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रिटायरमेंट के बाद भी 'ऑन ड्यूटी': पेंशन से बेजुबानों को पाल रहीं पूर्व महिला पुलिस अफसर, सेवा 11 साल से जारी

एएनआई, नई दिल्ली Published by: Asmita Tripathi Updated Tue, 23 Jun 2026 09:45 AM IST
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सार

तमिलनाडु के मदुरै की 76 वर्षीय सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी मालथी पिछले 11 वर्षों से अपनी पेंशन का बड़ा हिस्सा बंदरों को खिलाने में खर्च कर रही हैं। वह हर शनिवार 350-400 बंदरों को खाना खिलाती है। मालथी इसे मानसिक संतुष्टि और सेवा का माध्यम मानती हैं।

On Duty Even After Retirement: Former Female Police Officer Cares for Voiceless Animals Using Her Pension
76 की उम्र में भी सेवा का जज्बा - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

मदुरै की 76 वर्षीय सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी मालथी अपनी पेंशन का एक बड़ा हिस्सा तिरुप्पारनकुंडूम क्षेत्र के आसपास सैकड़ों बंदरों को खिलाने में इस्तेमाल कर रही हैं। यह काम उन्होंने लगभग एक दशक पहले शुरू की थी।

पुलिस विभाग में 33 साल बिताया
मालथी ने अपना जीवन दूसरों की सेवा में समर्पित कर दिया है। गांधीग्राम विश्वविद्यालय में शारीरिक शिक्षा निदेशक के रूप में काम किया। इसके बाद कोडाइकनाल के एक अंतरराष्ट्रीय स्कूल में सेवा दिया और तमिलनाडु पुलिस विभाग में 33 साल बिताया। इसके बाद वह 2010 में सेवानिवृत्त हुईं। 2015 से, वह अपनी पेंशन का एक बड़ा हिस्सा तिरुप्पारनकुंडूम के आसपास रहने वाले बंदरों को खिलाने में खर्च कर रही हैं। अपनी उम्र और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों के बावजूद, वह हर शनिवार को कई स्थानों पर जाती हैं, जहां उनके बुलाने पर लगभग 350 से 400 बंदर इकट्ठा हो जाते हैं।

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बंदरों का खाना खिलाने से मिलता है मानसिक संतुष्टि
मालथी के लिए, इन जानवरों की देखभाल करना अपार आनंद और मानसिक संतुष्टि देता है। उनका निस्वार्थ समर्पण समाज द्वारा अक्सर उपेक्षित प्राणियों के प्रति उनकी गहरी करुणा को दिखाता है। वह जीवन भर इस सेवा को जारी रखने की आशा करती हैं, जिससे उनकी सेवानिवृत्ति दया और समर्पण की एक उल्लेखनीय यात्रा बन जाएगी। एएनआई से बात करते हुए मालथी ने कहा कि तिरुप्पारनकुंडूम मुरुगन मंदिर और आसपास के इलाकों में जानवरों की बड़ी आबादी को देखने के बाद उन्होंने 2015 में बंदरों को खाना खिलाना शुरू किया।

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उन्होंने कहा ये बंदर वन और पहाड़ी क्षेत्रों में रहते हैं।  भोजन की तलाश में प्रतिदिन संघर्ष करते हैं। लगभग 2015 में, मैंने तिरुप्पारनकुंडूम मुरुगन मंदिर के आसपास बंदरों की बड़ी आबादी देखी और उनकी मदद करने का फैसला किया। तब से, मैं उन्हें नियमित रूप से भोजन करा रही हूं । कई वर्षों तक, मैं प्रतिदिन उस क्षेत्र में जाती रही। हालांकि, अब मैं 76 वर्ष की हो गई हूं। स्वास्थ्य समस्याओं के कारण लंबी दूरी तक चलना मुश्किल हो गया है। फिर भी, मैं हर शनिवार को अपनी सेवा जारी रखती हूं।

350 से 400 बंदर होते है इकट्ठा
मलाथी तिरुप्परनकुंडूम के आसपास छह स्थानों का दौरा करती हैं, जिनमें मंदिर परिसर, सरवना पोइगई, पल्चुनैकंद सुब्रमण्यम मंदिर, मायिल थोप्पू (पीकॉक ग्रोव) और किला क्षेत्र शामिल हैं। उनके अनुसार, इन स्थानों पर हर सप्ताह लगभग 350 से 400 बंदर इकट्ठा होते हैं। उन्होंने कहा, 'इन स्थानों पर लगभग 350 से 400 बंदर हैं। हर शनिवार दोपहर लगभग 3:30 बजे, जब मैं उन्हें बुलाती हूं, तो वे भोजन के लिए इकट्ठा होते हैं। कुछ जगहों पर, लगभग 50 बंदर एक साथ आते हैं। गुफा मंदिर के आसपास लगभग 150 बंदर हैं। वहीं,  पीकॉक ग्रोव में लगभग 200 बंदर रहते हैं।'

उन्होंने आगे कहा कि नवजात शिशुओं से लेकर पूरी तरह से विकसित वयस्कों तक, सभी उम्र के बंदर उनके द्वारा दिए गए भोजन के लिए इकट्ठा होते हैं। उन्होंने आगे कहा कि इन जानवरों की सेवा करना मुझे अपार खुशी और गहरी मानसिक संतुष्टि प्रदान करता है। उनका विश्वास और स्नेह मेरे जीवन को बहुत अर्थ देता है। जब तक मैं शारीरिक रूप से सक्षम हूं, मैं इस मिशन को जारी रखूंगी। मेरी दिली इच्छा है कि मैं अपने जीवन के अंत तक इस सेवा को जारी रखूं। 

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