कानों देखी: चिंतन शिविर भी खत्म हो गया, लेकिन देशभर के कांग्रेसियों को कब मिलेगा उनके सवाल का जवाब?
समूची कांग्रेस को अपने अगले पूर्णकालिक अध्यक्ष के चेहरे के बारे में जानने की उत्सुकता है। इसके साथ-साथ कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी हैं, जो 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद से अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर बैठे हैं...
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कांग्रेस पार्टी में इस समय नेहरू-गांधी परिवार की तीन छवियां नेतृत्व कर रही हैं। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा। इसके अलावा गुट-23 के अधिकांश नेता हैं, जो उदयपुर में हुए नव संकल्प चिंतन शिविर से लौटे हैं। महेंद्र जोशी, रोहन गुप्ता, गौरव बल्लभ, अजय माकन समेत तमाम युवा नेता भी हैं जो 2022-27 के लिए नेहरू-गांधी परिवार से ही किसी अगले अध्यक्ष को देखना चाहते हैं। एक तरह से कहें कि समूची कांग्रेस को अपने अगले पूर्णकालिक अध्यक्ष के चेहरे के बारे में जानने की उत्सुकता है। इसके साथ-साथ कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी हैं, जो 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद से अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर बैठे हैं। तब से वह मनाए जा रहे हैं और अभी तक दोबारा अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभालने के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता भी हैरान हैं कि इस एक सवाल को छोड़कर पार्टी में सारी बातें हो रही हैं। न तो पार्टी में राहुल गांधी के प्रभाव की कमी है और न ही पिछले 8 साल से उनके राजनीतिक अभियान और मेहनत में। हालांकि कई बड़े नेता फोन पर मान लेते हैं कि दो-तीन महीने बाद जब भी चुनाव होगा, ताजपोशी राहुल की ही होगी। एक पूर्व महासचिव तो यहां तक कहते हैं कि मैं बात कांग्रेस की नहीं कर रहा हूं, लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि जो राहुल के राजनीतिक कैरियर के आड़े आएगा, उसका कांग्रेस में कैरियर खत्म हो जाएगा।
पूजा सिंघल का इतना ताना-बाना कि कम पड़ जाए पैमाना
झारखंड की महिला आईएएस अधिकारी पूजा सिंघल पर इस समय प्रवर्तन निदेशालय की जांच का शिकंजा कसा है। रसूख वाली पूजा सिंघल के ऊपर अभी जांच की तलवार और लटकनी है। सूत्र बताते हैं कि जल्द ही पूजा के खिलाफ देश की प्रमुख जांच एजेंसी सीबीआई भी सक्रिय हो सकती है। जहां तक बात पूजा सिंघल की है तो वह भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास के समय में भी पूरी धमक रखती थीं। जब रघुवर दास मुख्यमंत्री थे, तब भी प्रधानमंत्री कार्यालय पूजा सिंघल के कारनामों को लेकर चौकस हुआ था, लेकिन वफादार दास ने इसे दबाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। जब दास बचा रहे थे, तब भाजपा के एक सांसद की भी पूरे मामले पर नजर थी। आर्थिक मामले में वह बड़े खबरी माने जाते हैं। सांसद के बारे में एक बात और चलन में है। वह खबरों और शिकायतों का फायदा उठाकर खुद का किला भरने में नहीं चूकते। खबर है कि सूई उनकी तरफ भी घूम रही है। बताते हैं पूजा सिंघल के व्यवहार में लोच, अफसरी की हनक और प्रबंधकीय क्षमता ने उन्हें झारखंड में काफी पॉवरपुल बना दिया था। वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के किचन कैबिनेट तक उनकी पहुंच बताई जाती है। बताते हैं कि अभी तो राज खुलने की शुरुआत हो रही है। देखते जाइए कि आगे आगे क्या होता ?
क्या नीतीश का संकट कम करेगी भाजपा?
भाजपा के रणनीतिकारों को अभी भी बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का साफ विकल्प नहीं दिखाई दे रहा है। हाईकमान ने भी मुख्यमंत्री के कामकाजी व्यवहार की शिकायत करने वाले नेताओं को थोड़ा संभलकर चलने को कहा है। इसे भाजपा और नीतीश कुमार के बीच बढ़ी खटपट को मैनेज करने के रूप में देखा जा रहा है। नीतीश कुमार के रास्ते में दो नेता मुश्किलें बढ़ा रहे हैं। एक हैं विधानसभा अध्यक्ष विजय सिन्हा, तो दूसरे भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल। विधानसभा के पटल पर विजय सिन्हा और मुख्यमंत्री की नोकझोंक तो अब सबको पता है। नीतीश कुमार इसको लेकर कोई निर्णायक बदलाव चाहते हैं। दूसरी तरफ भाजपा के रणनीतिकारों की निगाह नीतीश कुमार के राबड़ी देवी के घर दावत में पहुंचने से लेकर हर घटनाक्रम पर टिकी है। इसके लिए भाजपा प्रदेश के नेताओं से लगातार फीडबैक भी ले रही है। इस फीडबैक के इरादे से धर्मेंद्र प्रधान भी पटना हो आए हैं। कुल मिलाकर अभी नीतीश कुमार की कुर्सी को तो कोई खतरा नहीं है, लेकिन भाजपा के लिए 2024 महत्वपूर्ण है। तेजस्वी यादव और लालू परिवार पहले से तैयार बैठा है। माना जा रहा है कि इसे भाजपा के नेता भी काफी गंभीरता से समझ रहे हैं।
ज्ञानवापी और ओवैसी का खटराग आखिर मामला क्या है?
बनारस में ज्ञानवापी मस्जिद में सर्वेक्षण का काम तीन दिनों तक चलता रहा। आसपास माहौल तनाव भरा बना रहा और वहां भारी पुलिस बल तैनात है, लेकिन सपा, बसपा, कांग्रेस अभी राजनीतिक मौसम की नजाकत देख रहे हैं। कांग्रेस आलाकमान इन्ही दिनों उदयपुर में नव संकल्प चिंतन शिविर में व्यस्त रही है। समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव चाचा शिवपाल, वरिष्ठ नेता आजम खान समेत कई मोर्चे पर अंदरुनी लड़ाई लड़ रहे हैं। बसपा की नेता मायावती भी मानो तेल और तेल की धार देखने का इंतजार कर रही हों। जबकि एआईएमआईएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी लगातार अपने तीखे तेवरों, तकरीरों से माहौल गरम कर रहे हैं। ओवैसी का यह खटराग लोगों की समझ में जरा कम आ रहा है। इसके अलग-अलग मायने भी निकाले जा रहे हैं। समाजवादी पार्टी के एक वरिष्ठ नेता तो यहां तक कहते हैं कि ज्ञानवापी पर जनता के रुख से भाजपा निराश है। इसलिए उसने अपना लक्ष्य साधने के लिए ओवैसी को काम पर लगा दिया है। ओवैसी का काम पर लगना उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी ठीक लग रहा है। वैसे भी बनारस प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र है।
फिर भी मुलायम चाहते हैं कि शिवपाल सपा में बने रहें
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के पिता मुलायम सिंह यादव चाहते हैं कि शिवपाल सिंह यादव समाजवादी पार्टी में बने रहें। हालांकि हाल में शिवपाल द्वारा दिए गए कुछ बयानों ने अखिलेश यादव को काफी निराश किया है। समाजवादी पार्टी के कई नेताओं को भी इस तरह की स्थिति पैदा होने की उम्मीद नहीं थी। हालांकि शिवपाल गुट के लोग इसका अपने हिसाब से तर्क दे रहे हैं। सपा के कुछ नेता इसे अखिलेश यादव का विधानसभा चुनाव से ठीक पहले अपने पैर पर खुद ही कुल्हाड़ी मारना भी बता रहे हैं। इधर शिवपाल की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के ओम प्रकाश राजभर से भी कुछ चर्चा होने की खबर है। राजनीति का पंख पकड़ने वालों को लग रहा है कि जल्द ही कुछ होगा। लखनऊ के एक सियासत दां तो यहां तक कहते हैं कि बसपा प्रमुख मायावती ने सतीश मिश्रा को विशेष मिशन पर लगा रखा है। यह गुफ्तगू ही है कि मायावती ने मिश्रा को यूं नहीं बल्कि किसी खास मकसद से लगाया है। ताकि 2024 के पहले समाजवादी पार्टी की भी कुछ मुश्किलें बढ़ाई जा सकें। शिवपाल, आजम और ऐसे तमाम प्रकरणों में उलझे अखिलेश भी इन सबके चलते सांगठनिक सुधार पर विशेष ध्यान नहीं दे पा रहे हैं।