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सबरीमाला मामला: सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी- धार्मिक संस्थानों में नियम जरूरी, अराजकता के लिए जगह नहीं
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: राकेश कुमार
Updated Tue, 28 Apr 2026 01:44 PM IST
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सार
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि आस्था और प्रबंधन के नाम पर संस्थानों में अराजकता की अनुमति नहीं दी जा सकती। धार्मिक परंपराओं को संविधानिक मर्यादाओं और समानता के सिद्धांतों के भीतर ही काम करना होगा। सबरीमाला मामले में शीर्ष अदालत ने और क्या-क्या कहा है? खबर में जानिेए....
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- फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सबरीमाला मामले से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान बेहद अहम टिप्पणी की है। नौ जजों की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी भी धार्मिक संस्थान के प्रबंधन के अधिकार का अर्थ अराजकता नहीं हो सकता। कोर्ट ने कहा कि हर संस्थान के कामकाज के लिए एक निश्चित व्यवस्था और मापदंड होने चाहिए।
प्रबंधन का अर्थ नियमहीनता नहीं- सुप्रीम कोर्ट
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार और प्रबंधन के बीच एक संतुलन जरूरी है। पीठ में जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह सहित अन्य वरिष्ठ न्यायाधीश शामिल हैं। सुनवाई के दौरान जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा, ' प्रबंधन के अधिकार का यह मतलब कतई नहीं है कि वहां कोई ढांचा ही न हो। हर चीज के लिए एक प्रक्रिया और नियम होने चाहिए।'
दरगाह और मंदिर का दिया उदाहरण
जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा, 'चाहे दरगाह हो या मंदिर, वहां संस्थान से जुड़े कुछ तत्व होते हैं। पूजा का तरीका और कार्यों का एक क्रम होता है। किसी को तो इसे विनियमित करना ही होगा। ऐसा नहीं हो सकता कि हर कोई अपनी मनमर्जी करे। न ही यह संभव है कि बिना किसी नियंत्रण के द्वार हर समय खुले रहें। सवाल यह है कि प्रबंधन करने वाली संस्था कौन सी है?
यह भी पढ़ें: क्या हिंदू होने की वजह से बचे काश पटेल?: हमलावर की हिटलिस्ट में ट्रंप की पूरी टीम, FBI चीफ का नहीं था नाम!
संविधानिक सीमाओं का पालन अनिवार्य- सुप्रीम कोर्ट
अदालत ने यह भी साफ किया कि धार्मिक नियम संविधान के दायरे से बाहर नहीं हो सकते। जस्टिस अमानुल्लाह ने आगे कहा, 'नियम जरूरी हैं, लेकिन वे संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन नहीं कर सकते। व्यापक संविधानिक मापदंडों पर किसी भी तरह का भेदभाव स्वीकार्य नहीं है। हर संस्थान के अपने मानक होने चाहिए और यह हर व्यक्ति द्वारा व्यक्तिगत रूप से निर्धारित नहीं किया जा सकता।'
सुनवाई के दौरान हजरत ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया की दरगाह से जुड़े वंशज पीरजादा सैयद अल्तमश निजामी की ओर से अधिवक्ता निजाम पाशा पेश हुए। उन्होंने तर्क दिया कि दरगाह एक ऐसी जगह है जहां संत को दफनाया जाता है। उन्होंने कहा, 'इस्लाम के भीतर संतों की स्थिति को लेकर अलग-अलग विचार हो सकते हैं। लेकिन सूफी विचारधारा में उस स्थान के प्रति गहरी श्रद्धा होती है। भारत में सूफी मत के कई बड़े सिलसिले हैं, जिनमें चिश्तिया, कादरिया, नक्शबंदिया और सुहरावर्दी शामिल हैं।' पाशा ने दलील दी कि यह व्यवस्था एक 'धार्मिक संप्रदाय' का हिस्सा है और हजरत निजामुद्दीन औलिया की शिक्षाएं रोजा, नमाज, हज और जकात जैसे इस्लामी सिद्धांतों पर आधारित हैं।
पुराना फैसला और वर्तमान स्थिति
सुप्रीम कोर्ट इससे पहले यह मान चुका है कि किसी धार्मिक प्रथा के अनिवार्य या गैर-अनिवार्य होने का पैमाना तय करना न्यायपालिका के लिए चुनौतीपूर्ण है। गौरतलब है कि सितंबर 2018 में पांच जजों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगा प्रतिबंध हटा दिया था। कोर्ट ने उस समय इस पुरानी प्रथा को असंविधानिक करार दिया था। फिलहाल नौ जजों की यह बड़ी पीठ धार्मिक स्वतंत्रता के व्यापक मुद्दों पर सुनवाई कर रही है।
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मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार और प्रबंधन के बीच एक संतुलन जरूरी है। पीठ में जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह सहित अन्य वरिष्ठ न्यायाधीश शामिल हैं। सुनवाई के दौरान जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा, ' प्रबंधन के अधिकार का यह मतलब कतई नहीं है कि वहां कोई ढांचा ही न हो। हर चीज के लिए एक प्रक्रिया और नियम होने चाहिए।'
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दरगाह और मंदिर का दिया उदाहरण
जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा, 'चाहे दरगाह हो या मंदिर, वहां संस्थान से जुड़े कुछ तत्व होते हैं। पूजा का तरीका और कार्यों का एक क्रम होता है। किसी को तो इसे विनियमित करना ही होगा। ऐसा नहीं हो सकता कि हर कोई अपनी मनमर्जी करे। न ही यह संभव है कि बिना किसी नियंत्रण के द्वार हर समय खुले रहें। सवाल यह है कि प्रबंधन करने वाली संस्था कौन सी है?
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संविधानिक सीमाओं का पालन अनिवार्य- सुप्रीम कोर्ट
अदालत ने यह भी साफ किया कि धार्मिक नियम संविधान के दायरे से बाहर नहीं हो सकते। जस्टिस अमानुल्लाह ने आगे कहा, 'नियम जरूरी हैं, लेकिन वे संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन नहीं कर सकते। व्यापक संविधानिक मापदंडों पर किसी भी तरह का भेदभाव स्वीकार्य नहीं है। हर संस्थान के अपने मानक होने चाहिए और यह हर व्यक्ति द्वारा व्यक्तिगत रूप से निर्धारित नहीं किया जा सकता।'
सुनवाई के दौरान हजरत ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया की दरगाह से जुड़े वंशज पीरजादा सैयद अल्तमश निजामी की ओर से अधिवक्ता निजाम पाशा पेश हुए। उन्होंने तर्क दिया कि दरगाह एक ऐसी जगह है जहां संत को दफनाया जाता है। उन्होंने कहा, 'इस्लाम के भीतर संतों की स्थिति को लेकर अलग-अलग विचार हो सकते हैं। लेकिन सूफी विचारधारा में उस स्थान के प्रति गहरी श्रद्धा होती है। भारत में सूफी मत के कई बड़े सिलसिले हैं, जिनमें चिश्तिया, कादरिया, नक्शबंदिया और सुहरावर्दी शामिल हैं।' पाशा ने दलील दी कि यह व्यवस्था एक 'धार्मिक संप्रदाय' का हिस्सा है और हजरत निजामुद्दीन औलिया की शिक्षाएं रोजा, नमाज, हज और जकात जैसे इस्लामी सिद्धांतों पर आधारित हैं।
पुराना फैसला और वर्तमान स्थिति
सुप्रीम कोर्ट इससे पहले यह मान चुका है कि किसी धार्मिक प्रथा के अनिवार्य या गैर-अनिवार्य होने का पैमाना तय करना न्यायपालिका के लिए चुनौतीपूर्ण है। गौरतलब है कि सितंबर 2018 में पांच जजों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगा प्रतिबंध हटा दिया था। कोर्ट ने उस समय इस पुरानी प्रथा को असंविधानिक करार दिया था। फिलहाल नौ जजों की यह बड़ी पीठ धार्मिक स्वतंत्रता के व्यापक मुद्दों पर सुनवाई कर रही है।
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