Samwad 2026: सैनिकों से जुड़े सवाल पर बोले पूर्व अफसर, अग्निवीर को समय देना पड़ेगा, अग्निपथ योजना पर क्या कहा?
अमर उजाला संवाद उत्तराखंड में भारतीय सेना के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल राणा प्रताप कलिता ने 'राष्ट्र रक्षा की बात' पर चर्चा की। सेना में चार दशक की शानदार सेवा देने वाली रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल ने सेना से जुड़े कई सवालों पर अपनी राय रखी। पढ़ें, रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल आरपी कलिता से बातचीत के प्रमुख अंश...
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अमर उजाला संवाद उत्तराखंड के मंच पर भारतीय सेना के रिटा. लेफ्टिनेंट जनरल आरपी कलिता ने भी शिरकत की है। उनके मंच पर पहुंचने के साथ ही कार्यक्रम का माहौल देशभक्ति से भर गया, इस दौरान जयहिंद का जयघोष भी कार्यक्रम में गूंजा। लेफ्टिनेंट जनरल आरपी कलिता सैनिक स्कूल गोलपारा, राष्ट्रीय रक्षा अकादमी और भारतीय सैन्य अकादमी के पूर्व छात्र रहे हैं। उन्हें 9 जून 1984 को 9 कुमाऊं में कमीशन दिया गया था। कलिता जनरल ऑफिसर डिफेंस सर्विस स्टाफ कॉलेज से स्नातक थे। उन्होंने उच्च कमान और राष्ट्रीय रक्षा कॉलेज पाठ्यक्रमों में भाग लिया था। अपने 40 वर्षों के प्रतिष्ठित सैन्य करियर में उन्हें पूर्वोत्तर और जम्मू-कश्मीर में महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण कमान और स्टाफ नियुक्तियों का गौरव हासिल किया है।
सेना में जाने की कैसे मिली प्रेरणा?
अपने निजी जीवन के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि मेरा जन्म तामुलपुर नाम के छोटे से कस्बे में हुआ है। जो असम राज्य में स्थित है। मेरे पिताजी एक स्कूल के प्रधान शिक्षक थे, हमारा परिवार स्कूल के कैंपस में ही रहता था। उस स्कूल के पीछे एक नदी है और नदी के उस पार आर्मी का एक कैंप है। स्कूल और नदी के बीच में काफी खुली जगह थी, तो आर्मी कैंप के जवान उस जगह पर ट्रेनिंग करने आते थे। मैं बचपन में ही उन्हें देखकर काफी प्रेरित हुआ और अपनी मां से कहा कि उनके जैसा ही यूनिफॉर्म पहनना है। इसके बाद मैं हर समय वहीं ड्रेस पहनकर घूमता था, यहीं से सेना से लगाव शुरू हुआ है।
अग्निपथ योजना पर क्या बोले आरपी कलिता?
इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा-अभी चार के लगभग हो चुका है और जो पहला बैच शामिल हुआ था, उनका कार्यकाल जल्द खत्म होने वाला है। कोई भी नई स्कीम को समझने में थोड़ा वक्त लगता है और हमेशा लोगों के दिमाग में एक खौफ रहता नए स्कीम के बारे में, जब वो बदलाव लाता है। कि देश के या लोगों के हित के लिए है या नहीं है। लेकिन मैं समझता हूं, हमें थोड़ा समय देना चाहिए, कुछ साल इंतजार करना चाहिए। जब इस योजना के तहत बाहर निकलेंगे, क्योंकि उनके कई ऑप्शन बनाए गए हैं, उनके स्किलिंग के लिए, उनके रिएम्प्लॉयमेंट के लिए और उनको आगे बढ़ने के लिए एक एकमुश्त राशि भी तय की गई है। वहां से निकलने के बाद वे किस दिशा में जाते हैं, उसके बाद अगर इस स्कीम में कोई सुधार करना होगा, तो वो बहुत जरूरी है।
सेना से जुड़े सवालों पर क्या बोले रिटायर्ड जनरल?
अमर उजाला संवाद के दौरान 'राष्ट्र रक्षा की बात' पर चर्चा के दौरान रिटा. लेफ्टिनेंट जनरल आरपी कलिता ने बताया कि कुरुक्षेत्र की कथा सुनने के बाद मैंने युद्ध के मैदान में उतरने की ठानी।
उरी हमला,सर्जिकल स्ट्राइक और कश्मीर पर चर्चा
वहीं कश्मीर के मुद्दे पर बात करते हुए उन्होंने कहा- मैं खुद को भाग्यवान समझता हूं कि मुझे कश्मीर में काफी साल सेवा करने का मौका मिला। मेरे 40 साल के सेवा के दौरान मैंने 11 साल अलग-अलग रैंक में बिताए, मेजर से लेकर मेजर जनरल तक सेवारत था। उरी की सर्जिकल स्ट्राइक मुझे अभी याद है, तब मैं ब्रिगेडियर के रैंक पर था और श्रीनगर के हेडक्वार्टर में सेवारत था, जब 16 अक्तूबर जब आतंकी हमला हुआ, तो वहां पर हमारे जो जवान बलिदान हुए थे, तो उस समय जो कोर कमांडर से जनरल दुआ, वो और मैं तुरंत हेलीकॉप्टर से उरी गए थे और बाद में कई शीर्ष अधिकारी भी मौके पर पहुंचे। तो हम लोगों ने घटना का जायजा लिया और उस समय सबके मन में यही था कि इसे हम भुलाएंगे नहीं और बदला जरूर लेंगे और इसके ऐसे किया जाएगा, जिससे उग्रवादियों के संगठन को नुकसान पहुंचाएंगे। इसके पहले ही सेना की तरफ से अलग-अलग हालातों के लिए कुछ तैयारियां की जाती है और इस घटना के बाद इसे और तेजी से किया गया। फिर तकरीबन 12 या 13 दिन के बाद ही सर्जिकल स्ट्राइक किया गया। मैं यही कहना चाहूंगा, मेरा रोल बीजीएस ऑपरेशन का था, जो सभी प्रकार के ऑपरेशन कश्मीर में जो होते हैं, उसे कॉर्डिनेट और कंट्रोल करते हैं। ऑपरेशन की मॉनिटरिंग मैंने की थी रात भर, यूएवी, ड्रोन से फुटेज के साथ। इस ऑपरेशन के बारे में कई अधिकारियों को जानकारी नहीं थी। इस ऑपरेशन के बारे में उनको पता था जो इससे जुड़े थे सिर्फ उन्हें ही बताया गया था।
मणिपुर में आखिर क्यों होता है संघर्ष?
इस सवाल के जवाब में आरपी कलिता ने कहा - जब मैं ईस्टर्न कमांड में था, तब मैंने कहा था- पूर्वोत्तर में सबसे जटिल राज्य मणिपुर है, वहां तीन समुदाय है, मैतेई समुदाय 53 फीसदी है, जो इंफाल वैली में रहते हैं। उसके बाद नागा समुदाय है, जो 20 फीसदी हैं, वो पहाड़ी में रहते हैं और तीसरा समुदाय कुकी है, ये 16 फीसदी के आस-पास है। ये आंकड़ा 2011 की जनसंख्या के अनुसार है। उनके विशेष दर्जे की बात करें तो कुकी-नागा अनुसूचित जनजाति में आते हैं, जबकि मैतेई सामान्य श्रेणी में है और मैतेई जिस इलाके में रहते हैं, 53 फीसदी जनसंख्या मणिपुर के 10 फीसदी के इलाके में रहते हैं, जबकि कुकी और नागा के कब्जे में 90 फीसदी जमीन है। पहली समस्या जमीन की है, और कानून ये है कि नागा-कुकी इंफाल वैली के इलाके में जमीन खरीद सकते हैं, लेकिन मैतेई पहाड़ों में जमीन नहीं खरीद सकते हैं। दूसरी समस्या ये है कि चूंकि नागा और कुकी अनुसूचित जनजाति हैं तो उनके लिए आरक्षण है, जबकि मैतेई के लिए ऐसा नहीं है। यही दोनों बुनियादी मुद्दे हैं और तीसरी समस्या राजनीति प्रतिनिधित्व की है, राज्य में विधानसभा की संख्या 60 इसमें से 40 मैतेई के इलाके में और 20 कुकी और नागा इलाके में है। यहीं बहुत बड़ा अतंर आता है, कुकी समुदाय में अलग-अलग धारणाएं हैं, जो काफी हद तक सही भी है, लेकिन इसके आंकड़े अस्पष्ट हैं। लोगों की आकांक्षाएं पूरी नहीं होती, ये मुख्य समस्या है। वहां पर 60 के दशक से उग्रवाद की भी समस्या है।
सेना भविष्य की चुनौती के लिए किस तरह से तैयार है?
इस मुद्दे पर रिटा. लेफ्टिनेंट जनरल ने कहा- युद्ध की परिभाषा बदल चुकी है, युद्ध सिर्फ सीमा पर सीमित नहीं है, ये पूरे देश को प्रभावित करता है, इसे हमने ऑपरेशन सिंदूर में देखा।
सेना के ये रिटायर्ड अधिकारी क्यों खास?
- जनरल कलिता का जन्म असम के रिंगा में हुआ।
- खडकवासला में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी और भारतीय सैन्य अकादमी से शिक्षा हासिल की।
- 1984 को देहरादून में भारतीय सैन्य अकादमी (आईएमए) से 9वीं कुमाऊं रेजिमेंट में कमीशन प्राप्त हुआ।
- भारतीय सेना में कई महत्वपूर्ण पदों पर सेवा दी।
- जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रीय राइफल बटालियन और शांतिकाल में माउंटेन ब्रिगेट की कमान संभाली।
- भारतीय सेना की पूर्वी कमान के जनरल कमांडिंग-इन-चीफ के रूप में जिम्मेदारी संभाल चुके हैं।
- असम के दीमापुर में आईआईआई कोर की कमान भी संभाली।
- वर्ष 2025 में असम सरकार लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) राणा प्रताप कलिता को राज्य के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार 'असम वैभव' से सम्मानित कर चुकी है।
- असम के पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने पूर्वी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ पद की जिम्मेदारी संभाली।
देश-विदेश में कई अभियानों का किया नेतृत्व
पूर्वी कमान के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ रहे आरपी कलिता ने जम्मू-कश्मीर में तीव्र उग्रवाद विरोधी माहौल में राष्ट्रीय राइफल्स बटालियन, जम्मू-कश्मीर में माउंटेन ब्रिगेड और एक इन्फैंट्री डिवीजन और उत्तर पूर्व में कोर की कमान संभाली। उनके पास श्रीलंका में ऑपरेशन पवन, जम्मू-कश्मीर में ऑपरेशन पराक्रम और ऑपरेशन रक्षक, असम में ऑपरेशन बजरंग और ऑपरेशन राइनो, नागालैंड में ऑपरेशन ऑर्किड और मणिपुर में ऑपरेशन हिफाजत सहित कई अभियानों में सेवा करने का व्यापक अनुभव है।