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Supreme Court: मद्रास हाईकोर्ट के गोवध प्रतिबंध के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक, आदेश में कही ये बात

Mon, 13 Jul 2026 12:43 PM IST
प्रशांत तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: प्रशांत तिवारी Updated Mon, 13 Jul 2026 12:43 PM IST
सार

 सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिसमें तमिलनाडु में गाय और बछडे के वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया गया था। राज्य सरकार ने दलील दी कि यह आदेश तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम, 1958 समेत मौजूदा कानूनों के विपरीत है। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश के अंतिम हिस्से को प्रथम दृष्टया सुधार योग्य मानते हुए राज्य की याचिका पर नोटिस जारी किया है।

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Supreme Court overturns Tamilnadu High Court verdict on cow slaughter major relief for state government
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने आज मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें तमिलनाडु में कहीं भी बकरीद या किसी अन्य दिन गाय या बछड़े के वध पर रोक लगाने का निर्देश दिया गया था। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने तमिलनाडु सरकार द्वारा दायर स्पेशल लीव पिटिशन (SLP) पर नोटिस जारी करते हुए यह अंतरिम आदेश पारित किया। राज्य सरकार ने मद्रास हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें पूरे राज्य में गायों और बछड़ों के वध पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया गया था।

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क्या कहा सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने?
बेंच ने कहा कि हाई कोर्ट के आदेश का अंतिम पैराग्राफ, जिसमें राज्यभर में प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया गया था, प्रथम दृष्टया सुधार की मांग करता है। राज्य सरकार की ओर से सीनियर एडवोकेट डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने पक्ष रखा।
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सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले पर क्या आपत्ति जताई?
राज्य सरकार ने दलील दी कि हाई कोर्ट का आदेश तमिलनाडु पशु संरक्षण अधिनियम, 1958 के विपरीत है। इस कानून के तहत सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी प्रमाण पत्र के आधार पर 10 वर्ष से अधिक उम्र की उन गायों के वध की अनुमति दी जाती है, जो काम करने और प्रजनन के लिए अनुपयुक्त हो चुकी हों। सरकार ने यह भी कहा कि पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960, पशु क्रूरता निवारण (वध गृह) नियम, 2001, तमिलनाडु शहरी स्थानीय निकाय अधिनियम, 1998 तथा तमिलनाडु शहरी स्थानीय निकाय नियम, 2023 जैसे अन्य कानून वध की प्रक्रिया और शर्तों को नियंत्रित करते हैं, लेकिन इनमें कहीं भी पूर्ण प्रतिबंध का प्रावधान नहीं है। राज्य का कहना है कि पूर्ण प्रतिबंध लगाकर हाई कोर्ट ने वैधानिक कानून की जगह न्यायिक कानून बना दिया।
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हाईकोर्ट ने यह आदेश कब और किस याचिका पर दिया था?
मद्रास हाईकोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस जीआर स्वामीनाथन और जस्टिस वी लक्ष्मीनारायण शामिल थे, ने 27 मई को बकरीद से ठीक पहले यह आदेश पारित किया था। यह फैसला हिंदू मक्कल काची के महासचिव के. सूर्या प्रशांत द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनाया गया था। याचिकाकर्ता ने केवल यह मांग की थी कि वध निर्धारित स्थानों पर ही कराया जाए, लेकिन हाई कोर्ट ने इससे आगे बढते हुए गायों और बछड़ों के वध पर कहीं भी और किसी भी दिन पूर्ण प्रतिबंध लगाने का व्यापक आदेश दे दिया।

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में किस आधार का हवाला दिया था?
आदेश पारित करते समय हाई कोर्ट ने एक सरकारी आदेश का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि दूध उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए गो वध पर प्रतिबंध आवश्यक है। हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के उन पुराने फैसलों का भी उल्लेख किया, जिनमें कहा गया था कि बकरीद के अवसर पर गो वध इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है।

राज्य सरकार ने कानूनी दलील में क्या कहा?
राज्य सरकार ने कहा कि जब मौजूदा कानून निर्धारित स्थानों पर गायों की एक विशेष श्रेणी के वध की अनुमति देता है, तब उसके विपरीत कोई न्यायिक निर्देश नहीं दिया जा सकता। सरकार ने यह भी आपत्ति जताई कि हाई कोर्ट ने सरकारी आदेश संख्या 1715 पर भरोसा किया, जबकि उसकी वैधता या लागू होने का सवाल अदालत के सामने कभी उठा ही नहीं था। सरकार का कहना है कि कोई भी कार्यकारी आदेश राज्य में लागू कानूनों से ऊपर नहीं हो सकता।

क्या हाई कोर्ट ने याचिका के दायरे से बाहर जाकर फैसला दिया?
स्पेशल लीव पिटिशन में राज्य सरकार ने कहा कि हाई कोर्ट के समक्ष दायर रिट याचिका केवल कोयंबटूर में बकरीद के दौरान सार्वजनिक स्थानों पर गायों के वध को रोकने तक सीमित थी। इसके बावजूद डिवीजन बेंच ने मामले का दायरा बढाते हुए पूरे राज्य में गायों के वध पर हर परिस्थिति में प्रतिबंध लगा दिया, यहां तक कि अधिकृत बूचड़खानों में भी, जबकि याचिकाकर्ता ने ऐसी कोई राहत नहीं मांगी थी। सरकार का कहना है कि अदालत ने ऐसी राहत प्रदान कर दी, जिसके लिए न तो कोई प्रार्थना की गई थी और न ही उस पर बहस हुई थी।

फैसले को विरोधाभासी क्यों बताया गया? 
राज्य सरकार ने कहा कि हाई कोर्ट ने अपने फैसले के एक हिस्से में यह माना कि जानवरों का वध केवल अधिकृत बूचड़खानों में ही किया जा सकता है, लेकिन दूसरी ओर उसने यह भी निर्देश दिया कि बकरीद या किसी भी अन्य दिन कोई गाय या बछड़ा नहीं काटा जाना चाहिए। सरकार के अनुसार, ये दोनों बातें एक दूसरे के विपरीत हैं और फैसला स्वयं ही विरोधाभासी हो जाता है।


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पुलिस की तैयारी को लेकर सरकार ने क्या कहा? 
याचिका में सरकार ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि हाई कोर्ट ने यह मान लिया कि सार्वजनिक स्थानों पर गायों का वध किया जा रहा था या किया जाएगा, जबकि पुलिस ने अपने जवाबी हलफनामे में स्पष्ट कहा था कि पहले से ही सभी एहतियाती कदम उठा लिए गए हैं। सरकार के अनुसार, यह सुनिश्चित किया गया था कि सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी तरह का वध न हो और धार्मिक बलि केवल बंद तथा सार्वजनिक नजर से दूर स्थानों तक ही सीमित रहे। सरकार का कहना है कि हाई कोर्ट का निष्कर्ष राज्य द्वारा पेश किए गए तथ्यों के विपरीत है।

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