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हवाई किराए पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: केंद्र से कहा- मनमानी कीमतों पर लगाएं लगाम, यात्रियों को दें बड़ी राहत
पीटीआई, नई दिल्ली।
Published by: राकेश कुमार
Updated Fri, 15 May 2026 04:06 PM IST
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सार
सुप्रीम कोर्ट ने हवाई किराए में भारी अंतर को यात्रियों का वित्तीय शोषण करार देते हुए केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि एयरलाइंस की मनमानी कीमतों और सामान नीति पर लगाम लगाने के लिए पारदर्शी दिशा-निर्देशों की तत्काल आवश्यकता है। शीर्ष अदालत ने और क्या-क्या कहा है? खबर में जानिए...
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
देश में हवाई टिकटों की बेतहाशा बढ़ती कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा कि हवाई किराए का युक्तीकरण होना बेहद जरूरी है। कोर्ट ने केंद्र सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया है कि वह हवाई यात्रियों को किराए की विसंगतियों से राहत दिलाए।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने एयरलाइंस के कामकाज पर सवाल उठाए। पीठ ने कहा कि यह हैरान करने वाला है कि एक ही दिन और एक ही सेक्टर के लिए अलग-अलग एयरलाइंस अलग-अलग किराया वसूल रही हैं। कोर्ट ने उदाहरण देते हुए कहा कि एक ही रूट पर एक एयरलाइन 8,000 रुपये ले रही है, तो दूसरी उसी इकोनॉमी क्लास के लिए 18,000 रुपये वसूल रही है। पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा, 'किराए के इस भारी अंतर को दूर कर जनता को राहत देने का प्रयास करें।'
नए कानून और नियमों की प्रक्रिया में जुटी सरकार
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से ले रही है। उन्होंने कहा कि भारतीय वायुयान अधिनियम 2024 प्रभावी हो चुका है। इसके तहत नए नियम बनाने के लिए विचार-विमर्श की प्रक्रिया चल रही है। सरकार इस समस्या को केवल कानूनी लड़ाई के तौर पर नहीं देख रही है। वह इसके सभी पहलुओं पर विचार कर रही है ताकि यात्रियों को शोषण से बचाया जा सके।
यह भी पढ़ें: हवाई सफर के लिए नहीं करनी होगी जेब ढीली: इंडिगो ने लॉन्च की सेल, घरेलू-इंटरनेशनल फ्लाइट पर मिल रही इतनी छूट?
नियमों के उल्लंघन और नियामक की मांग
यह याचिका सामाजिक कार्यकर्ता एस लक्ष्मीनारायणन की ओर से दायर की गई है। उनके वकील वरिष्ठ अधिवक्ता रवींद्र श्रीवास्तव ने दलील दी कि विमान अधिनियम 1937 के तहत नियम पहले से मौजूद हैं। समस्या यह है कि उन नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि डीजीसीए के पास अत्यधिक किराया वसूलने वाली एयरलाइंस के खिलाफ निर्देश जारी करने की शक्ति है, लेकिन वह इसका इस्तेमाल नहीं कर रहा है।
सामान नीति और छिपे हुए शुल्कों पर सवाल
याचिका में केवल किराए ही नहीं, बल्कि एयरलाइंस की ओर से वसूले जाने वाले अन्य शुल्कों पर भी आपत्ति जताई गई है। याचिकाकर्ता का दावा है कि निजी एयरलाइंस ने बिना किसी ठोस कारण के फ्री चेक-इन बैगेज की सीमा 25 किलो से घटाकर 15 किलो कर दी है। इसे यात्रियों की सुविधा छीनकर कमाई का नया जरिया बना लिया गया है। कोर्ट ने पहले भी त्योहारों के दौरान किराए में होने वाली भारी बढ़ोतरी को 'शोषण' करार दिया था।
13 जुलाई को अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को इस मामले में अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का समय दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक नए नियम नहीं बन जाते, पुराने नियमों के तहत कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए। सरकार को यह बताना होगा कि किराए के उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। मामले की अगली सुनवाई अब 13 जुलाई को होगी।
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नए कानून और नियमों की प्रक्रिया में जुटी सरकार
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से ले रही है। उन्होंने कहा कि भारतीय वायुयान अधिनियम 2024 प्रभावी हो चुका है। इसके तहत नए नियम बनाने के लिए विचार-विमर्श की प्रक्रिया चल रही है। सरकार इस समस्या को केवल कानूनी लड़ाई के तौर पर नहीं देख रही है। वह इसके सभी पहलुओं पर विचार कर रही है ताकि यात्रियों को शोषण से बचाया जा सके।
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नियमों के उल्लंघन और नियामक की मांग
यह याचिका सामाजिक कार्यकर्ता एस लक्ष्मीनारायणन की ओर से दायर की गई है। उनके वकील वरिष्ठ अधिवक्ता रवींद्र श्रीवास्तव ने दलील दी कि विमान अधिनियम 1937 के तहत नियम पहले से मौजूद हैं। समस्या यह है कि उन नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि डीजीसीए के पास अत्यधिक किराया वसूलने वाली एयरलाइंस के खिलाफ निर्देश जारी करने की शक्ति है, लेकिन वह इसका इस्तेमाल नहीं कर रहा है।
सामान नीति और छिपे हुए शुल्कों पर सवाल
याचिका में केवल किराए ही नहीं, बल्कि एयरलाइंस की ओर से वसूले जाने वाले अन्य शुल्कों पर भी आपत्ति जताई गई है। याचिकाकर्ता का दावा है कि निजी एयरलाइंस ने बिना किसी ठोस कारण के फ्री चेक-इन बैगेज की सीमा 25 किलो से घटाकर 15 किलो कर दी है। इसे यात्रियों की सुविधा छीनकर कमाई का नया जरिया बना लिया गया है। कोर्ट ने पहले भी त्योहारों के दौरान किराए में होने वाली भारी बढ़ोतरी को 'शोषण' करार दिया था।
13 जुलाई को अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को इस मामले में अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का समय दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक नए नियम नहीं बन जाते, पुराने नियमों के तहत कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए। सरकार को यह बताना होगा कि किराए के उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं। मामले की अगली सुनवाई अब 13 जुलाई को होगी।