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UP: चुनाव से पहले इंडिया गठबंधन की नई रणनीति, इन जाति के युवाओं पर फोकस; कांग्रेस और सपा का ये है पूरा प्लान

Sun, 16 Aug 2026 08:07 AM IST
Sharukh Khan अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ
अमर उजाला नेटवर्क, लखनऊ Published by: Sharukh Khan Updated Sun, 16 Aug 2026 08:07 AM IST
सार

यूपी में 2027 का चुनाव फतेह करने के लिए इंडिया गठबंधन ने नया प्लान बनाया है। दोनों पार्टियां सामान्य सीट पर भी दलित युवाओं को प्रभारी बना रही है। कांग्रेस और सपा का पिछड़े वर्ग के युवाओं पर फोकस है।

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india alliance - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

भाजपा और उसके सहयोगी दल सरकार के कामकाज गिनाते हुए जातिगत समीकरण साध रहे हैं। विपक्ष भी हर सीट पर सियासी गणित बैठाने में व्यस्त है। कांग्रेस और सपा के बीच गठबंधन तय माना जा रहा है। दोनों पार्टियों ने समाजवादी और आंबेडकर विचारधारा को धार देने वाले युवाओं को चिह्नित किया है। 
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इन युवाओं को अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों की जिम्मेदारी सौंपी जा रही है। प्रभारियों को विचारधारा से जुड़े युवाओं को जोड़ने और पीडीए को मजबूत करने का लक्ष्य दिया गया है। सपा और कांग्रेस ने कई दलित युवाओं को सामान्य सीट पर प्रभारी बनाकर नया दांव चला है। 
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इससे परंपरागत वोटबैंक की लामबंदी बढ़ेगी और बसपा से खिन्न युवा भी जुड़ेंगे। समाजवादी पार्टी ने ऊंचाहार में मनोज पासवान, बाबागंज में शिवशंकर सरोज और कौशांबी-फतेहपुर में राम करन निर्मल को जिम्मेदारी दी है। 
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मधुबन से विनीत कुशवाहा को मिली जिम्मेदारी
मधुबन से विनीत कुशवाहा और कुशीनगर से राहुल राज को भी मैदान में उतारा गया है। कांग्रेस ने बलिया से शैलेंद्र ध्रुव यादव, वेल्थरा रोड से मुरली मनोहर, बिलग्राम से सुभाष पाल और गौरा से तरुण पटेल को युवाओं को जोड़ने का काम सौंपा है। 
 

बसपा की सियासी नर्सरी से छिटक रहे कई ब्राह्मण नेता
उधर, बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री मायावती आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी का वजूद बचाने के लिए एक बार फिर ब्राह्मणों पर दांव लगाने की तैयारी में हैं। हालांकि, पार्टी के कई कद्दावर ब्राह्मण नेता लगातार उनका साथ छोड़ते गए हैं। अंटू मिश्रा का निष्कासन इसकी ताजा कड़ी है। बीते एक दशक में कई ऐसे नेता बसपा से दूर हुए, जिन्होंने अपनी राजनीति का ककहरा हाथी पर सवार होकर सीखा था।

यह कहना गलत न होगा कि बसपा की सियासी नर्सरी कद्दावर ब्राह्मण नेताओं से खाली होती जा रही है। वर्ष 2007 में बसपा ने 80 से अधिक ब्राह्मणों को टिकट देकर चुनावी मैदान में उतारा था। इनमें 41 जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। पार्टी की यह सोशल इंजीनियरिंग इतनी सफल रही कि दूसरे दलों ने भी इसका अनुसरण किया। मगर वर्ष 2017 का विधानसभा चुनाव आते-आते ब्राह्मण नेताओं का पार्टी से मोहभंग शुरू हो गया।
 

मौजूदा भाजपा सरकार के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक इसका प्रमुख उदाहरण हैं। बसपा ने उन्हें सांसद बनाया था लेकिन चुनाव से पहले उन्होंने भाजपा का दामन थाम लिया। बाद में यह फैसला उनके राजनीतिक भविष्य के लिए मुफीद साबित हुआ।

पूर्व मंत्री नकुल दुबे ने 2022 में बसपा छोड़कर कांग्रेस का रुख किया। पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय (अब दिवंगत), रंगनाथ मिश्रा तथा विनय शंकर तिवारी और उनका पूरा कुनबा भी बसपा से दूर हो गया।

पूर्व विधान परिषद सभापति गणेश शंकर पांडेय समेत सरकार में उच्च पद पाने वाले कई अन्य ब्राह्मण नेता भी समय के साथ दूसरे दलों में चले गए। अंबेडकरनगर से बसपा सांसद व विधायक रहे राकेश पांडेय और उनके बेटे व बसपा सांसद रहे रितेश पांडेय भी पार्टी का साथ छोड़ चुके हैं।
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