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पितृत्व अवकाश पर भी कानून बने: सुप्रीम कोर्ट की केंद्र को सलाह, कहा- पालन-पोषण सिर्फ मां की जिम्मेदारी नहीं
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Himanshu Singh Chandel
Updated Tue, 17 Mar 2026 05:48 PM IST
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सार
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पितृत्व अवकाश को सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने के लिए कानून बनाने पर विचार करने को कहा है। अदालत ने कहा कि बच्चे का पालन-पोषण केवल मां की जिम्मेदारी नहीं है और पिता की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। आइए, इस पूरे मामले को विस्तार से जानते हैं।
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
देश में पितृत्व अवकाश को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। अदालत ने केंद्र सरकार से कहा है कि पितृत्व अवकाश को सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने के लिए कानून बनाने पर विचार किया जाए। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि बच्चे का पालन-पोषण केवल मां की जिम्मेदारी नहीं है। पिता की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है और शुरुआती समय में दोनों की मौजूदगी बच्चे के विकास के लिए जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी एक मामले की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने उस नियम को असंवैधानिक ठहराया, जिसमें गोद लेने वाली महिला को तभी मातृत्व अवकाश मिलता था जब बच्चा तीन महीने से कम उम्र का हो। कोर्ट ने कहा कि गोद लेने वाली मां को भी 12 हफ्ते का मातृत्व अवकाश मिलना चाहिए, चाहे बच्चे की उम्र कुछ भी हो। अदालत ने कहा कि बच्चे की देखभाल और भावनात्मक विकास में माता-पिता दोनों की भूमिका अहम होती है।
पितृत्व अवकाश क्यों जरूरी?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चे के शुरुआती महीने और साल उसके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। इसी समय बच्चे और माता-पिता के बीच भावनात्मक संबंध मजबूत होते हैं। अदालत ने कहा कि अगर पिता को इस समय बच्चे के साथ रहने का मौका नहीं मिलता, तो बच्चे और पिता दोनों इस महत्वपूर्ण अनुभव से वंचित रह जाते हैं। इसलिए पितृत्व अवकाश की व्यवस्था होना जरूरी है।
ये भी पढ़ें- बंगाल विधानसभा चुनाव: TMC ने जारी की 291 उम्मीदवारों की सूची, भवानीपुर से ममता बनर्जी और शुभेंदु की लड़ाई तय
मां के साथ पिता की भी अहम भूमिका
अदालत ने कहा कि यह सही है कि मां बच्चे के विकास में केंद्रीय भूमिका निभाती है, लेकिन पिता की भूमिका को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं है। पिता का सहयोग मां के लिए भी जरूरी होता है, खासकर बच्चे के जन्म या गोद लेने के शुरुआती समय में। अदालत ने कहा कि पितृत्व अवकाश से पिता बच्चे की देखभाल में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं और परिवार की जिम्मेदारियां साझा कर सकते हैं।
लैंगिक समानता को मिलेगा बढ़ावा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पितृत्व अवकाश की व्यवस्था से समाज में पारंपरिक सोच भी बदलेगी। इससे यह धारणा कमजोर होगी कि बच्चों की देखभाल केवल महिलाओं की जिम्मेदारी है। अदालत ने कहा कि अगर पिता को भी अवकाश मिलेगा तो परिवार और कार्यस्थल दोनों जगह लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलेगा और माता-पिता दोनों की भूमिका संतुलित होगी।
केंद्र से कानून बनाने की अपील
अदालत ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि वह पितृत्व अवकाश को सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने के लिए कानून बनाने पर विचार करे। कोर्ट ने कहा कि इस अवकाश की अवधि ऐसी होनी चाहिए जो बच्चे और माता-पिता दोनों की जरूरतों के अनुरूप हो। इससे पिता भी बच्चे के शुरुआती विकास में सक्रिय भूमिका निभा सकेंगे और परिवार को बेहतर समर्थन मिलेगा।
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सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी एक मामले की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने उस नियम को असंवैधानिक ठहराया, जिसमें गोद लेने वाली महिला को तभी मातृत्व अवकाश मिलता था जब बच्चा तीन महीने से कम उम्र का हो। कोर्ट ने कहा कि गोद लेने वाली मां को भी 12 हफ्ते का मातृत्व अवकाश मिलना चाहिए, चाहे बच्चे की उम्र कुछ भी हो। अदालत ने कहा कि बच्चे की देखभाल और भावनात्मक विकास में माता-पिता दोनों की भूमिका अहम होती है।
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पितृत्व अवकाश क्यों जरूरी?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चे के शुरुआती महीने और साल उसके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। इसी समय बच्चे और माता-पिता के बीच भावनात्मक संबंध मजबूत होते हैं। अदालत ने कहा कि अगर पिता को इस समय बच्चे के साथ रहने का मौका नहीं मिलता, तो बच्चे और पिता दोनों इस महत्वपूर्ण अनुभव से वंचित रह जाते हैं। इसलिए पितृत्व अवकाश की व्यवस्था होना जरूरी है।
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मां के साथ पिता की भी अहम भूमिका
अदालत ने कहा कि यह सही है कि मां बच्चे के विकास में केंद्रीय भूमिका निभाती है, लेकिन पिता की भूमिका को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं है। पिता का सहयोग मां के लिए भी जरूरी होता है, खासकर बच्चे के जन्म या गोद लेने के शुरुआती समय में। अदालत ने कहा कि पितृत्व अवकाश से पिता बच्चे की देखभाल में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं और परिवार की जिम्मेदारियां साझा कर सकते हैं।
लैंगिक समानता को मिलेगा बढ़ावा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पितृत्व अवकाश की व्यवस्था से समाज में पारंपरिक सोच भी बदलेगी। इससे यह धारणा कमजोर होगी कि बच्चों की देखभाल केवल महिलाओं की जिम्मेदारी है। अदालत ने कहा कि अगर पिता को भी अवकाश मिलेगा तो परिवार और कार्यस्थल दोनों जगह लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलेगा और माता-पिता दोनों की भूमिका संतुलित होगी।
केंद्र से कानून बनाने की अपील
अदालत ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि वह पितृत्व अवकाश को सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने के लिए कानून बनाने पर विचार करे। कोर्ट ने कहा कि इस अवकाश की अवधि ऐसी होनी चाहिए जो बच्चे और माता-पिता दोनों की जरूरतों के अनुरूप हो। इससे पिता भी बच्चे के शुरुआती विकास में सक्रिय भूमिका निभा सकेंगे और परिवार को बेहतर समर्थन मिलेगा।
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