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Population Control: जनसंख्या नियंत्रण कानून के निशाने पर केवल मुसलमान? 2024 में बड़ा मुद्दा बनाने की तैयारी!

अमर उजाला ब्यूरो Published by: रोहित राज Updated Sat, 22 Oct 2022 01:31 PM IST
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सार
आरोप है कि देश हिंदुओं की आबादी घट रही है, जबकि मुसलमानों की आबादी विभिन्न कारणों से अनियंत्रित गति से बढ़ रही है। ये आरोप कितने सही हैं? केंद्र सरकार सर्वोच्च न्यायालय में जनसंख्या नियंत्रण कानून लाने की आवश्यकता से इनकार कर चुकी है। ऐसे में जनसंख्या पर लगाम कैसे लगेगी?
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Population Control is Only Muslims on target of population control law Preparing to make a big issue in 2024
प्रतीकात्मक फोटो - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार


भाजपा और संघ परिवार के लिए मुसलमानों की बढ़ती जनसंख्या हमेशा से एक बड़ा मुद्दा रहा है। हाल के दिनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत संघ प्रमुख मोहन भागवत और तमाम नेताओं ने इसे एक मुहिम की तरह उठाया है। साफ है कि आने वाले चुनाव में भी इसे एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी नजर आने लगी है। पिछले कुछ समय से अवैध धर्मांतरण और जनसंख्या असंतुलन जैसे सवाल तेजी से उठने लगे हैं।

पीएम नरेंद्र मोदी ने 2019 में लालकिले से दिए अपने भाषण में बढ़ती जनसंख्या पर चिंता जताई थी। इसी वर्ष दशहरे पर नागपुर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने जनसंख्या बढ़ने पर चिंता जताई और कहा कि जनसंख्या में असंतुलन से देश विभाजन का खतरा पैदा होता है। इसी क्रम में आरएसएस महासचिव दत्तात्रेय होसबोले ने प्रयागराज में जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए एक कानून की जरूरत बताई। माना जा रहा है कि संघ और सरकार के विभिन्न मंचों से जनसंख्या वृद्धि पर व्यक्त की जा रही इन चिंताओं के निशाने पर मुसलमान हैं। आरोप है कि देश हिंदुओं की आबादी घट रही है, जबकि मुसलमानों की आबादी विभिन्न कारणों से अनियंत्रित गति से बढ़ रही है। ये आरोप कितने सही हैं? केंद्र सरकार सर्वोच्च न्यायालय में जनसंख्या नियंत्रण कानून लाने की आवश्यकता से इनकार कर चुकी है। ऐसे में जनसंख्या पर लगाम कैसे लगेगी?


मुस्लिम निशाने पर क्यों?
आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 1951 में देश में हिंदुओं की आबादी 84.1 प्रतिशत थी जो अब घटकर 79.8 प्रतिशत रह गई है, जबकि 1951 में मुसलमानों की जनसंख्या लगभग 9.8 प्रतिशत थी, जो अब बढ़कर 14.2 प्रतिशत तक पहुंच गई है। 2001 की तुलना में 2011 में हिंदुओं की आबादी में 17 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि इसी दौरान मुसलमानों की आबादी 25 प्रतिशत तक बढ़ी। 1991 से 2001 के दौरान हिंदुओं की आबादी 20 प्रतिशत बढ़ी, जबकि इसी दौरान मुसलमानों की आबादी में 36 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

धर्मांतरण और घुसपैठ भी बड़ा कारण
भारत में मुसलमानों की बढ़ती आबादी का एक बड़ा कारण अवैध धर्मांतरण और घुसपैठ भी माना जाता है। यह वह कारण है जिससे संघ परिवार सबसे ज्यादा चिंतित है। एक अनुमान के मुताबिक़ भारत में करीब 32 लाख अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिए रहते हैं। इसी तरह नौ लाख पाकिस्तानी, पांच लाख नेपाली और दो लाख के करीब अन्य पड़ोसी देशों के अवैध घुसपैठिए भारत में रहते हैं। आधिकारिक संख्या इससे बहुत अधिक आंकी जाती है। घुसपैठियों में सबसे ज्यादा संख्या मुसलमानों की है।  

अमेरिकी प्यू रिसर्च सेंटर के एक अनुमान के अनुसार, यदि भारत में जनसंख्या वृद्धि दर इसी तरह होती रही तो 2050 तक दुनिया में सबसे ज्यादा मुसलमान भारत में रह रहे होंगे। इस समय भारत में मुसलमानों की आबादी 31 करोड़ से ज्यादा हो चुकी होगी। इस दौरान भारत की कुल आबादी 166 करोड़ के लगभग हो सकती है। हालांकि, कुल आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी उस समय भी 18 प्रतिशत के आसपास होगी।  

यहां अल्पसंख्यक हुए हिंदू
संघ परिवार का आरोप है कि अवैध धर्मांतरण जनसंख्या असंतुलन का बड़ा कारण है। अलग-अलग क्षेत्रों में हिंदू समुदाय के लोगों को मुस्लिम-ईसाई बनाकर विभिन्न क्षेत्रों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक बनाया जा रहा है। पूर्वोत्तर के राज्यों और आदिवासी बहुल इलाकों में इसकी कोशिश सबसे ज्यादा होती है। इस नीति का परिणाम हुआ है कि मेघालय, मिजोरम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, लक्षद्वीप और अंडमान निकोबार द्वीप समूह सहित देश के 11 राज्यों में हिंदू अल्पसंख्यक हो गए हैं।  

प्रति महिला पैदा हो रहे ज्यादा बच्चे
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) 1992-93 में हिंदू महिलाओं की फर्टिलिटी रेट (प्रति वयस्क महिला द्वारा पैदा किए जा रहे बच्चों की औसत संख्या) 3.3 थी, जबकि मुस्लिम महिलाओं में यह संख्या 4.4 थी। 2021 के पांचवें NFHS आंकड़े के अनुसार अब हिंदू महिलाओं का फर्टिलिटी रेट 1.9 और मुस्लिम महिलाओं का फर्टिलिटी रेट 2.3 है। दो से कम फर्टिलिटी रेट का अर्थ है कि हिंदुओं की आबादी घट रही है, जबकि दो से अधिक होने का अर्थ है कि मुसलमानों की आबादी बढ़ रही है। वर्तमान आबादी को बनाये रखने के लिए 2.1 जन्मदर को आदर्श माना जाता है। हालांकि, हिंदू-मुस्लिम दोनों ही समाजों में प्रति महिला बच्चे पैदा करने की संख्या में कमी आई है।

मुस्लिम कितने जिम्मेदार
उत्तराखंड सरकार द्वारा राज्य में ‘सामान नागरिक संहिता लाने के लिए गठित कमेटी के प्रमुख सदस्य और जनसंख्या विशेषज्ञ मनु गौड़ ने अमर उजाला से कहा कि जनसंख्या वृद्धि के मामले को धार्मिक दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए, अन्यथा हम इसके वास्तविक कारण को नहीं पहचान पाएंगे और इस गंभीर समस्या का सही निदान करना संभव नहीं होगा। 2011 के आंकड़ों में देश में 15.75 करोड़ महिलाओं के पास तीन या इससे अधिक बच्चे थे।

इनमें मुस्लिम महिलाओं की संख्या केवल चार करोड़ के आसपास थी, जबकि 11 करोड़ से अधिक महिलाएं हिंदू और अन्य दूसरे समुदायों से थीं। इसलिए देश की बढ़ती आबादी में केवल मुस्लिमों को जिम्मेदार नहीं कहा जा सकता। इस समस्या के समाधान के लिए सभी धर्मों के लोगों के लिए एक सामान नीति लानी चाहिए और इसका पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

अति गरीबों की संख्या 36 करोड़
उन्होंने कहा कि भारत परिवार नियोजन अपनाने वाला दुनिया का पहला देश है। देश की आज़ादी के कुछ समय बाद 1952 में ही इसके लिए भारत ने नीतियां बनानी शुरू कर दी थीं। 1961 में गरीब परिवारों की जानकारी एकत्र करने के लिए एक सर्वे हुआ था। इस सर्वे में देश की 36 करोड़ की आबादी में 11 करोड़ लोगों को अति गरीब की श्रेणी में रखा गया था। आज यह संख्या उस समय की कुल जनसंख्या के बराबर हो चुकी है। यानी इस समय देश में अति गरीबों की संख्या 36 करोड़ पहुंच चुकी है। यानी अच्छे विकास के बाद भी देश में अति गरीबों की संख्या में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई है।

भारत परिवार नियोजन उपायों के प्रचार-प्रसार पर 1974 से लगभग तीन लाख करोड़ रूपये खर्च कर चुका है। यदि इस धनराशि को आज के मूल्यों में बदलें तो यह लगभग 30 लाख करोड़ रूपये होगा जो भारत की एक वर्ष के सकल घरेलू उत्पाद के बराबर होगा।

गरीबी और आबादी में सीधा संबंध
सबसे ज्यादा फर्टिलिटी रेट बिहार की महिलाओं में है और यह सबसे गरीब राज्यों में भी गिना जाता है। केरल सबसे कम फर्टिलिटी रेट वाले राज्यों में आता है और यह सबसे संपन्न राज्यों की श्रेणी में आता है। इस प्रकार का अध्ययन बताता है कि फर्टिलिटी रेट का गरीबी और अशिक्षा से सीधा संबंध है। इसका सीधा निष्कर्ष यह है कि शिक्षा और रोजगार के अवसरों में वृद्धि से जनसंख्या दर में कमी लाई जा सकती है। वैश्विक आंकड़े भी इस बात की पुष्टि करते हैं।

संसाधनों पर भारी बोझ
भारत के पास दुनिया की केवल 2.4 प्रतिशत भूमि और चार प्रतिशत जल उपलब्ध है, जबकि इस पर करीब 20 प्रतिशत आबादी का बोझ है। अनुमान है कि 2030 तक देश की 40 प्रतिशत आबादी को हम स्वच्छ जल उपलब्ध कराने की स्थिति में भी नहीं होंगे और हंगर इंडेक्स में भारत का स्थान और नीचे खिसक सकता है। देश में केवल एक प्रतिशत लोग टैक्स देते हैं और इसी धन पर 99 फीसदी लोगों की व्यवस्था करनी होती है। किसी आपात स्थिति से देश को बचाने के लिए इस मुद्दे पर सबको साथ लेकर चलने की आवश्यकता है।
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