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ज्ञानवापी, मथुरा और संभल विवाद: सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता पहल क्यों हुई विफल? दोनों पक्षों ने किया इनकार
Tue, 14 Jul 2026 02:00 AM IST
Devesh Tripathi
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: Devesh Tripathi
Updated Tue, 14 Jul 2026 02:00 AM IST
सार
ज्ञानवापी, मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह और संभल की शाही जामा मस्जिद से जुड़े विवादों को मध्यस्थता के जरिए सुलझाने की सुप्रीम कोर्ट की कोशिश आगे नहीं बढ़ सकी। हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों ने स्पष्ट किया कि इतने संवेदनशील मामलों में समझौते के बजाय अदालत का कानूनी निर्णय ही स्वीकार्य होगा। सुप्रीम कोर्ट के समाधान समारोह के तहत मध्यस्थता का विकल्प दिया गया था, लेकिन इसमें भागीदारी स्वैच्छिक होने के कारण पक्षकारों ने इसे अस्वीकार कर दिया।
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सुप्रीम कोर्ट की मध्यस्थता पहल हुई विफल
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स/ANI
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विस्तार
देश के तीन सबसे संवेदनशील धार्मिक स्थलों वाराणसी के ज्ञानवापी, मधुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह और संभल की शाही जामा मस्जिद के विवाद को बातचीत के जरिये सुलझाने की सुप्रीम कोर्ट की पहल को झटका लगा है। हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों ने मध्यस्थता के जरिये समझौते से इनकार कर दिया।
दोनों पक्षों ने कहा कि मामलों का फैसला अदालत में कानूनी आधार पर ही होना चाहिए। हालांकि, ज्ञानवापी विवाद में हिंदू पक्ष के वकील मदनमोहन यादव ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों को मंगलवार को वाराणसी की अदालत के मध्यस्थता कक्ष में पहुंचने के लिए कहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों की मध्यस्थता की पहल?
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के प्रशासनिक विभाग ने इन मामलों के पक्षकारों को विशेष समाधान समारोह के तहत संबंधित जिलों में लोक अदालतों में मध्यस्थता प्रक्रिया में शामिल होने के लिए कहा था। मथुरा में चार जुलाई को हुई लोक अदालत में दोनों पक्षों के बीच बातचीत पहले ही विफल हो चुकी है। समाधान समारोह का समापन सुप्रीम कोर्ट में 21 से 23 अगस्त को विशेष लोक अदालत के साथ होना है।
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मुस्लिम पक्ष ने मध्यस्थता के प्रस्ताव को औपचारिक रूप से ठुकरा दिया है, जबकि हिंदू पक्ष भी समझौते के बजाय न्यायालय से कानूनी फैसला चाहता है। संभल की शाही जामा मस्जिद और हरिहर मंदिर विवाद में मस्जिद कमेटी के वकील शकील अहमद वारसी ने कहा कि मामला इतना संवेदनशील है कि इसे आपसी समझौते से हल नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा, यह मंदिर है या मस्जिद, इसका फैसला कोर्ट में होना चाहिए, न कि आपसी समझौते से।
21 से 23 अगस्त तक समाधान समारोह के तहत बैठेंगी विशेष लोक अदालतें
सुप्रीम कोर्ट ने लचित मामलों का बोझ कम करने और आपसी सहमति से विवाद सुलाशने के लिए देशभर में मध्यस्थता के जरिये विवादों के निपटारे और सामंजस्य के लिए 21 अप्रैल से पहल (समाधान समारोह-2026) की शुरुआत की है। इसके तहत 21-23 अगस्त तक सुप्रीम कोर्ट परिसर में विशेष लोक अदालत आयोजित होगी। हालांकि, इसमें शामिल होना पूरी तरह स्वैच्छिक है और किसी भी पक्ष पर समझौते का दभाव नाहीं होगा।
मामला संवेदनशील, न्यायिक प्रक्रिया से ही समाधान
अंजुमन इंतजामिया मसजिद ने बयान जारी कर कहा कि उसे सुप्रीम कोर्ट की ओर से मध्यस्थता का निमंत्रण मिला था. लेकिन उसने इसमें शामिल न होने का फैसला किया है। समिति का कहना है कि ज्ञानवापी मामला बेहद संवेदनशील है। इसका समाधान सिर्फ न्यायिक प्रक्रिया से ही होना चाहिए। इसलिए हम किसी भी स्तर पर समाधान में भाग नहीं लेंगे।
अब अदालत में ही फैसला
दोनों पक्ष मध्यस्थता के जरिये समाधान के पक्ष में नहीं है, इसलिए तीनों मामलों की सुनवाई सामान्य न्यायिक प्रक्रिया के तहत जारी रहेगी। अगर किसी भी चरण में पक्षकार अपनी सहमति बदलते हैं तो वे मध्यस्थता का विकल्प अपना सकते हैं।
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दोनों पक्षों ने कहा कि मामलों का फैसला अदालत में कानूनी आधार पर ही होना चाहिए। हालांकि, ज्ञानवापी विवाद में हिंदू पक्ष के वकील मदनमोहन यादव ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों को मंगलवार को वाराणसी की अदालत के मध्यस्थता कक्ष में पहुंचने के लिए कहा है।
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सुप्रीम कोर्ट ने क्यों की मध्यस्थता की पहल?
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के प्रशासनिक विभाग ने इन मामलों के पक्षकारों को विशेष समाधान समारोह के तहत संबंधित जिलों में लोक अदालतों में मध्यस्थता प्रक्रिया में शामिल होने के लिए कहा था। मथुरा में चार जुलाई को हुई लोक अदालत में दोनों पक्षों के बीच बातचीत पहले ही विफल हो चुकी है। समाधान समारोह का समापन सुप्रीम कोर्ट में 21 से 23 अगस्त को विशेष लोक अदालत के साथ होना है।
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मुस्लिम पक्ष ने मध्यस्थता के प्रस्ताव को औपचारिक रूप से ठुकरा दिया है, जबकि हिंदू पक्ष भी समझौते के बजाय न्यायालय से कानूनी फैसला चाहता है। संभल की शाही जामा मस्जिद और हरिहर मंदिर विवाद में मस्जिद कमेटी के वकील शकील अहमद वारसी ने कहा कि मामला इतना संवेदनशील है कि इसे आपसी समझौते से हल नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा, यह मंदिर है या मस्जिद, इसका फैसला कोर्ट में होना चाहिए, न कि आपसी समझौते से।
21 से 23 अगस्त तक समाधान समारोह के तहत बैठेंगी विशेष लोक अदालतें
सुप्रीम कोर्ट ने लचित मामलों का बोझ कम करने और आपसी सहमति से विवाद सुलाशने के लिए देशभर में मध्यस्थता के जरिये विवादों के निपटारे और सामंजस्य के लिए 21 अप्रैल से पहल (समाधान समारोह-2026) की शुरुआत की है। इसके तहत 21-23 अगस्त तक सुप्रीम कोर्ट परिसर में विशेष लोक अदालत आयोजित होगी। हालांकि, इसमें शामिल होना पूरी तरह स्वैच्छिक है और किसी भी पक्ष पर समझौते का दभाव नाहीं होगा।
मामला संवेदनशील, न्यायिक प्रक्रिया से ही समाधान
अंजुमन इंतजामिया मसजिद ने बयान जारी कर कहा कि उसे सुप्रीम कोर्ट की ओर से मध्यस्थता का निमंत्रण मिला था. लेकिन उसने इसमें शामिल न होने का फैसला किया है। समिति का कहना है कि ज्ञानवापी मामला बेहद संवेदनशील है। इसका समाधान सिर्फ न्यायिक प्रक्रिया से ही होना चाहिए। इसलिए हम किसी भी स्तर पर समाधान में भाग नहीं लेंगे।
अब अदालत में ही फैसला
दोनों पक्ष मध्यस्थता के जरिये समाधान के पक्ष में नहीं है, इसलिए तीनों मामलों की सुनवाई सामान्य न्यायिक प्रक्रिया के तहत जारी रहेगी। अगर किसी भी चरण में पक्षकार अपनी सहमति बदलते हैं तो वे मध्यस्थता का विकल्प अपना सकते हैं।