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Simultaneous Polls: एक देश एक चुनाव से राष्ट्रीय सियासत पर बड़ा असर, विपक्ष के विरोध के बावजूद बिल लाएगी सरकार
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सार
पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद समिति ने एक देश एक चुनाव मुद्दे पर सभी प्रमुख राष्ट्रीय-क्षेत्रीय दलों से विचार-विमर्श करने के बाद अपनी रिपोर्ट मार्च महीने में ही वर्तमान राष्ट्रपति को सौंपी थी। अब केंद्र सरकार अगले सत्र में इस पर बिल लेकर सामने आ सकती है।
'एक देश एक चुनाव' के प्रस्ताव को कैबिनेट की स्वीकृति
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
'एक देश एक चुनाव' के प्रस्ताव को कैबिनेट की स्वीकृति मिल गई है। पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद समिति ने इस मुद्दे पर सभी प्रमुख राष्ट्रीय-क्षेत्रीय दलों से विचार-विमर्श करने के बाद अपनी रिपोर्ट मार्च महीने में ही वर्तमान राष्ट्रपति को सौंपी थी। अब केंद्र सरकार अगले सत्र में इस पर बिल लेकर सामने आ सकती है। चूंकि, सत्तारूढ़ एनडीए खेमे के ज्यादातर दलों ने इस पर पहले ही अपनी सहमति जता दी है, इस बिल के संसद से पास होने में कोई संशय न होने की बात कही जा रही है। यदि ऐसा हो जाता है तो केंद्र सरकार 2029 के लोकसभा चुनाव के समय इसे लागू कराने का प्रयास कर सकती है। केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण कानून को भी 2029 में लागू कराने की बात कही है। इसके पहले परिसीमन और जनगणना का कार्य भी कराया जा सकता है, केंद्र सरकार ने इसके भी संकेत दिए हैं। ऐसे में 2029 का लोकसभा चुनाव देश की राजनीति में एक ऐसे मील के पत्थर की तरह स्थापित होगा जब देश ने अपनी चुनावी राजनीति को एक नई धारा में मोड़ दिया। हालांकि, इसके लाभ-हानि के असर को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं की जा रही हैं।
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गठबंधन के इन दलों ने दी है सहमति
सत्तारूढ़ दलों में चंद्रबाबू नायडू की पार्टी टीडीपी ने इस पर अपने पत्ते नहीं खोले हैं, लेकिन नीतीश कुमार, चिराग पासवान और जीतन राम मांझी ने 'वन नेशन वन इलेक्शन' को देश के विकास के लिए आवश्यक बताया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लालकिले की प्राचीर से पहले ही वन नेशन वन इलेक्शन की वकालत कर चुके हैं। उन्होंने कहा था कि देश में हर समय कहीं न कहीं लगातार चुनाव चलता रहता है। इससे राजनीतिक दल चुनावी दबाव में फैसले नहीं ले पाते और इससे देश का विकास प्रभावित होता है। लेकिन यदि पांच साल में एक बार चुनाव हों तो बाकी समय सरकारें पूरा ध्या्न लगाकर केवल विकास के कार्य कर सकेंगी।
सत्तारूढ़ दलों में चंद्रबाबू नायडू की पार्टी टीडीपी ने इस पर अपने पत्ते नहीं खोले हैं, लेकिन नीतीश कुमार, चिराग पासवान और जीतन राम मांझी ने 'वन नेशन वन इलेक्शन' को देश के विकास के लिए आवश्यक बताया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लालकिले की प्राचीर से पहले ही वन नेशन वन इलेक्शन की वकालत कर चुके हैं। उन्होंने कहा था कि देश में हर समय कहीं न कहीं लगातार चुनाव चलता रहता है। इससे राजनीतिक दल चुनावी दबाव में फैसले नहीं ले पाते और इससे देश का विकास प्रभावित होता है। लेकिन यदि पांच साल में एक बार चुनाव हों तो बाकी समय सरकारें पूरा ध्या्न लगाकर केवल विकास के कार्य कर सकेंगी।
'वन नेशन वन इलेक्शन' पर बनी रामनाथ कोविंद कमेटी ने सुझाव दिया था कि पहले चरण में केंद्र और राज्य सरकारों के चुनाव एक साथ कराने की पहल की जा सकती है। राष्ट्रीय चुनावों के बाद में सौ दिनों के अंदर निगम और निचले स्तर के चुनाव कराने चाहिए। इससे पूरी चुनावी प्रक्रिया कुछ ही दिनों में समाप्त हो जाएगी और सरकारें-राजनीतिक दल केवल विकास कार्यों के लिए अपना पूरा प्रयास कर सकेंगे।
विकल्प बनाने होंगे
राजनीतिक समीक्षक डॉ. परमबीर सिंह ने अमर उजाला से कहा कि 'वन नेशन वन इलेक्शन' का प्रस्ताव अभी नया है। इसके प्रावधानों के सामने आ जाने के बाद ही यह बताया जा सकेगा कि प्रस्ताव वर्तमान की परिस्थितियों से कितना अलग और कितना प्रभावी है। इसकी खामियों के बारे में भी तभी चर्चा् की जा सकेगी जब इसके सभी नियम-उपनियम जनता की जानकारी में आ जाएंगे।
लेकिन, जिस तरह अभी किसी सरकार के गिरने पर मध्यावधि चुनाव कराने का विकल्प दिया गया है, 'वन नेशन वन इलेक्शन' में सरकार गिरे बिना ही कैसे नई सरकार बनेगी, इस पर स्थिति साफ करनी पड़ेगी। यदि किसी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता है तो चुने हुए सांसदों को ही आपसी चुनाव या सहमति से कोई प्रधान चुनने का विकल्प दिया जाता है तो भी इससे आयाराम-गयाराम वाली स्थिति से बचा नहीं जा सकेगा और सरकार में स्थिरता आना संभव नहीं होगा। ऐसे में सरकार को सभी विकल्पों पर विचार करने के बाद में ही कोई बिल लाना चाहिए।
विकल्प बनाने होंगे
राजनीतिक समीक्षक डॉ. परमबीर सिंह ने अमर उजाला से कहा कि 'वन नेशन वन इलेक्शन' का प्रस्ताव अभी नया है। इसके प्रावधानों के सामने आ जाने के बाद ही यह बताया जा सकेगा कि प्रस्ताव वर्तमान की परिस्थितियों से कितना अलग और कितना प्रभावी है। इसकी खामियों के बारे में भी तभी चर्चा् की जा सकेगी जब इसके सभी नियम-उपनियम जनता की जानकारी में आ जाएंगे।
लेकिन, जिस तरह अभी किसी सरकार के गिरने पर मध्यावधि चुनाव कराने का विकल्प दिया गया है, 'वन नेशन वन इलेक्शन' में सरकार गिरे बिना ही कैसे नई सरकार बनेगी, इस पर स्थिति साफ करनी पड़ेगी। यदि किसी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता है तो चुने हुए सांसदों को ही आपसी चुनाव या सहमति से कोई प्रधान चुनने का विकल्प दिया जाता है तो भी इससे आयाराम-गयाराम वाली स्थिति से बचा नहीं जा सकेगा और सरकार में स्थिरता आना संभव नहीं होगा। ऐसे में सरकार को सभी विकल्पों पर विचार करने के बाद में ही कोई बिल लाना चाहिए।
क्षेत्रीय दलों को नुकसान की आशंका
राजनीतिक विश्लेषक सुनील पांडेय ने कहा कि केंद्र और राज्यों के एक साथ चुनाव कराने में सबसे बड़ा नुकसान क्षेत्रीय दलों को हो सकता है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर चुनाव एक साथ कराने पर चुनावी अभियानों में राष्ट्रीय मुद्दों के ज्यादा प्रभावी रहने की संभावना है। ऐसे में राष्ट्रीय दलों को इन मुद्दों के सहारे अपना प्रभाव बढ़ा्ने में मदद मिलेगी, जबकि क्षेत्रीय स्तर पर काम करने वाली पार्टियों को इसका नुकसान हो सकता है। लेकिन क्षेत्रीय दलों ने जिस तरह स्थानीय लोगों की आवाजों को बल देने का काम किया है, लोकतांत्रिक व्यवस्था में उन्हें कमजोर करना ठीक नहीं होगा। हालांकि, हमारे मतदाताओं ने कई बार यह साफ संकेत दिया है कि राष्ट्रीय और स्थानीय चुनाव एक साथ होने पर भी वे अलग-अलग दलों को वोट देने की काबिलियत रखते हैं। ओडिशा के पिछले चुनाव में यही हुआ था जब लोकसभा के लिए मतदाताओं ने भाजपा को वोट दिया, जबकि उसी के साथ हो रहे राज्य स्तरीय चुनावों के लिए नवीन पटनायक उनकी पहली पसंद थे।
देश की राजधानी दिल्ली में ही जिस तरह मतदाताओं ने लोकसभा चुनावों में बार-बार भाजपा को जिताया है, जबकि विधानसभा के चुनावों में आम आदमी पार्टी को महत्त्व दिया है, इससे भी यह साफ होता है कि मतदाता बहुत जागरुक हैं और वे अलग-अलग स्तर के चुनावों में अलग-अलग प्राथमिकता रख सकते हैं। ऐसे में 'वन नेशन वन इलेक्शन' के अंतर्गत एक साथ राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय चुनाव कराने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषक सुनील पांडेय ने कहा कि केंद्र और राज्यों के एक साथ चुनाव कराने में सबसे बड़ा नुकसान क्षेत्रीय दलों को हो सकता है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर चुनाव एक साथ कराने पर चुनावी अभियानों में राष्ट्रीय मुद्दों के ज्यादा प्रभावी रहने की संभावना है। ऐसे में राष्ट्रीय दलों को इन मुद्दों के सहारे अपना प्रभाव बढ़ा्ने में मदद मिलेगी, जबकि क्षेत्रीय स्तर पर काम करने वाली पार्टियों को इसका नुकसान हो सकता है। लेकिन क्षेत्रीय दलों ने जिस तरह स्थानीय लोगों की आवाजों को बल देने का काम किया है, लोकतांत्रिक व्यवस्था में उन्हें कमजोर करना ठीक नहीं होगा। हालांकि, हमारे मतदाताओं ने कई बार यह साफ संकेत दिया है कि राष्ट्रीय और स्थानीय चुनाव एक साथ होने पर भी वे अलग-अलग दलों को वोट देने की काबिलियत रखते हैं। ओडिशा के पिछले चुनाव में यही हुआ था जब लोकसभा के लिए मतदाताओं ने भाजपा को वोट दिया, जबकि उसी के साथ हो रहे राज्य स्तरीय चुनावों के लिए नवीन पटनायक उनकी पहली पसंद थे।
देश की राजधानी दिल्ली में ही जिस तरह मतदाताओं ने लोकसभा चुनावों में बार-बार भाजपा को जिताया है, जबकि विधानसभा के चुनावों में आम आदमी पार्टी को महत्त्व दिया है, इससे भी यह साफ होता है कि मतदाता बहुत जागरुक हैं और वे अलग-अलग स्तर के चुनावों में अलग-अलग प्राथमिकता रख सकते हैं। ऐसे में 'वन नेशन वन इलेक्शन' के अंतर्गत एक साथ राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय चुनाव कराने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए।
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