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नाबालिग से छेड़छाड़ का मामला: सहायक पुलिस आयुक्त की जमानत याचिका खारिज, मुंबई की कोर्ट ने क्या टिप्पणी की?
Mon, 13 Jul 2026 10:04 PM IST
निर्मल कांत
पीटीआई, मुंबई।
पीटीआई, मुंबई।
Published by: निर्मल कांत
Updated Mon, 13 Jul 2026 10:04 PM IST
सार
मुंबई की विशेष पॉक्सो अदालत ने नौ साल की बच्ची से छेड़छाड़ के मामले में आरोपी एसीपी को जमानत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि वरिष्ठ अधिकारी होने के कारण आरोपी को अपने कृत्य के परिणामों की जानकारी थी और वह गवाहों को प्रभावित कर सकता है। मामला क्या था, पढ़िए रिपोर्ट-
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पॉक्सो मामले में एसीपी को राहत नहीं
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक/एएनआई
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विस्तार
मुंबई की एक विशेष पॉक्सो अदालत ने सोमवार को एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को जमानत देने से इनकार कर दिया। इस अधिकारी पर नौ साल की बच्ची की गरिमा भंग करने का आरोप है।
अदालत ने कहा कि आरोपी एक वरिष्ठ अधिकारी है। इसलिए उसे केवल अपराध की जानकारी ही नहीं थी, बल्कि उसके परिणामों की भी समझ थी। आरोपी पुलिस के तकनीकी विभाग में तैनात सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) है।
विशेष जज एएस वैरागड़े ने कहा कि दस्तावेजों से आरोपी की भूमिका का पता चलता है। इसलिए अभियोजन पक्ष की यह आशंका सही लगती है कि आरोपी गवाहों को प्रभावित कर सकता है।
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क्या है मामला?
पीड़ित बच्ची की मां ने वर्ली थाने में दर्ज कराई गई प्राथमिकी में बताया था कि घटना 23 अप्रैल को हुई थी। उस समय नौ साल की बच्ची अपने भाई-बहनों के साथ बाहर खेल रही थी।
इस मामले में भारतीय न्याय संहिता की धारा 74 (महिला की गरिमा भंग करने के इरादे से हमला या आपराधिक बल का इस्तेमाल) और धारा 79 (शब्द, इशारे या किसी कृत्य से महिला की गरिमा का अपमान करना) के साथ पॉक्सो कानून की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था। एसीपी को 24 अप्रैल को गिरफ्तार किया गया था और वह करीब तीन महीने से हिरासत में है।
बचाव पक्ष ने क्या दलील दी?
अभियोजन पक्ष ने जमानत का विरोध क्यों किया?
अभियोजन पक्ष ने कहा कि आरोपी एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी है। वह अपने पद का इस्तेमाल कर जांच को प्रभावित कर सकता है। वह गवाहों पर दबाव डाल सकता है, खासकर इसलिए क्योंकि पीड़िता और उसका परिवार उसी इलाके में रहते हैं।
ये भी पढ़ें: केरल के अदूर थाने के बाहर यूट्यूबर की बेरहमी से कुटाई: मूकदर्शक बनी रही पुलिस, क्या है पूरा मामला?
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने कहा कि आरोपी को जमानत पर रिहा करना उचित नहीं होगा। जज वैरागड़े ने कहा कि नौ साल की पीड़िता के पास आरोपी को झूठा फंसाने की कोई वजह नहीं थी। अदालत ने यह भी कहा कि घटना की तुरंत शिकायत दर्ज होना इस बात का संकेत है कि आरोपी को झूठा फंसाने की बात सही नहीं लगती।
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अदालत ने कहा कि आरोपी एक वरिष्ठ अधिकारी है। इसलिए उसे केवल अपराध की जानकारी ही नहीं थी, बल्कि उसके परिणामों की भी समझ थी। आरोपी पुलिस के तकनीकी विभाग में तैनात सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) है।
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विशेष जज एएस वैरागड़े ने कहा कि दस्तावेजों से आरोपी की भूमिका का पता चलता है। इसलिए अभियोजन पक्ष की यह आशंका सही लगती है कि आरोपी गवाहों को प्रभावित कर सकता है।
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क्या है मामला?
पीड़ित बच्ची की मां ने वर्ली थाने में दर्ज कराई गई प्राथमिकी में बताया था कि घटना 23 अप्रैल को हुई थी। उस समय नौ साल की बच्ची अपने भाई-बहनों के साथ बाहर खेल रही थी।
इस मामले में भारतीय न्याय संहिता की धारा 74 (महिला की गरिमा भंग करने के इरादे से हमला या आपराधिक बल का इस्तेमाल) और धारा 79 (शब्द, इशारे या किसी कृत्य से महिला की गरिमा का अपमान करना) के साथ पॉक्सो कानून की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था। एसीपी को 24 अप्रैल को गिरफ्तार किया गया था और वह करीब तीन महीने से हिरासत में है।
बचाव पक्ष ने क्या दलील दी?
- आरोपी के वकील ने अदालत में कहा कि अधिकारी निर्दोष है और उसे इस मामले में झूठा फंसाया गया है। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि अब आगे हिरासत में रखने की जरूरत नहीं है, क्योंकि आरोपपत्र दाखिल किया जा चुका है।
- वकील ने कहा कि आरोपी नागपुर का स्थायी निवासी है और उसका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। वह अपने परिवार का अकेला कमाने वाला सदस्य है और जल्द ही सेवानिवृत्त होने वाला है।
अभियोजन पक्ष ने जमानत का विरोध क्यों किया?
अभियोजन पक्ष ने कहा कि आरोपी एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी है। वह अपने पद का इस्तेमाल कर जांच को प्रभावित कर सकता है। वह गवाहों पर दबाव डाल सकता है, खासकर इसलिए क्योंकि पीड़िता और उसका परिवार उसी इलाके में रहते हैं।
ये भी पढ़ें: केरल के अदूर थाने के बाहर यूट्यूबर की बेरहमी से कुटाई: मूकदर्शक बनी रही पुलिस, क्या है पूरा मामला?
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने कहा कि आरोपी को जमानत पर रिहा करना उचित नहीं होगा। जज वैरागड़े ने कहा कि नौ साल की पीड़िता के पास आरोपी को झूठा फंसाने की कोई वजह नहीं थी। अदालत ने यह भी कहा कि घटना की तुरंत शिकायत दर्ज होना इस बात का संकेत है कि आरोपी को झूठा फंसाने की बात सही नहीं लगती।