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Supreme Court: बांग्लादेश भेजे गए लोगों की वापसी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र सरकार से मांगा स्पष्ट जवाब
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, तेल अवीव
Published by: Himanshu Singh Chandel
Updated Fri, 24 Apr 2026 06:55 PM IST
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सार
सुप्रीम कोर्ट ने बांग्लादेश डिपोर्ट किए गए लोगों की भारत वापसी की याचिका पर केंद्र सरकार को अपना रुख साफ करने का आखिरी मौका दिया है। दिल्ली से पकड़े गए दिहाड़ी मजदूरों को पुलिस ने संदिग्ध बांग्लादेशी बताकर धकेल दिया था। कलकत्ता हाईकोर्ट पहले ही इस निर्वासन को जल्दबाजी और गैरकानूनी बताते हुए नागरिकों की वापसी के आदेश दे चुका है।
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने बांग्लादेश निर्वासित किए गए लोगों की भारत वापसी से जुड़ी एक अहम याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को सख्त निर्देश दिया है। अदालत ने सरकार को अपना रुख स्पष्ट करने के लिए आखिरी मौका दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने केंद्र सरकार के वकील से इस पूरे मामले में निर्देश लेकर वापस अदालत को सूचित करने को कहा है। यह पूरा मामला उन लोगों से जुड़ा है जिन्हें संदिग्ध विदेशी बताकर बांग्लादेश सीमा के पार भेज दिया गया था और अब उनके परिजन उन्हें वापस भारत लाने की कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।
इस मामले में याचिकाकर्ता भोडू शेख की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और संजय हेगड़े ने अपनी दलीलें रखीं। भोडू शेख की गर्भवती बेटी को भी बांग्लादेश भेज दिया गया था। वकीलों ने अदालत में कहा कि केंद्र सरकार का इस संवेदनशील मामले में अपना पक्ष अदालत को न बताना 'थोड़ा अनुचित' है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने साफ शब्दों में कहा कि वह केंद्र को एक आखिरी मौका दे रहे हैं। अदालत ने चेतावनी दी कि अगर इस बार आदेश का पालन नहीं हुआ, तो पीठ अंतिम सुनवाई के साथ आगे बढ़ेगी। मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि वह इस याचिका पर जल्द सुनवाई के लिए एक तारीख तय करेंगे।
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क्या है गर्भवती महिला की भारत वापसी का पूरा मामला?
पिछले साल 3 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने मानवीय आधार पर एक गर्भवती महिला (सुनाली खातून) और उसके आठ साल के बच्चे को भारत में प्रवेश करने की अनुमति दी थी। इन लोगों को कुछ महीने पहले ही बांग्लादेश धकेल दिया गया था। अदालत ने पश्चिम बंगाल सरकार को बच्चे की देखभाल करने और बीरभूम जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी को गर्भवती महिला को मुफ्त डिलीवरी सहित हर संभव चिकित्सा सहायता देने का निर्देश दिया था। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया था कि महिला और बच्चे को केवल मानवीय आधार पर भारत में आने दिया गया है और उन्हें निगरानी में रखा जाएगा। हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि वे उन्हें बांग्लादेशी नागरिक मानते हैं और उनकी भारतीय नागरिकता के दावे का डटकर विरोध करेंगे।
क्या पुलिस ने बिना जांच के दिहाड़ी मजदूरों को बांग्लादेश भेजा?
गर्भवती महिला के पिता भोडू शेख का आरोप है कि उनका परिवार पिछले दो दशकों से दिल्ली के रोहिणी इलाके के सेक्टर 26 में दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम कर रहा था। आरोप है कि दिल्ली पुलिस ने पिछले साल 18 जून को उन्हें बांग्लादेशी होने के शक में अचानक पकड़ लिया और 27 जून को सीमा पार धकेल दिया। जस्टिस बागची ने सुनवाई के दौरान एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर महिला यह साबित कर देती है कि वह भोडू शेख की बेटी है, तो यह उसकी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए काफी होगा। वरिष्ठ वकीलों ने अदालत से गुजारिश की है कि खातून के पति सहित जो अन्य लोग अभी भी बांग्लादेश में फंसे हैं, उन्हें भी वापस भारत लाया जाए। सिब्बल ने यह भी कहा कि महिला को दिल्ली की जगह उसके पिता के पास बीरभूम भेजना ज्यादा सही रहेगा।
हाईकोर्ट ने निर्वासन को गैरकानूनी क्यों माना था?
सुप्रीम कोर्ट दरअसल केंद्र सरकार की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जिसमें कलकत्ता हाईकोर्ट के 26 सितंबर 2025 के आदेश को चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट ने सुनाली खातून, स्वीटी बीबी और उनके परिवारों को 'अवैध प्रवासी' बताकर बांग्लादेश भेजने के केंद्र के फैसले को रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट ने इसे 'गैरकानूनी' करार देते हुए छह निर्वासित नागरिकों को एक महीने के भीतर वापस भारत लाने का निर्देश दिया था। इस मामले में एक याचिका अमीर खान ने भी दायर की थी, जिनकी बहन स्वीटी बीबी को बच्चों समेत दिल्ली पुलिस ने पकड़कर पड़ोसी देश भेज दिया था। अदालत ने पाया था कि दिल्ली एफआरआरओ ने 2 मई 2025 के गृह मंत्रालय के नियमों का उल्लंघन करते हुए बहुत जल्दबाजी में यह कार्रवाई की। नियमों के तहत निर्वासन से पहले राज्य सरकार द्वारा जांच की जानी थी। निर्वासित किए गए इन लोगों को बाद में बांग्लादेश पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि इस तरह की जल्दबाजी देश के न्यायिक माहौल को खराब करती है।
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क्या है गर्भवती महिला की भारत वापसी का पूरा मामला?
पिछले साल 3 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने मानवीय आधार पर एक गर्भवती महिला (सुनाली खातून) और उसके आठ साल के बच्चे को भारत में प्रवेश करने की अनुमति दी थी। इन लोगों को कुछ महीने पहले ही बांग्लादेश धकेल दिया गया था। अदालत ने पश्चिम बंगाल सरकार को बच्चे की देखभाल करने और बीरभूम जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी को गर्भवती महिला को मुफ्त डिलीवरी सहित हर संभव चिकित्सा सहायता देने का निर्देश दिया था। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया था कि महिला और बच्चे को केवल मानवीय आधार पर भारत में आने दिया गया है और उन्हें निगरानी में रखा जाएगा। हालांकि, उन्होंने यह भी साफ किया कि वे उन्हें बांग्लादेशी नागरिक मानते हैं और उनकी भारतीय नागरिकता के दावे का डटकर विरोध करेंगे।
क्या पुलिस ने बिना जांच के दिहाड़ी मजदूरों को बांग्लादेश भेजा?
गर्भवती महिला के पिता भोडू शेख का आरोप है कि उनका परिवार पिछले दो दशकों से दिल्ली के रोहिणी इलाके के सेक्टर 26 में दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम कर रहा था। आरोप है कि दिल्ली पुलिस ने पिछले साल 18 जून को उन्हें बांग्लादेशी होने के शक में अचानक पकड़ लिया और 27 जून को सीमा पार धकेल दिया। जस्टिस बागची ने सुनवाई के दौरान एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर महिला यह साबित कर देती है कि वह भोडू शेख की बेटी है, तो यह उसकी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए काफी होगा। वरिष्ठ वकीलों ने अदालत से गुजारिश की है कि खातून के पति सहित जो अन्य लोग अभी भी बांग्लादेश में फंसे हैं, उन्हें भी वापस भारत लाया जाए। सिब्बल ने यह भी कहा कि महिला को दिल्ली की जगह उसके पिता के पास बीरभूम भेजना ज्यादा सही रहेगा।
हाईकोर्ट ने निर्वासन को गैरकानूनी क्यों माना था?
सुप्रीम कोर्ट दरअसल केंद्र सरकार की उस याचिका पर सुनवाई कर रहा है, जिसमें कलकत्ता हाईकोर्ट के 26 सितंबर 2025 के आदेश को चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट ने सुनाली खातून, स्वीटी बीबी और उनके परिवारों को 'अवैध प्रवासी' बताकर बांग्लादेश भेजने के केंद्र के फैसले को रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट ने इसे 'गैरकानूनी' करार देते हुए छह निर्वासित नागरिकों को एक महीने के भीतर वापस भारत लाने का निर्देश दिया था। इस मामले में एक याचिका अमीर खान ने भी दायर की थी, जिनकी बहन स्वीटी बीबी को बच्चों समेत दिल्ली पुलिस ने पकड़कर पड़ोसी देश भेज दिया था। अदालत ने पाया था कि दिल्ली एफआरआरओ ने 2 मई 2025 के गृह मंत्रालय के नियमों का उल्लंघन करते हुए बहुत जल्दबाजी में यह कार्रवाई की। नियमों के तहत निर्वासन से पहले राज्य सरकार द्वारा जांच की जानी थी। निर्वासित किए गए इन लोगों को बाद में बांग्लादेश पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि इस तरह की जल्दबाजी देश के न्यायिक माहौल को खराब करती है।
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