किसके गले की फांस बनेगा 'अग्निपथ'?: विपक्ष चूका तो 'अग्निवीर' बन आगे बढ़ी मोदी सरकार, किसान आंदोलन के झटके से लिया सबक
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अग्निपथ पर विपक्ष चूक गया है। वहीं मोदी सरकार ने किसान आंदोलन के झटके से सबक लेते हुए इस योजना को त्वरित गति से लागू करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। इस योजना पर मोदी सरकार 'अग्निवीर' बन कर सामने आई है...
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सेना भर्ती के लिए लागू की गई 'अग्निपथ' योजना पर विपक्ष चाह कर भी एक नहीं हो पा रहा है। अब कुछ ही पार्टियां इस योजना का विरोध कर रही हैं। एक तरफ 'अग्निपथ' की प्रतीकात्मक खिलाफत हो रही है, तो दूसरी ओर लाखों युवा 'अग्निवीर' बनने की तैयारी में जुटे हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अग्निपथ पर विपक्ष चूक गया है। वहीं मोदी सरकार ने किसान आंदोलन के झटके से सबक लेते हुए इस योजना को त्वरित गति से लागू करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी। इस योजना पर मोदी सरकार 'अग्निवीर' बन कर सामने आई है।
क्यों मौन हो गया विपक्ष, नहीं मचा बवाल
मंगलवार को दो अहम बातें देखने को मिली। एक, सुप्रीम कोर्ट में 'अग्निपथ' को लेकर जो याचिकाएं लगी थीं, उनकी सुनवाई कर सुप्रीम कोर्ट ने सभी याचिकाओं को दिल्ली हाईकोर्ट में ट्रांसफर कर दिया। सर्वोच्च अदालत ने केरल, पंजाब, हरियाणा, पटना और उत्तराखंड हाईकोर्ट से भी अग्निपथ के खिलाफ सभी जनहित याचिकाओं को दिल्ली हाईकोर्ट में स्थानांतरित करने के लिए कहा है। दूसरा, भाजपा के एक सांसद समेत कई विपक्षी नेताओं ने सेना भर्ती में धर्म व जाति बताने को लेकर बवाल खड़ा कर दिया। केंद्र के अलावा सेना ने जब इस बाबत की सच्चाई बताई, तो विपक्ष के पास मौन होने के अलावा दूसरा चारा नहीं था।
कृषि बिलों पर केंद्र सरकार को अपना निर्णय पलटना पड़ा
किसान आंदोलन में विपक्ष को पूरा मौका मिला था। सरकार उन कानूनों को लागू भी नहीं कर पाई थी। आंदोलन भी एक साल से ज्यादा चला। केंद्र पर चौतरफा दबाव बनता चला गया। किसानों का समर्थन कर रहे संगठनों एवं राजनीतिक दलों को अपनी बात कहने का पर्याप्त समय मिल गया। चूंकि उस वक्त पांच राज्यों के चुनाव आ रहे थे तो केंद्र सरकार ने अपने निर्णय को पलट दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने देश के नाम अपने संबोधन में तीनों कृषि बिल वापस लेने की घोषणा कर दी। इस बार जब अग्निपथ योजना लागू हुई तो विपक्ष को लगा था कि केंद्र सरकार यहां भी बैकफुट पर आएगी। कांग्रेस के लोकसभा सांसद राहुल गांधी ने तो पीएम मोदी को 'माफीवीर' तक बता दिया। उन्होंने कहा, कृषि बिलों की तरह अग्निपथ योजना भी सरकार को वापस लेनी होगी। कई पार्टियों ने प्रतीकात्मक विरोध भी शुरू किया।
इन मसलों में उलझा रहा विपक्ष, 'अग्निपथ' पर नहीं बनी बात
केंद्र सरकार ने 'अग्निपथ' योजना को लागू करने का समय बहुत सही चुना था। जब ये योजना लागू हुई तो राहुल गांधी ईडी के समक्ष पेश होकर सवालों के जवाब दे रहे थे। विपक्ष की तरफ से उनके समर्थन में ट्वीट तक नहीं हुए थे। कांग्रेस ने अपने दम पर कुछ राज्यों में औपचारिकता के तौर पर विरोध-प्रदर्शन किया, लेकिन पार्टी का सारा ध्यान राहुल की पेशी पर था। इसके बाद राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का चुनाव आ गया। यहां भी विपक्षी एकता खंडित नजर आई। कोई भी एक ऐसा चेहरा नहीं था, जो विपक्ष का नेतृत्व कर सके। केंद्र सरकार के लिए यही मौका था। उसने भर्ती प्रक्रिया शुरू कर दी। सबसे पहले एयरफोर्स में आवेदन शुरू हुआ। सात लाख से ज्यादा उम्मीदवारों ने 'अग्निवीर' बनने के लिए आवेदन कर दिया। युवाओं की यह संख्या देख, मोदी सरकार जोश में आ गई। इसके बाद अग्निपथ योजना पर विपक्ष की ओर से जो भी आरोप लगाया जाता, उसका तुरंत प्रभाव से जवाब दिया जाता।
एक आरोप के कई स्तर पर मिले जवाब
केंद्र सरकार के तमाम मंत्री, भाजपा शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री और तीनों सेनाओं के चीफ एवं दूसरे वरिष्ठ अफसर मैदान में उतर गए। इससे युवाओं का गुस्सा शांत होता चला गया। मंगलवार को जब आप सांसद संजय सिंह व दूसरे नेताओं ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार, सेना में भर्ती होने वाले उम्मीदवारों से धर्म व जाति पूछ रही है। भाजपा की ओर से सांसद वरुण गांधी ने भी इस बाबत सवाल उठाया था। मानसून सत्र के दूसरे दिन सरकार ने इस सवाल का जवाब देने के लिए तीन स्तरीय फार्मूला अपनाया। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपना पक्ष रखा। उसके बाद सेना ने भी सही तथ्य लोगों के सामने रखे। भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने भी प्रेसवार्ता कर आरोप लगाने वाले नेताओं को आड़े हाथ लिया। दोपहर से पहले जो नेता धर्म व जाति पूछने पर भाजपा को घेर रहे थे, बाद में वही नेता मौन साध गए। सरकार ने कहा, ये व्यवस्था तो अंग्रेजी शासनकाल से जारी है। इसमें कहीं कोई बदलाव नहीं किया गया है। कुछ लोग बिना तथ्यों के राजनीति कर रहे हैं।
सारा खेल टाइमिंग और विपक्षी एकता का है
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, किसान आंदोलन के दौरान विपक्ष में इतनी टूट नहीं थी। उस दौरान अनेक राजनीतिक दलों ने कृषि कानूनों के खिलाफ आवाज उठाई थी। अग्निपथ योजना में विपक्ष की वह सक्रियता नहीं देखने को मिली। राजनीतिक जानकार रशीद किदवई कहते हैं, सारा खेल टाइमिंग और विपक्षी एकता का है। केंद्र ने इस योजना को लागू करने का जो समय चुना, उस वक्त कई विपक्षी दल किसी न किसी मामले में व्यस्त थे। कांग्रेस पार्टी को राहुल की पेशी से फुर्सत नहीं थी। महाराष्ट्र का संकट भी उसी दौरान सामने आया। इसके बाद राष्ट्रपति चुनाव आ गया। तब तक महाराष्ट्र में शिवसेना भी विदा हो गई। ऐसे में विपक्षी दल, खुद की साख बचाने में लगे रहे। उन्हें यह सोचने की फुर्सत ही नहीं मिली कि उन्हें 'अग्निपथ' पर एकता दिखाते हुए आगे बढ़ना है। भाजपा ने इसका पूरा फायदा उठाया।
लेकिन इस बार विपक्ष को कोई मौका ही नहीं मिल सका। कृषि कानूनों के मामले में विपक्ष को अवसर मिल गया था। केंद्र सरकार ने अग्निपथ योजना को लंबा नहीं खिंचने दिया। सुप्रीम कोर्ट ने जब अग्निपथ का केस दिल्ली हाईकोर्ट में भेजा तो कांग्रेस नेता शक्ति सिंह गोहिल ने कहा, मैं सुप्रीम कोर्ट पर टिप्पणी करना नहीं चाहता। ये जरूर कहता हूं कि अग्निपथ के नाम पर राष्ट्र की सुरक्षा और युवाओं के भविष्य के साथ बहुत बड़ा खिलवाड़ हो रहा है। इस देश में आप 3.5 साल की ठेके की नौकरी और 6 महीने की ट्रेनिंग, उसके बाद कोई पेंशन नहीं, हेल्थ की कोई सुविधा नहीं, न रैंक बढ़ेगी, न कोई फायदा मिलेगा। 75 फीसदी युवा, ठेके की नौकरी करने के बाद हर चार साल में बाहर निकल जाएंगे।