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Supreme Court: अदालत ने कहा- हाईकोर्ट स्वत: संज्ञान लेकर सजा में बढ़ोतरी नहीं कर सकता, किस केस में आया फैसला?

Thu, 20 Aug 2026 09:53 AM IST
ज्योति भास्कर अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली।
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली। Published by: ज्योति भास्कर Updated Thu, 20 Aug 2026 09:53 AM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि हाईकोर्ट स्वत: संज्ञान लेकर सजा में बढ़ोतरी नहीं कर सकता। दो जजों की खंडपीठ ने कहा, राज्य, पीड़ित या शिकायतकर्ता की ओर से सजा बढ़ाने की मांग पर ही हाईकोर्ट को ऐसा करने का अधिकार है। किस मामले में आया फैसला? जानिए इस खबर में

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Supreme Court Justices Manoj Mishra Bijay Bishnoi High Court cannot enhance sentence by suo motu cognizance
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स/ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि हाईकोर्ट किसी आपराधिक मामले में स्वत: संज्ञान लेते हुए सजा में बढ़ोतरी नहीं कर सकता। हाईकोर्ट तब ही ऐसा कर सकता है जब राज्य, पीड़ित या शिकायतकर्ता की ओर से सजा बढ़ाने की अपील की गई हो। शीर्ष अदालत ने कहा कि आरोपी की अपील पर उसकी सजा बढ़ाना कानूनन अस्वीकार्य है।

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जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें आरोपी की उम्रकैद की सजा को उसके शेष प्राकृतिक जीवन तक कारावास में बदल दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने यह बढ़ोतरी ऐसे समय की, जब राज्य, पीड़ित या शिकायतकर्ता की ओर से सजा बढ़ाने के लिए कोई अपील दायर नहीं की गई थी।
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आरोपी की अपील में सजा बढ़ाना उचित नहीं है। कार्ट ने कहा है कि अपील आरोपी का महत्वपूर्ण वैधानिक और संवैधानिक अधिकार है। यदि आरोपी की अपील में उसकी सजा बढ़ा दी जाए तो वह अपनी अपील दायर करने के कारण ही बदतर स्थिति में पहुंच जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी की अपील पर विचार करते हुए हाईकोर्ट सजा कम कर सकता है लेकिन उसे बढ़ा नहीं सकता, खासकर तब जब राज्य या पीड़ित ने सजा बढ़ाने की मांग नहीं की हो।
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उम्रकैद की सजाएं लगातार नहीं चल सकतीं
इसके अलावा सुप्रीम में एक बार फिर स्पष्ट किया है कि उम्रकैद की सजाएं लगातार नहीं चल सकतीं। अदालत ने संविधान पीठ के मुथुरामलिंगम फैसले का हवाला देते हुए कहा है कि एक ही मुकदमे में कई अपराधों के लिए दी गई उम्रकैद की सजाएं लगातार नहीं बल्कि साथ-साथ चलेंगी। यही नियम तब भी लागू होगा जब उम्रकैद के साथ निश्चित अवधि की सजा भी दी गई हो।


पांच उम्रकैद व अन्य सजाएं दी गई थीं
कन्याकुमारी जिले के इस मामले में आरोपी को हत्या समेत कई अपराधों में पांच उम्रकैद और अन्य निश्चित अवधि की सजाएं दी गई थीं। ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने इन्हें लगातार चलाने का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इसे कानून के स्थापित सिद्धांत के विपरीत माना और सभी सजाओं को समवर्ती (साथ-साथ) चलाने का निर्देश दिया। शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के सजा बढ़ाने वाले आदेश को रद्द करते हुए अपील का निपटारा कर दिया।

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