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एसिड हमलों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: सजा बढ़ाने, आरोपी पर दोष साबित करने का बोझ डालने का सुझाव

न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: Sandhya Kumari Updated Mon, 04 May 2026 06:25 PM IST
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सार

सुप्रीम कोर्ट ने बढ़ते एसिड हमलों पर चिंता जताई, सजा कड़ी करने और आरोपी पर सबूत का बोझ डालने का सुझाव दिया। पीड़ितों को दिव्यांग मानने व दोषियों की संपत्ति जब्त कर मुआवजा देने पर जोर दिया।

Supreme Court Takes Tough Stance on Acid Attacks Enhancing Punishment and Shifting Burden of Proof Accused
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने एसिड हमलों के मामलों में तेज से बढ़ने पर गंभीर चिंता व्यक्त की। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को ऐसे अपराधों के लिए सजा बढ़ाने पर विचार करने का सुझाव दिया है। इसके साथ ही, अदालत ने यह भी कहा कि अपराध साबित करने का बोझ आरोपी पर डाला जाना चाहिए।

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मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने निर्देश दिया कि जिन व्यक्तियों को जबरन एसिड पिलाया जाता है या आंतरिक चोटें आती हैं, भले ही कोई बाहरी विकृति न हो, उन्हें भी विकलांग व्यक्ति अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत एसिड अटैक पीड़ित माना जाएगा। यह स्पष्टीकरण 2016 अधिनियम के लागू होने के समय से ही शामिल माना जाएगा। पीठ ने संबंधित मंत्रालय से इस मानित संशोधन को औपचारिक रूप से अधिसूचित करने की सराहना की।

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पीड़ितों को सहायता और न्याय

शीर्ष अदालत एसिड अटैक पीड़िता शाहीन मलिक द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में मांग की गई थी कि ऐसे पीड़ितों को कल्याणकारी योजनाओं तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए विकलांग व्यक्तियों के रूप में वर्गीकृत किया जाए। सुनवाई के दौरान, मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि एसिड हमलों के लिए निर्धारित मौजूदा सजा निवारक साबित नहीं हो रही है। उन्होंने कहा, मामलों की संख्या बढ़ी है। बर्बर और क्रूर एसिड हमले हुए हैं। मुख्य न्यायाधीश ने सवाल किया, क्या आपको नहीं लगता कि सजा और कठोर होनी चाहिए?

दोषी की संपत्ति जब्त हो

पीठ ने कहा कि 2013 से एसिड अटैक के मामलों की संख्या में वृद्धि हुई है, जो अपने आप में एक गंभीर विचारणीय मुद्दा है। अदालत ने सरकार को ऐसे अपराधों के लिए पर्याप्त सजा बढ़ाने पर विचार करने का सुझाव दिया। इसके अलावा, यह भी कहा कि दोष साबित करने का बोझ आरोपी पर डाला जाना चाहिए। पीठ ने यह भी सुझाव दिया कि ऐसे जघन्य मामलों में दोषी ठहराए गए लोगों की संपत्ति जब्त की जाए ताकि एसिड अटैक पीड़ितों को मुआवजा दिया जा सके। अदालत ने बाजार में एसिड की बिक्री पर नियंत्रण रखने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

कानून में संशोधन का प्रस्ताव

सुनवाई के दौरान, पीठ को बताया गया कि जिन पीड़ितों को जबरन एसिड पिलाया गया था, उन्हें 2016 अधिनियम के तहत एसिड अटैक पीड़ितों की अभिव्यक्ति में शामिल नहीं किया गया था। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को सूचित किया कि नोडल मंत्रालय ने पहले ही 2016 अधिनियम से जुड़ी अनुसूची में संशोधन का प्रस्ताव दिया है। शीर्ष अदालत ने 9 मार्च को सभी उच्च न्यायालयों को देश में एसिड अटैक मामलों के शीघ्र निपटान के लिए समय-सीमा तय करने को कहा था। मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद होगी।

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