग खत्म होने की कगार पर है।
प्रभावित जिलों में आई कमी
जहां 2014 में देश के 126 जिले नक्सलवाद से प्रभावित थे, वहीं 2025 में यह संख्या घटकर मात्र 11 रह गई थी। फरवरी 2026 को गृह मंत्रालय की एक समीक्षा बैठक में सामने आया कि अब देश में केवल सात जिले ही वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित बचे हैं। इसके अलावा 2014 में 36 जिले नक्सलवाद से सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों की श्रेणी में आते थे, जिनकी संख्या अब घटकर सिर्फ तीन रह गई है।
कैडरों की घटती संख्या
फरवरी 2026 की एक खुफिया रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में जहां 2,000 से अधिक सशस्त्र माओवादी थे, वहीं अब पूरे देश में केवल 220 सशस्त्र माओवादी कैडर ही बचे हैं।
दशकों पुराने गढ़ों का खात्मा
सुरक्षाबलों के लगातार अभियानों (जैसे- ऑपरेशन ऑक्टोपस और डबल बुल) के जरिए पिछले तीन दशकों से नक्सलियों के कब्जे वाले बूढ़ा पहाड़, पारसनाथ, बरमसिया और चकरबंधा (बिहार) जैसे बड़े गढ़ों को पूरी तरह से मुक्त करा लिया गया है। साथ ही अबूझमाड़ (छत्तीसगढ़) जैसे अभेद्य माने जाने वाले जंगलों में भी सुरक्षाबलों ने स्थायी कैंप स्थापित कर लिए हैं।
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