सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   India News ›   supreme court updates SC suspends sentence in wife murder case amid delay in appeal hearing

Supreme Court: पत्नी की हत्या के मामले में दोषी को मिली जमानत, कोर्ट ने उम्रकैद की सजा पर लगाई रोक

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली। Published by: Nirmal Kant Updated Tue, 28 Apr 2026 06:31 PM IST
विज्ञापन
supreme court updates SC suspends sentence in wife murder case amid delay in appeal hearing
सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : ANI
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट ने एक व्यक्ति की उम्रकैद की सजा पर फिलहाल रोक लगा दी है। उसे अपनी पत्नी की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था। कोर्ट ने उसे जमानत भी दे दी है।
Trending Videos


यह मामला मध्य प्रदेश का है। व्यक्ति का नाम शिवेंद्र है। उसने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने तब तक उसकी सजा को फिलहाल रोकने से मना कर दिया गया था, जब तक उसकी अपील पर सुनवाई नहीं होती। शिवेंद्र को निचली अदालत ने अपनी पत्नी की हत्या के मामले में दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा दी थी। इस मामले में उसके साथ एक और आरोपी भी था।
विज्ञापन
विज्ञापन


इसके बाद उसने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में अपील की थी और सजा पर रोक लगाने की मांग की थी। लेकिन हाई कोर्ट ने उसकी यह मांग खारिज कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि यह पूरा मामला सिर्फ परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है। कोर्ट ने यह भी देखा कि शिवेंद्र लगभग आठ साल से जेल में है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में अभी 2013 और 2014 के मामलों की सुनवाई चल रही है, जबकि शिवेंद्र का मामला 2018 का है। ऐसे में उसकी अपील की सुनवाई में अभी काफी समय लग सकता है और उसे और कई साल जेल में रहना पड़ सकता है। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उसकी सजा पर रोक लगा दी और उसे जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। हालांकि, यह राहत तब तक लागू रहेगी, जब तक हाईकोर्ट का उसकी अपील पर अंतिम फैसला नहीं आ जाता।

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश- समिति बनाएगा एम्स , ब्रेन डेड घोषित करने की प्रक्रिया पर देगा राय

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि वह दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) से एक समिति बनाने को कह सकता है। यह समिति एक याचिका में दिए गए उन सुझावों की जांच करेगी, जिनका संबंध मरीज को ब्रेन डेड घोषित करने की प्रक्रिया से है। यह मामला एक पुरानी याचिका से जुड़ा है, जिसमें केरल हाईकोर्ट के जून 2017 के आदेश को चुनौती दी गई थी।

याचिकाकर्ता ने कोर्ट में कहा कि मरीज के ब्रेन डेड होने का पक्का और जांच योग्य सबूत होना चाहिए। कोर्ट में उन्होंने यह भी कहा कि ब्रेन डेड का मतलब मस्तिष्क में खून का प्रवाह पूरी तरह रुक जाना है। 

उन्होंने सुझाव दिया कि ऐसी स्थिति की पुष्टि के लिए एंजियोग्राफी और ईसीजी परीक्षण किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, ईसीजी परीक्षण मस्तिष्क की विद्युत गतिविधि को मापता है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने उनसे कहा, आप अपने सुझाव लिखित रूप में दीजिए। कोर्ट ने आगे कहा, हम यह प्रस्ताव रखते हैं कि एम्स के न्यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख एक समिति बनाएं और आपके सुझावों पर रिपोर्ट या राय दें।  बेंच ने यह भी बताया कि इस मामले की अगली सुनवाई जुलाई में होगी।

सीबीआई के लुकआउट सर्कुलर पर सुप्रीम रोक, गृह मंत्रालय से जवाब तलब
सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की ओर से जारी लुकआउट सर्कुलर (एलओसी) को निलंबित कर दिया है। यह आदेश निमेश नवीनचंद्र शाह के मामले में दिया गया है, जो सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के अलग-अलग मामलों में अभियोजन का सामना कर रहा है।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने 9 नवंबर 2022 के एलओसी को फिलहाल स्थगित रखने का निर्देश दिया। अदालत ने गृह मंत्रालय को इस मामले में पक्षकार बनाते हुए छह सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है। पीठ ने कहा कि याचिका में उठाए गए मुद्दे के निपटारे के लिए गृह मंत्रालय को पक्षकार बनाना जरूरी है। सुनवाई के दौरान शाह के वकील ने दलील दी कि एलओसी 2022 में जारी हुआ था, लेकिन उन्हें लगभग तीन वर्षों तक इसकी जानकारी नहीं दी गई। 

एसबीआई की अगुवाई वाला समूह रिलायंस इन्फ्रा मामले में वित्तीय कर्जदाता : सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम फैसले में कहा कि कॉरपोरेट गारंटी से उत्पन्न देनदारियों को दिवाला एवं ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के तहत वित्तीय ऋण माना जाएगा।

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कॉरपोरेट गारंटी की वैधता और उसके प्रवर्तन को बरकरार रखते हुए रिलायंस इन्फ्राटेल लिमिटेड (आरआईटीएल) की दिवाला प्रक्रिया में भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की अगुवाई वाले बैंकों के समूह को वित्तीय लेनदार के रूप में मान्यता दी। पीठ ने कहा, कॉरपोरेट देनदार यानी आरआईटीएल की तरफ से दी गई गारंटी, आईबीसी की धारा पांच(आठ) के तहत वित्तीय ऋण की श्रेणी में आती है। एसबीआई की अगुवाई वाले बैंकों को वित्तीय लेनदार के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।

ब्रेन डेड घोषित करने की प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट गठित कर सकता है एम्स की समिति
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को ब्रेन डेड घोषित करने की प्रक्रिया को लेकर अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि वह एम्स से विशेषज्ञ समिति गठित करने को कह सकता है। यह समिति याचिकाकर्ता के सुझावों की जांच करेगी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ केरल हाईकोर्ट के जून 2017 के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि मरीज को ब्रेन डेड घोषित करने में गड़बड़ियां होती हैं। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने कहा कि ब्रेन डेड घोषित करने के लिए ठोस और सत्यापन योग्य प्रमाण होना जरूरी है। इस प्रक्रिया में एंजियोग्राफी और ईईजी (इलेक्ट्रोएन्सेफलोग्राम) जैसे परीक्षण अनिवार्य किए जाएं, जिससे मस्तिष्क की गतिविधियों का सही आकलन हो सके। पीठ ने याचिकाकर्ता से अपने सुझाव लिखित रूप में देने को कहा और संकेत दिया कि एम्स के न्यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख से समिति बनाकर रिपोर्ट मांगी जाएगी। अब इस मामले की सुनवाई जुलाई में होगी। 

मनगढ़ंत जांच से कमजोर पड़ता है आपराधिक केस
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि कमजोर या पूर्व-नियोजित जांच, दोनों आपराधिक अभियोजन के लिए घातक हैं। लेकिन पूर्व-नियोजित जांच अधिक घातक होती है, क्योंकि इसमें निर्दोष लोगों के फंसने की पूरी संभावना होती है। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने ये टिप्पणियां असम में जुलाई 2008 में दर्ज हत्या के एक मामले के आरोपियों को बरी करते हुए कीं। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह अपराध अनसुलझा ही रह गया और 16 लोगों के खिलाफ मुकदमे पर काफी समय एवं धन खर्च हुआ। इनमें से कुछ की मुकदमे के दौरान मृत्यु भी हो गई तथा बाकी को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा। शीर्ष अदालत ने उन आरोपियों की अपीलों पर अपना फैसला सुनाया, जिन्होंने मार्च 2021 के उस निर्णय को चुनौती दी थी, जिसे गौहाटी हाईकोर्ट ने बरकरार रखा था।  

पीठ ने कहा कि कुल 16 लोगों के विरुद्ध आरोप-पत्र दाखिल किया गया था, जिनमें से एक की मुकदमे के दौरान मृत्यु हो गई। शीर्ष अदालत ने बताया कि 12 आरोपियों को दोषी ठहराया गया और उन्हें कथित अपराधों के लिए दंडित किया गया, जिनमें तत्कालीन भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 (हत्या) के अंतर्गत आरोप भी शामिल थे। हाईकोर्ट ने 11 आरोपियों की दोषसिद्धि और दंड को बरकरार रखा था, जबकि एक आरोपी को दोषमुक्त कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि दोषी ठहराए गए लोगों ने उसके समक्ष अपील दायर की है, जिनमें से दो अपीलकर्ता अब इस दुनिया में नहीं रहे। पीठ ने अपील स्वीकार करते हुए अपीलकर्ताओं को बरी कर दिया।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

एप में पढ़ें

Followed