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भारत में इच्छामृत्यु पर कितनी पुरानी है बहस?: कौन से मामलों से खुली मंजूरी की राह; इस पर चिंताएं क्यों

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: Kirtivardhan Mishra Updated Wed, 11 Mar 2026 08:50 PM IST
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सार
भारत में इच्छामृत्यु को लेकर बहस कितनी पुरानी है? सर्वोच्च न्यायालय के किन फैसलों ने इच्छामृत्यु की पहली अनुमति की रूपरेखा तैयार की? भारत में इसे लेकर क्या चिंताएं हैं...
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Supreme Court Euthanasia Harish Rana Case Right to die with Dignity Aruna Shanbaug Common Cause case
अदालत में लंबे समय तक चले इच्छामृत्यु से जुड़े मामले। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को पहली बार भारत में इच्छामृत्यु की मांग को मंजूरी दी है। कोर्ट का यह फैसला हरीश राणा बनाम केंद्र सरकार के मामले में आया है। अदालत ने इसमें एनजीओ कॉमन कॉज वाले फैसले को आधार बनाते हुए बीते 13 साल से अचेत अवस्था में जिंदा युवक हरीश राणा के लाइफ सपोर्ट को हटाने की अनुमति दी है। 


सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने कहा कि जब मेडिकल बोर्ड्स ने हरीश की स्थिति में सुधार न पाते हुए लाइफ सपोर्ट को हटाना प्रमाणित किया है तो अदालत को इस मामले में हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं है। इसी के साथ सर्वोच्च न्यायालय ने सम्मान के साथ मृत्यु को सुनिश्चित करते हुए हरीश को लाइफ सपोर्ट से हटाने की इजाजत दे दी। 

सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को इच्छामृत्यु की दी इजाजत
सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को इच्छामृत्यु की दी इजाजत - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
हालांकि, इस बीच उन पुराने मामलों का जिक्र भी उठा है, जिनमें कोर्ट के सामने पहले इच्छामृत्यु की मांग की गई थी। आइये जानते हैं कि भारत में इच्छामृत्यु को लेकर बहस कितनी पुरानी है? सर्वोच्च न्यायालय के किन फैसलों ने इच्छामृत्यु की पहली अनुमति की रूपरेखा तैयार की? भारत में इसे लेकर क्या चिंताएं हैं...

भारत में क्या इच्छामृत्यु पर क्या स्थिति, पुराने मामले क्या?

भारत में इच्छामृत्यु को अब तक प्रतिबंधित रखा गया। दरअसल, भारत का संविधान अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार (राइट टू लाइफ) की पूर्ण मान्यता देता है। ऐसे में मृत्यु का अधिकार जीवन के अधिकार के बिल्कुल उलट है। भारत में इस संवैधानिक पेंच की वजह से लंबे समय तक इच्छामृत्यु पर बहस जारी रही है। देश की हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इच्छामृत्यु की मांग वाली याचिकाएं दायर हुईं। हालांकि, कोर्ट इन मांगों को नकारती आई है। हालांकि, दो मामलों ने इस स्थिति को बदला है।

1. अरुणा शानबाग केस
हालांकि, 2011 के अरुणा शानबाग मामले के बाद स्थिति काफी बदली है। दरअसल, हुआ कुछ यूं कि अरुणा शानबाग नाम की एक महिला, जो कि मुंबई के केईएम अस्पताल में एक नर्स थीं, उन पर 1973 में दुष्कर्म के दौरान एक क्रूर हमला हुआ था। इसके कारण उनके मस्तिष्क में ऑक्सीजन की आपूर्ति रुक गई और वह 40 से अधिक वर्षों तक 'परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट' यानी अचेत अवस्था में रहीं। 

2009 में पत्रकार पिंकी विरानी ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर अरुणा को भोजन देना बंद करने और उन्हें शांति से मृत्यु देने की मांग की। मार्च 2011 में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने भारत में इच्छामृत्यु पर अदालत के रुख को कई तरीकों से बदल दिया।

ये भी पढ़ें: क्या है इच्छामृत्यु, जिसकी भारत में पहली बार मिली मंजूरी: इतिहास में कहां जिक्र, अलग-अलग देशों में नियम कैसे?

निष्क्रिय इच्छामृत्यु को ऐतिहासिक मंजूरी: इस मामले से पहले भारत में इच्छामृत्यु की अनुमति देने वाला कोई कानून नहीं था। हालांकि, दो जजों की पीठ (जस्टिस मार्कंडेय काटजू और ज्ञान सुधा मिश्र) ने अपने ऐतिहासिक फैसले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को कानूनी अनुमति दे दी। अदालत ने माना कि अचेत अवस्था जैसी स्थिति वाले मरीजों के जीवन रक्षक उपचार को कुछ सख्त शर्तों के तहत हटाया जा सकता है।

सक्रिय और निष्क्रिय इच्छामृत्यु के बीच स्पष्ट अंतर: अदालत ने स्पष्ट किया कि मरीज को कोई घातक इंजेक्शन या दवा देकर उसकी जान लेना (सक्रिय इच्छामृत्यु) भारत सहित दुनिया के कई देशों में अपराध है। अदालत ने कहा कि निष्क्रिय इच्छामृत्यु में डॉक्टर सक्रिय रूप से मरीज को मारते नहीं हैं, बल्कि वे केवल जीवन रक्षक प्रणालियों को रोक देते हैं, जिसे अपराध नहीं माना जा सकता।

दुरुपयोग को रोकने के लिए सख्त दिशा-निर्देश: अदालत ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु के लिए एक कड़ी प्रक्रिया तय की। इसके तहत...
  • किसी भी मामले में संबंधित हाईकोर्ट में याचिका दायर करनी होगी, जहां कम से कम दो जजों की बेंच इस पर फैसला करेगी। 
  • बेंच तीन प्रतिष्ठित डॉक्टरों (जिसमें न्यूरोलॉजिस्ट, मनोचिकित्सक और फिजिशियन हों) की एक मेडिकल कमेटी नियुक्त करेगी, जो मरीज की स्थिति की जांच कर रिपोर्ट देगी।
  • राज्य, मरीज के करीबी रिश्तेदारों या उनके न होने पर मरीज के सबसे करीबी मित्र, जो उसके लिए फैसले कर सकें, को नोटिस जारी करेंगे।

इच्छामृत्यु को लेकर दुनिया में नियम।
इच्छामृत्यु को लेकर दुनिया में नियम। - फोटो : अमर उजाला
अदालत ने इस मामले में अरुणा की दोस्त और याचिकाकर्ता पिंकी विरानी के बजाय केईएम अस्पताल के कर्मचारियों को अरुणा का करीबी दोस्त माना, क्योंकि वे 40 वर्षों से दिन-रात उनकी देखभाल कर रहे थे। अस्पताल के कर्मचारियों की इच्छा थी कि अरुणा जीवित रहें। इसलिए अदालत ने अरुणा पर निष्क्रिय इच्छामृत्यु लागू करने से इनकार कर दिया और उन्हें प्राकृतिक मृत्यु तक जीने दिया। 

इस मामले में अरुणा शानबाग के मामले में इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं दी गई, लेकिन इसी मामले ने भारत में इस बहस को एक नई दिशा दी और न्यायिक निगरानी के तहत निष्क्रिय इच्छामृत्यु को एक वैध कानूनी विकल्प के रूप में स्थापित कर दिया।

ये भी पढ़ें: 'हम उस स्टेज में है, जहां...', हरीश राणा की इच्छामृत्यु पर फैसला सुनाते हुए भावुक हुए जस्टिस पारदीवाला

और किन फैसलों ने भारत में इच्छामृत्यु पर मजबूत किए फैसले


1. कॉमन कॉज केस (2018)
अरुणा शानबाग मामले के अलावा 2018 का सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला बेहद अहम रहा। यह याचिका एक एनजीओ कॉमन कॉज की ओर से दाखिल की गई थी। इस केस में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने एक ऐतिहासिक फैसले में गरिमापूर्ण मृत्यु को अनुच्छेद 21 के जीवन के अधिकार के तहत मौलिक अधिकार माना। यानी गरिमापूर्ण मृत्यु को जीवन का अधिकार करार दिया गया। 

इसके तहत मरीजों को लिविंग विल (जिंदा घोषणा) का अधिकार मिला। इसका मतलब है कि कोई भी सक्षम व्यक्ति पहले से यह लिखित निर्देश दे सकता है कि अगर भविष्य में वह किसी ऐसी लाइलाज स्थिति में पहुंच जाए जहां उसके ठीक होने की कोई उम्मीद न हो, तो उसे कृत्रिम जीवन रक्षक समर्थन (जैसे वेंटिलेटर) पर न रखा जाए।

2. एमएआरएस रेवती केस (2023)
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में लिविंग विल बनाने की जटिल नोटरी प्रक्रिया को आसान कर दिया, ताकि आम लोग भी अपनी इच्छा के अनुसार अंतिम समय पर इलाज को लेकर फैसला ले सकें। 

3. सरकार ने बीएनएस के जरिए इच्छामृत्यु को बनाया आसान
केंद्र सरकार ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) 2023 के तहत 'आत्महत्या के प्रयास' को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया है। इसे पहले आईपीसी की धारा 309 के तहत इसे अपराध माना गया था। यानी बीएनएस के जरिए इच्छामृत्यु को एक कानूनी सहारा मिला। विशेषज्ञों के मुताबिक, सरकार का विचार यही था कि इसे सजा के बजाय मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे के रूप में देखा जाए। हालांकि, आत्महत्या के लिए उकसाना (बीएनएस की धारा 108) अभी भी अपराध है, जिसमें 10 साल तक की कैद हो सकती है।

संसद में अब तक लंबित है इससे जुड़ा विधेयक

सुप्रीम कोर्ट की तरफ से लंबे समय तक इच्छामृत्यु को मंजूरी नहीं दी गई। दरअसल, कोर्ट का कहना था कि संविधान और लोकहित से जुड़े मामलों पर संसद में कानून बनना चाहिए और इसके बाद ही बदलाव लागू होने चाहिए। हालांकि, अलग-अलग सरकारों में इस मुद्दे को ज्यादा तूल नहीं दिया गया। 

संसद में 2016 में 'मेडिकल ट्रीटमेंट ऑफ टर्मिनली इल पेशेंट्स बिल' लाया गया था, जो अब तक लंबित है। इसलिए मौजूदा समय में भी सुप्रीम कोर्ट की ओर से अलग-अलग केसों के जरिए तय किए गए दिशा-निर्देश ही कानून के रूप में लागू हैं।

इच्छामृत्यु पर भारत में चिंताएं क्यों?

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का स्वास्थ्य ढांचा, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में अभी इच्छामृत्यु जैसे संवेदनशील मुद्दे को संभालने के लिए तैयार नहीं है। पैलियम इंडिया की स्मृति राणा का कहना है कि मरीजों को लाइलाज बीमारी या असहनीय दर्द वाली समस्याओं से निपटने के लिए बेहतरीन दर्द निवारक देखभाल मिलनी चाहिए, ताकि चिकित्सा की कमी के कारण वे मजबूरी में इच्छामृत्यु का रास्ता न चुनें।

2025 में एक कार्यक्रम के दौरान नेफ्रॉन क्लीनिक के चेयरमैन डॉ. संजीव बगाई ने भारत में इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता देने का कड़ा विरोध किया था। उन्होंने तर्क दिया था कि भारत जैसे देश में इसका भारी दुरुपयोग हो सकता है, क्योंकि यहां ऐसी मजबूत प्रणाली का अभाव है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि यह निर्णय किसी बाहरी दबाव के बिना लिया गया है। खासकर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों में, जहां परिवार भारी मेडिकल बिलों से जूझ रहे होते हैं, वहां मरीजों पर इच्छामृत्यु का दबाव डाला जा सकता है। इसके अलावा, संपत्ति हड़पने के लिए रिश्तेदारों द्वारा डॉक्टरों के साथ साजिश रचने का भी गंभीर खतरा रहता है।

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