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Rupee Vs Dollar: क्या डॉलर के मुकाबले रुपया मजबूत कर सकते हैं RBI के पूर्व गवर्नर? जानें किसने दी सलाह
Fri, 21 Oct 2022 02:55 PM IST
हिमांशु मिश्रा
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु मिश्रा
Updated Fri, 21 Oct 2022 02:55 PM IST
सार
सवाल उठ रहा है कि क्या वाकई में रघुराम राजन डॉलर के मुकाबले रुपया को मजबूत कर सकते हैं? जब रघुराम राजन आरबीआई के गर्वनर थे, तब रुपये की क्या स्थिति थी? आइए जानते हैं...
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आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
डॉलर के मुकाबले रुपया लगातार कमजोर होता जा रहा है। बुधवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया अब तक के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया। यह 61 पैसे की गिरावट के साथ 83 के पार यानी 83.01 पर बंद हुआ। यह पहली बार है जब एक डॉलर की कीमत 83 रुपये के पार हुई है। इसको लेकर विपक्ष ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया है।
पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री और कांग्रेस नेता पी चिदंबरम का एक बयान भी आया है। उन्होंने सरकार पर कटाक्ष करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सलाह दी। उन्होंने कहा कि अगर डॉलर के मुकाबले रुपये को मजबूत करना है तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पूर्व गवर्नर डॉ. रघुराम राजन से सलाह लेनी चाहिए।
सवाल उठ रहा है कि क्या वाकई में रघुराम राजन डॉलर के मुकाबले रुपया को मजबूत कर सकते हैं? जब रघुराम राजन आरबीआई के गर्वनर थे, तब रुपये की क्या स्थिति थी? आइए जानते हैं...
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पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री और कांग्रेस नेता पी चिदंबरम का एक बयान भी आया है। उन्होंने सरकार पर कटाक्ष करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सलाह दी। उन्होंने कहा कि अगर डॉलर के मुकाबले रुपये को मजबूत करना है तो भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पूर्व गवर्नर डॉ. रघुराम राजन से सलाह लेनी चाहिए।
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सवाल उठ रहा है कि क्या वाकई में रघुराम राजन डॉलर के मुकाबले रुपया को मजबूत कर सकते हैं? जब रघुराम राजन आरबीआई के गर्वनर थे, तब रुपये की क्या स्थिति थी? आइए जानते हैं...
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पहले जानिए पी. चिदंबरम ने क्या कहा?
चिदंबरम ने प्रधानमंत्री मोदी को सलाह दी। बोले, 'प्रधानमंत्री से मेरा निवेदन है कि रुपये में यदि सुधार चाहते हैं तो उन्हें इस पर विचार करने के लिए तुरंत डॉ रघुराम राजन, डॉ सी रंगराजन, डॉ वाई वी रेड्डी, डॉ राकेश मोहन और श्री मोंटेक सिंह अहलूवालिया की बंद कमरे में बैठक बुलानी चाहिए। इस बैठक में वित्त मंत्री, आरबीआई गवर्नर और अधिकारी भी मौजूद होने चाहिए।'
चिदंबरम ने अपने ट्विट में आगे लिखा कि सरकार रुपये के मूल्य में लगातार गिरावट के खिलाफ असहाय दिख रही है। गिरते रुपये का असर मुद्रास्फीति, चालू खाता घाटे और ब्याज दरों पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि सरकार को देश के पूर्व अर्थशास्त्रियों से अनुभव लेने की जरूरत है। बता दें कि रंगराजन, वाईवी रेड्डी और रघुराम राजन आरबीआई के पूर्व गवर्नर रहे हैं। राकेश मोहन डिप्टी गवर्नर गवर्नर रहे हैं। वहीं, मोंटेक सिंह अहलूवालिया यूपीए सरकार के दौरान योजना आयोग के उपाध्यक्ष थे।
चिदंबरम ने प्रधानमंत्री मोदी को सलाह दी। बोले, 'प्रधानमंत्री से मेरा निवेदन है कि रुपये में यदि सुधार चाहते हैं तो उन्हें इस पर विचार करने के लिए तुरंत डॉ रघुराम राजन, डॉ सी रंगराजन, डॉ वाई वी रेड्डी, डॉ राकेश मोहन और श्री मोंटेक सिंह अहलूवालिया की बंद कमरे में बैठक बुलानी चाहिए। इस बैठक में वित्त मंत्री, आरबीआई गवर्नर और अधिकारी भी मौजूद होने चाहिए।'
चिदंबरम ने अपने ट्विट में आगे लिखा कि सरकार रुपये के मूल्य में लगातार गिरावट के खिलाफ असहाय दिख रही है। गिरते रुपये का असर मुद्रास्फीति, चालू खाता घाटे और ब्याज दरों पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि सरकार को देश के पूर्व अर्थशास्त्रियों से अनुभव लेने की जरूरत है। बता दें कि रंगराजन, वाईवी रेड्डी और रघुराम राजन आरबीआई के पूर्व गवर्नर रहे हैं। राकेश मोहन डिप्टी गवर्नर गवर्नर रहे हैं। वहीं, मोंटेक सिंह अहलूवालिया यूपीए सरकार के दौरान योजना आयोग के उपाध्यक्ष थे।
अब जानिए रघुराम राजन के समय डॉलर के मुकाबले रुपये की क्या स्थिति थी?
रघुराम राजन रिजर्व बैंक के 23वें गवर्नर थे। उनका कार्यकाल 2013 से 2016 के बीच रहा। चार सितंबर को जब उन्होंने आरबीआई के गवर्नर का पद जॉइन किया तब एक डॉलर की कीमत 67.03 रुपया थी। इसके बाद 2014 तक ये घटकर 63.17 रुपया हो गई। मतलब इस दौरान रुपए की स्थिति में काफी सुधार हुआ। 2015 में फिर से रुपया की स्थिति कमजोर होने लगी और एक डॉलर की कीमत 63.17 से बढ़कर 66.16 रुपये पहुंच गई। 2016 में ये स्थिर बनी रही और जब रघुराम राजन का कार्यकाल खत्म हुआ यानी चार सितंबर 2016 को एक डॉलर की कीमत 66.67 रुपए थी। मतलब राजन के तीन साल के कार्यकाल में रुपया सुधार की तरफ भी बढ़ा और फिर 2013 की स्थिति के करीब आकर ही रुक गया।
अब 2016 से 2018 के बीच के आंकड़े भी देख लेते हैं, जब उर्जित पटेल गवर्नर थे। उन दो वर्षों में एक डॉलर की कीमत 67.19 रुपये से बढ़कर 69.79 रुपये पहुंची थी। मतलब दो साल में भारतीय करंसी 2.6 रुपया कमजोर हुई।
इसके बाद 2019-2020 में कोरोनाकाल के दौरान सबसे ज्यादा भारतीय मुद्रा को नुकसान पहुंचा। एक साल के अंदर डॉलर के मुकाबले रुपया करीब चार रुपये तक गिरा। 2019 में एक डॉलर की कीमत 70.42 रुपया थी, जो 2020 तक 74.10 रुपये पहुंच गई। 2021 में इसमें सुधार देखने को मिला और एक डॉलर की कीमत 74.10 से घटकर 73.91 रुपया पहुंच गई। इस साल इसमें सबसे ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। अब एक डॉलर की कीमत 83.01 रुपया पहुंच गई है। आंकड़ों को देखें तो रुपये का सतत अवमूल्यन जारी है। बीते कुछ दिनों से इसमें तेजी आई है।
रघुराम राजन रिजर्व बैंक के 23वें गवर्नर थे। उनका कार्यकाल 2013 से 2016 के बीच रहा। चार सितंबर को जब उन्होंने आरबीआई के गवर्नर का पद जॉइन किया तब एक डॉलर की कीमत 67.03 रुपया थी। इसके बाद 2014 तक ये घटकर 63.17 रुपया हो गई। मतलब इस दौरान रुपए की स्थिति में काफी सुधार हुआ। 2015 में फिर से रुपया की स्थिति कमजोर होने लगी और एक डॉलर की कीमत 63.17 से बढ़कर 66.16 रुपये पहुंच गई। 2016 में ये स्थिर बनी रही और जब रघुराम राजन का कार्यकाल खत्म हुआ यानी चार सितंबर 2016 को एक डॉलर की कीमत 66.67 रुपए थी। मतलब राजन के तीन साल के कार्यकाल में रुपया सुधार की तरफ भी बढ़ा और फिर 2013 की स्थिति के करीब आकर ही रुक गया।
अब 2016 से 2018 के बीच के आंकड़े भी देख लेते हैं, जब उर्जित पटेल गवर्नर थे। उन दो वर्षों में एक डॉलर की कीमत 67.19 रुपये से बढ़कर 69.79 रुपये पहुंची थी। मतलब दो साल में भारतीय करंसी 2.6 रुपया कमजोर हुई।
इसके बाद 2019-2020 में कोरोनाकाल के दौरान सबसे ज्यादा भारतीय मुद्रा को नुकसान पहुंचा। एक साल के अंदर डॉलर के मुकाबले रुपया करीब चार रुपये तक गिरा। 2019 में एक डॉलर की कीमत 70.42 रुपया थी, जो 2020 तक 74.10 रुपये पहुंच गई। 2021 में इसमें सुधार देखने को मिला और एक डॉलर की कीमत 74.10 से घटकर 73.91 रुपया पहुंच गई। इस साल इसमें सबसे ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। अब एक डॉलर की कीमत 83.01 रुपया पहुंच गई है। आंकड़ों को देखें तो रुपये का सतत अवमूल्यन जारी है। बीते कुछ दिनों से इसमें तेजी आई है।
कैसे मजबूत हो सकता है रुपया?
इसे समझने के लिए हमने आर्थिक मामलों के जानकार प्रो. प्रदीप जोशी से बात की। वह कहते हैं, 'यह सही है कि डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति लगातार खराब हो रही है, लेकिन अच्छी बात ये है कि अन्य देशों की मुद्रा के मुकाबले इसमें सुधार भी हुआ है। मसलन पाउंड, यूरो व अन्य मजबूत देशों की करंसी के आगे भारतीय रुपये की स्थिति ठीक हुई है।'
प्रो. जोशी आगे कहते हैं, 'अभी पूरी दुनिया कोरोना और रूस-यूक्रेन युद्ध के दुष्प्रभाव से जूझ रही है। ऐसे में भारत कैसे इससे बचा रह सकता है? अभी भारत के पास विदेशी मुद्रा में कमी आ रही है। इसमें बढ़ोतरी होगी तो डॉलर के मुकाबले भारतीय मुद्रा अपने आप मजबूत हो जाएगा।'
इसे समझने के लिए हमने आर्थिक मामलों के जानकार प्रो. प्रदीप जोशी से बात की। वह कहते हैं, 'यह सही है कि डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति लगातार खराब हो रही है, लेकिन अच्छी बात ये है कि अन्य देशों की मुद्रा के मुकाबले इसमें सुधार भी हुआ है। मसलन पाउंड, यूरो व अन्य मजबूत देशों की करंसी के आगे भारतीय रुपये की स्थिति ठीक हुई है।'
प्रो. जोशी आगे कहते हैं, 'अभी पूरी दुनिया कोरोना और रूस-यूक्रेन युद्ध के दुष्प्रभाव से जूझ रही है। ऐसे में भारत कैसे इससे बचा रह सकता है? अभी भारत के पास विदेशी मुद्रा में कमी आ रही है। इसमें बढ़ोतरी होगी तो डॉलर के मुकाबले भारतीय मुद्रा अपने आप मजबूत हो जाएगा।'
कैसे रुपये की कीमत घटती और बढ़ती है?
प्रो. जोशी ने बताया, 'हर देश के पास विदेशी मुद्रा का भंडार होता है, जिससे वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लेन-देन करता है। विदेशी मुद्रा भंडार के घटने और बढ़ने से ही उस देश की मुद्रा की चाल तय होती है। अगर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर, अमेरिका के रुपयों के भंडार के बराबर है तो रुपए की कीमत स्थिर रहेगी। हमारे पास डॉलर घटे तो रुपया कमजोर होगा, बढ़े तो रुपया मजबूत होगा। इसे फ्लोटिंग रेट सिस्टम कहते हैं। भारत ने 1975 में इस सिस्टम को अपनाया।'
डॉलर के मुकाबले रुपया तभी मजबूत होगा जब हम कम विदेशी मुद्रा खर्च करें और ज्यादा हासिल करें या फिर अगर हम कोई सामान आयात करने के लिए 100 डॉलर खर्च करते हैं, तो इतने का सामान निर्यात भी करें। इससे विदेशी मुद्रा स्थिर होगी और रुपया भी मजबूत होगा।
प्रो. जोशी ने बताया, 'हर देश के पास विदेशी मुद्रा का भंडार होता है, जिससे वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लेन-देन करता है। विदेशी मुद्रा भंडार के घटने और बढ़ने से ही उस देश की मुद्रा की चाल तय होती है। अगर भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर, अमेरिका के रुपयों के भंडार के बराबर है तो रुपए की कीमत स्थिर रहेगी। हमारे पास डॉलर घटे तो रुपया कमजोर होगा, बढ़े तो रुपया मजबूत होगा। इसे फ्लोटिंग रेट सिस्टम कहते हैं। भारत ने 1975 में इस सिस्टम को अपनाया।'
डॉलर के मुकाबले रुपया तभी मजबूत होगा जब हम कम विदेशी मुद्रा खर्च करें और ज्यादा हासिल करें या फिर अगर हम कोई सामान आयात करने के लिए 100 डॉलर खर्च करते हैं, तो इतने का सामान निर्यात भी करें। इससे विदेशी मुद्रा स्थिर होगी और रुपया भी मजबूत होगा।
1948 में बराबर थे डॉलर और रुपया
रुपया आजादी से पहले डॉलर के मुकाबले मजबूत था। असल में तब सभी अंतरराष्ट्रीय मुद्राओं का मूल्य सोने-चांदी से तय होता था। इसके बाद ब्रिटिश पाउंड और विश्व युद्धों के बाद से अमेरिकी डॉलर उस भूमिका में है। वैसे आजादी के बाद यानी 1948 में एक डॉलर-1.3 रुपए के बराबर ही था। 1975 में डॉलर का मूल्य 8.39 रु., 2000 में 43.5 रु. हो गया। 2011 में इसने पहली बार 50 का आंकड़ा पार किया।
रुपया आजादी से पहले डॉलर के मुकाबले मजबूत था। असल में तब सभी अंतरराष्ट्रीय मुद्राओं का मूल्य सोने-चांदी से तय होता था। इसके बाद ब्रिटिश पाउंड और विश्व युद्धों के बाद से अमेरिकी डॉलर उस भूमिका में है। वैसे आजादी के बाद यानी 1948 में एक डॉलर-1.3 रुपए के बराबर ही था। 1975 में डॉलर का मूल्य 8.39 रु., 2000 में 43.5 रु. हो गया। 2011 में इसने पहली बार 50 का आंकड़ा पार किया।