सीट का समीकरण: चांदपुर सीट का सियासी गणित, कभी निर्दलीय का दबदबा; पिछले चुनाव में महज 234 वोट से हुआ फैसला
बिजनौर की चांदपुर विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास कई राजनीतिक बदलावों का गवाह रहा है। निर्दलीय उम्मीदवारों से लेकर कांग्रेस, भाजपा, बसपा और आरएलडी तक अलग-अलग दलों ने यहां जीत दर्ज की। 2022 में सपा ने बेहद करीबी मुकाबले में भाजपा को हराया था। आइए जानते हैं इस सीट का पूरा सियासी गणित...
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विस्तार
उत्तर प्रदेश में अगले साल यानी 2027 में विधानसभा के चुनाव होने हैं। इन चुनावों को लेकर अभी से राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। पक्ष और विपक्ष दोनों मतदाताओं को लुभाने में लग गए हैं। राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है। इसी चुनावी सरगर्मी के बीच, हम आपको उत्तर प्रदेश की हर विधानसभा सीट के इतिहास, सामाजिक ताने-बाने और उसके राजनीतिक परिदृश्य के बारे में हमारी खास सीरीज 'सीट का समीकरण' में विस्तार से बता रहे हैं। इसी कड़ी में आज बात बिजनौर जिले की चांदपुर (Chandpur) विधानसभा सीट की होगी। आइए, जानते हैं इस सीट का पूरा सियासी गणित और इसका अब तक का इतिहास क्या रहा है?
पहले जानते हैं चांदपुर सीट के बारे में
उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में से एक जिला बिजनौर है। जिले में कुल आठ विधानसभा सीटें हैं- नजीबाबाद, नगीना, बढ़ापुर, धामपुर, नहटौर, बिजनौर, चांदपुर और नूरपुर। 'सीट के समीकरण' आज की कड़ी में हम चांदपुर विधानसभा सीट की बात करेंगे। बिजनौर जिले की चांदपुर विधानसभा सीट वर्ष 1956 में परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई। इस क्षेत्र में पहला विधानसभा चुनाव भी वर्ष 1957 में आयोजित किया गया था। इस विधानसभा क्षेत्र के पहले विधायक नरदेव सिंह बने, जिन्होंने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़कर जीत हासिल की थी।
सबसे पहले बात 2022 चुनाव की
2022 के चुनावों की बात करें तो, चांदपुर से समाजवादी पार्टी (सपा) को कड़े मुकाबले में जीत मिली थी। इन चुनावों में चांदपुर विधानसभा सीट से सपा के स्वामी ओमवेश ने जीत हासिल की। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की कमलेश सैनी को महज 234 वोटों के अंतर से हराया। इस चुनाव में सपा के स्वामी ओमवेश को 90,522 वोट मिले, जबकि भाजपा की कमलेश सैनी को 90,288 वोट मिले। चुनाव में बसपा के शकील अहमद तीसरे नंबर पर रहे, जिन्हें 37,359 वोट मिले।
चांदपुर विधानसभा सीट के जातिगत समीकरण की बात करें तो कुल मतदाताओं में मुस्लिम, अनुसूचित जाति (SC) और जाट आबादी सबसे निर्णायक भूमिका निभाती है। क्षेत्र में सर्वाधिक आबादी मुस्लिम मतदाताओं की है, जो लगभग 44% हैं। इसके बाद अनुसूचित जाति (SC) लगभग 16%, जाट लगभग 12%, जबकि सैनी और चौहान मतदाता करीब 9-9% हैं। वहीं, बाकी अन्य जातियों के मतदाता हैं। जातिगत समीकरण की बात करें तो ये आबादी किसी भी प्रत्याशी की जीत-हार तय करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाती है।
चांदपुर विधानसभा सीट का चुनावी इतिहास
1957 में इस सीट पर सबसे पहले निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर नरदेव सिंह ने जीत हासिल की थी। इन चुनावों में नरदेव सिंह ने कांग्रेस के प्रत्याशी शिव कुमार को महज 362 वोटों से हराया था। चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी नरदेव सिंह को 20,624 वोट मिले, जबकि कांग्रेस के शिव कुमार को 20,262 वोट मिले।
इसके बाद 1962 में भी निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर नरदेव सिंह ने इस सीट से एक बार फिर जीत हासिल की। उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के चंदन सिंह और कांग्रेस के शिव कुमार को हराया। चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी नरदेव सिंह को 12,141 वोट मिले, जबकि सीपीआई और कांग्रेस को क्रमशः 10,982 और 9,991 वोट मिले।
1967 में भी यह सीट निर्दलीय उम्मीदवार के पास रही। 1967 के चुनाव में भी नरदेव सिंह ने इस सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर तीसरी बार जीत हासिल की। उन्होंने कांग्रेस के आर. सिंह को हराया था। चुनाव में तीसरे नंबर पर भारतीय जनसंघ (BJS) के एच. पी. शास्त्री रहे।
इसके बाद 1967 के बाद उत्तर प्रदेश में 1969 में ही दोबारा चुनाव कराने पड़े, क्योंकि 1967 के आम चुनाव के बाद बनी गठबंधन सरकार राजनीतिक अस्थिरता और दलबदल के कारण गिर गई थी।
1969 और 1974 का चुनाव
1969 में हुए चुनावों में चांदपुर सीट से भारतीय क्रांति दल (BKD) के शिव महेंद्र सिंह ने जीत हासिल की। उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार नरदेव सिंह को 11,400 वोटों से हराकर सीट पर कब्जा कर लिया। इन चुनावों में महेंद्र सिंह को 38,721 वोट मिले, जबकि कांग्रेस के उम्मीदवार नरदेव सिंह को 27,321 वोटों से ही संतोष करना पड़ा।
1974 में चांदपुर सीट पर भारतीय क्रांति दल ने अपनी पकड़ बनाए रखी। इस सीट पर बीकेडी के प्रत्याशी धर्म वीर सिंह ने कांग्रेस के बाबू रामपाल सिंह को 7,180 वोटों से हराया और सीट पर जीत हासिल की।
आपातकाल का समय
1974 के चुनावों के बाद देश में आपातकाल लगा दिया गया, जो 21 महीनों तक चला। मार्च 1977 में आपातकाल हटा और आम चुनाव हुए। इन चुनावों में कांग्रेस की हार हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में पहली गैर-कांग्रेसी 'जनता पार्टी' की सरकार बनी। इसके बाद जनता पार्टी की नई केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि कांग्रेस पार्टी देश की जनता का विश्वास खो चुकी है। इस आधार पर केंद्र सरकार ने उत्तर प्रदेश सहित कांग्रेस शासित 9 राज्यों की विधानसभाओं को समय से पहले भंग कर दिया और राष्ट्रपति शासन लगा दिया। इसके बाद राज्य में 1977 में दोबारा चुनाव हुए, जिसमें जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला और राम नरेश यादव उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने। हालांकि यह सरकार भी ज्यादा दिनों तक सत्ता में नहीं रह सकी।
1977 के चुनाव में चांदपुर सीट पर जनता पार्टी (जेएनपी) ने जीत हासिल की और भारतीय क्रांति दल को हार का सामना करना पड़ा। इन चुनावों में जनता पार्टी के धर्म वीर सिंह ने कांग्रेस के जगजीत सिंह को 7,825 वोटों से हराया।
हालांकि उत्तर प्रदेश में 1977 के बाद 1980 में फिर से विधानसभा चुनाव हुए, क्योंकि केंद्र में जनता पार्टी की सरकार 1980 आते-आते अंदरूनी कलह के कारण बिखर गई। पार्टी के विघटन के बाद जनवरी 1980 में लोकसभा चुनाव हुए। इस चुनाव में इंदिरा गांधी की अगुवाई वाली कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में जोरदार वापसी की। सत्ता में आते ही इंदिरा सरकार ने तर्क दिया कि हालिया लोकसभा चुनावों में जनता पार्टी को राज्यों में बुरी तरह हार मिली है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारों ने जनता का विश्वास खो दिया है। इसके बाद उत्तर प्रदेश समेत 9 राज्यों की विधानसभाओं को फिर भंग कर दिया गया।
विधानसभा भंग होने के बाद उत्तर प्रदेश में मई 1980 में दोबारा चुनाव कराए गए। इस चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारी बहुमत हासिल किया और विश्वनाथ प्रताप सिंह (वी.पी. सिंह) उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बने।
1980 का चुनाव
1980 में हुए इस चुनाव में चांदपुर सीट से कांग्रेस के दो उम्मीदवार मैदान में उतरे। इसमें पहला नाम अमीरउद्दीन का है, जिन्हें इंडियन नेशनल कांग्रेस के देवराज अर्स गुट की तरफ से चुनाव में उतारा गया, जबकि दूसरा नाम राम पाल सिंह था, जिन्हें इंदिरा गांधी के गुट से मैदान में उतारा गया। हालांकि चुनाव में देवराज अर्स के गुट के नेता अमीरउद्दीन ने जीत हासिल की। उन्होंने राम पाल सिंह को 12,604 वोटों से हराया।
1980 के बाद राज्य में 1985 में चुनाव हुए। इस चुनाव में चांदपुर सीट कांग्रेस के ही पास रही। 1985 के चुनावों में कांग्रेस के के. यू. देवेन्द्र सिंह ने लोक दल के प्रत्याशी अमीरूद्दीन उर्फ बादशाह को 7,889 वोटों के अंतर से हराया और सीट पर कांग्रेस की पकड़ बनाए रखी।
1989 का चुनाव
इसके बाद राज्य में 1989 में चुनाव हुए। इस चुनाव में चांदपुर सीट पर जनता दल को जीत मिली। 1989 के इन चुनावों में इस सीट पर पहली बार जनता दल के तेजपाल ने जीत हासिल की। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (BSP) के अमरुद्दीन को 32,563 वोटों के भारी अंतर से हराया।
1989 के बाद राजनीतिक अस्थिरता के कारण राज्य में 1991, 1993 और 1996 में चुनाव हुए। इन चुनावों में चांदपुर विधानसभा सीट का समीकरण भी बदलता रहा।
1991 के चुनाव में इस सीट पर पहली बार भाजपा ने जीत हासिल की। इस चुनाव में भाजपा के अमर सिंह ने बसपा के अमरुद्दीन को 16,839 वोटों के अंतर से हराया।
1993 और 1996 का चुनाव
वहीं, 1993 और 1996 के चुनाव में चांदपुर विधानसभा सीट पर निर्दलीय प्रत्याशियों का दबदबा रहा। इस सीट पर 1993 में तेजपाल सिंह ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर जीत हासिल की। उन्होंने भाजपा के अमर सिंह को महज 392 वोटों से हराया। जबकि 1996 में चांदपुर विधानसभा सीट पर निर्दलीय प्रत्याशी स्वामी ओमवेश ने जीत हासिल की। इन चुनावों में दूसरे नंबर पर बसपा की सुरेखा रहीं। इन चुनावों में निर्दलीय प्रत्याशी स्वामी ओमवेश को 54,124 वोट मिले, जबकि सुरेखा को 40,191 वोटों से ही संतोष करना पड़ा।
इसके बाद राज्य में 2002 में चुनाव हुए। इन चुनावों में चांदपुर विधानसभा सीट को राष्ट्रीय लोक दल (RLD) ने अपने नाम किया। इन चुनावों में आरएलडी के प्रत्याशी स्वामी ओमवेश ने जीत हासिल की। उन्होंने बसपा के प्रत्याशी राम अवतार सिंह को 10,667 वोटों के अंतर से हराया। इस चुनाव में चांदपुर सीट पर कांग्रेस तीसरे और सपा चौथे नंबर पर रही।
2012 और 2017 का चुनाव
2007 और 2012 के चुनावों की बात करें तो चांदपुर विधानसभा सीट पर बसपा ने अपनी पकड़ बनाए रखी। 2007 के चुनावों में बसपा के इकबाल ने भाजपा के राम अवतार सिंह को 30,000 से अधिक वोटों से हराया। वहीं, 2012 के चुनावों में बसपा के इकबाल ने सपा के शेरबाज खान को 15,013 वोटों के अंतर से हराया। 2012 के चुनाव में चांदपुर से भाजपा की कविता सिंह तीसरे नंबर पर रहीं।
वहीं 2017 के चुनाव की बात करें तो चांदपुर विधानसभा सीट पर भाजपा ने वापसी की। इन चुनावों में भाजपा की प्रत्याशी कमलेश सैनी ने जीत हासिल की। चुनावों में उन्होंने बसपा के मोहम्मद इकबाल को 35,000 से अधिक वोटों के अंतर से हराया। इन चुनावों में सपा तीसरे नंबर पर रही।