राजनीति: क्या मुस्लिम मतदाता कांग्रेस को देंगे एकमुश्त वोट या भाजपा का 'पसमांदा फैक्टर' करेगा काम
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विस्तार
मुसलमान मतदाताओं के बारे में एक आमराय रही है कि वे उसी पार्टी या उम्मीदवार को वोट देते हैं, जो भाजपा को हराने का दमखम रखता हो। चर्चा यह भी है कि इस बार मुस्लिम मतदाता कांग्रेस के साथ एकजुट हो सकते हैं। ऐसा होता है तो इससे कांग्रेस को लाभ हो सकता है। लेकिन हाल ही में त्रिपुरा विधानसभा की एक मुस्लिम बहुल सीट पर भाजपा उम्मीदवार को मिली जीत यह बताने के लिए पर्याप्त है कि मुसलमान मतदाता भी अब बदल रहा है और भाजपा के प्रति उसकी सोच बदल रही है। भाजपा भी पसमांदा दांव खेलकर उन्हें अपने साथ लाने के लिए काम कर रही है। ऐसे में बड़ा प्रश्न रहेगा कि इस चुनाव में मुसलमान मतदाता किधर जाएगा? वह कांग्रेस के पक्ष में एकजुट होगा, या भाजपा का पसमांदा दांव काम कर जाएगा।
मुसलमानों की संख्या
2011 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या में मुसलमानों की हिस्सेदारी 14.2 फीसदी है। चुनावी राज्य राजस्थान में मुसलमानों की जनसंख्या 9.07 फीसदी, मध्यप्रदेश में 6.57 फीसदी और छत्तीसगढ़ में 2.02 फीसदी है। छत्तीसगढ़ में 1.92 फीसदी ईसाई भी रहते हैं। ये सभी अल्पसंख्यक समुदाय अपने क्षेत्रों में कई विधानसभा सीटों को प्रभावित करते हैं।
राजस्थान में मुसलमान
राजस्थान विधानसभा की कुल 200 सीटों में से 40 सीटें ऐसी हैं, जो मुस्लिम बहुल मानी जाती हैं। यहां हार-जीत का निर्णय मुसलमान मतदाताओं के भरोसे रहता है। इनमें 15 सीटें ऐसी हैं, जहां केवल मुस्लिम प्रत्याशियों को ही जीत मिलती है। संभवतः यही कारण है कि यहां भाजपा भी मुस्लिम प्रत्याशी खड़े करती है।
यदि कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत मुसलमानों को रिझाने के लिए तमाम प्रयास करते दिखाई पड़ते हैं, तो इसका बड़ा कारण यह है कि इन 40 मुस्लिम बहुल सीटों में इस समय 33 सीटों पर कांग्रेस काबिज है। (कांग्रेस के 29 प्रत्याशी जीते थे। बाद में तीन बसपा और एक निर्दलीय प्रत्याशियों के कांग्रेस में आ जाने से कांग्रेस की कुल संख्या 33 हो गई।) 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 16 मुसलमान उम्मीदवारों को प्रत्याशी बनाया था, इसमें नौ को जीत हासिल हुई थी।
भाजपा भी खड़े करती है मुसलमान प्रत्याशी, पाती है सफलता
इन 40 मुस्लिम बहुल सीटों में भी भाजपा 2018 के विधानसभा चुनाव में सात सीटों पर जीतने में कामयाब रही थी। इसका सबसे बड़ा कारण मुसलमान मतदाताओं के अलग-अलग खेमों में बंटना भी हो सकता है। लेकिन इस बार मुसलमान मतदाता जिस तरह की रणनीति अपनाता दिखाई पड़ रहा है, उसमें हो सकता है कि यह बंटवारा देखने को न मिले, और यदि ऐसा होता है तो इसका सीधा लाभ कांग्रेस को हो सकता है।
हालांकि, इसी के साथ महत्त्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि 2013 में कांग्रेस के सभी 19 मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव हार गए थे, जबकि इसी चुनाव में भाजपा ने चार मुसलमानों को टिकट दिया था, जिसमें दो को जीत हासिल हुई। 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने एक मुस्लिम प्रत्याशी को खड़ा किया था, वह भी चुनाव हार गया था। कांग्रेसी दिग्गज नेता सचिन पायलट की सीट टोंक मुस्लिम बहुल है।
मध्यप्रदेश में मुसलमान
मध्यप्रदेश की कुल आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी 6.57 फीसदी है। राज्य के 19 जिलों में मुसलमानों की जनसंख्या एक लाख से ऊपर है और कुल आबादी लगभग 50 लाख है। इनमें 60 प्रतिशत से ज्यादा पसमांदा मुसलमान हैं, जिनको लेकर भाजपा इस बार ज्यादा सक्रिय है। राज्य की लगभग 25 सीटों पर मुसलमानों की आबादी प्रभावी मानी जाती है, जबकि इनमें से आधी सीटों पर जीत-हार का निर्णय वही करते हैं। इनमें इंदौर 1, इंदौर 3, इंदौर 5, उज्जैन, उज्जैन दक्षिण, जावरा, ग्वालियर, खरगोन, देपालपुर, महिदपुर, बुरहानपुर, मंदसौर, शाजापुर, जबलपुर, इछावर, आष्टा, खंडवा, मंडला, रतलाम, नीमच और नसरुल्लागंज शामिल हैं।
हालांकि, मध्यप्रदेश के पहले विधानसभा चुनाव में चार मुसलमान नेताओं के जीतने से शुरू हुई यात्रा कभी अधिक कभी कम होती रही है। 1962 के चुनाव में सात मुस्लिम प्रत्याशी जीते, तो 1993 के चुनाव में एक भी मुसलमान जीत नहीं दर्ज कर सका। 2003, 2008, 2013 के चुनावों में केवल एक ही मुसलमान प्रत्याशी जीत दर्ज कर सका। ये प्रत्याशी थे आरिफ अकील जो भोपाल उत्तर से कई बार चुनाव जीतते रहे। भाजपा भी यहां पर मुसलमान प्रत्याशी उतारती रही है, जिसमें कुछ को जीत भी हासिल हुई है। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा ने फातिमा सिद्दीकी को तो कांग्रेस ने तीन मुसलमान प्रत्याशियों को मैदान में उतारा था।
छत्तीसगढ़ में मुसलमान
छत्तीसगढ़ में कुल 90 विधानसभा सीटें हैं। राज्य में मुसलमानों की कुल आबादी केवल 2.02 फीसदी है। जैन समुदाय यहां मुसलमानों की तुलना में बहुत कम यानी केवल 0.24 फीसदी है। फिर भी अपनी प्रभावी भूमिका के कारण अब तक सात जैन समाज के लोग विधानसभा पहुंच चुके हैं। राज्य की केवल तीन विधानसभा सीटों (भिलाई, रायपुर और बिलासपुर) को मुस्लिम बहुल माना जाता है। हालांकि, इसके बाद भी भाजपा इन सीटों पर पारंपरिक रूप से मजबूत रही है।
त्रिपुरा ने बताया बदल रहा मुसलमान- भाजपा
भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चे के राष्ट्रीय अध्यक्ष जमाल सिद्दीकी ने अमर उजाला से कहा कि पूरी तरह मुस्लिम बाहुल्य वाली त्रिपुरा विधानसभा की सीट पर भाजपा को मिली जीत ने यह सिद्ध कर दिया है कि मुसलमानों में उनकी पार्टी को लेकर सोच बदल रही है। मुसलमान यह देख रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने उन्हें हर कल्याणकारी योजना का लाभ बिना किसी भेदभाव के पहुंचाया है।
पसमांदा का सम्मान करेगा काम
प्रधानमंत्री आवास योजना हो या राशन योजना, उज्जवला गैस योजना हो या छोटे कर्ज उपलब्ध कराने की योजना, इसका सबसे ज्यादा लाभ मुसलमानों को ही हुआ है। इस बीच प्रधानमंत्री की कोशिशों से पार्टी ने मुसलमानों के बीच पहुंच बनाने का प्रयास किया है। पसमांदा मुसलमानों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश हुई है। पार्टी के मंच पर पसमांदा मुसलमानों को सम्मानित करने का काम किया जा रहा है जिससे उनके बीच भाजपा को लेकर सोच बदल रही है। भाजपा का अनुमान है कि उसे राजस्थान, मध्यप्रदेश सहित सभी चुनावी राज्यों में मुसलमान मतदाताओं का समर्थन मिलेगा।