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'सुप्रीम कोर्ट में घुसने नहीं देंगे': PIL की सनक देख भड़के जज ने दी चेतावनी; जानें क्या है मामला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नवीन पारमुवाल
Updated Mon, 20 Apr 2026 01:59 PM IST
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सार
सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार एक ही तरह की जनहित याचिका दाखिल करने पर नाराजगी जताई है। अदालत ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज से जुड़ी अर्जी खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को सख्त चेतावनी दी है।
सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : ANI
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विस्तार
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज से जुड़ी एक जनहित याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि बार बार एक जैसी याचिका दायर कर अदालत का समय बर्बाद न करें। याचिका पिनाकपाणि मोहंती नाम के व्यक्ति ने दाखिल की थी। याचिका में नेताजी सुभाष चंद्र बोस को भारत की आजादी का मुख्य नायक घोषित करने की मांग की गई थी।
सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्य बागची की बेंच ने कहा कि यह याचिका सिर्फ पब्लिसिटी पाने का एक जरिया लगती है। कोर्ट कहा कि इसी याचिकाकर्ता ने पहले भी ऐसी ही मांग के साथ याचिका दाखिल की थी जिसे खारिज कर दिया गया था। बार बार एक ही बात कोर्ट में लाने पर बेंच ने नाराजगी जाहिर की।
'सुप्रीम कोर्ट में एंट्री बंद कर देंगे'
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने व्यक्तिगत रूप से पेश हुए याचिकाकर्ता को चेतावनी देते हुए कहा, "सुप्रीम कोर्ट में एंट्री बंद कर देंगे।" कोर्ट ने याचिकाकर्ता पिनाकपाणी मोहंती द्वारा दायर इस याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को चेतावनी दी कि वह कानूनी प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल न करें। बेंच ने रजिस्ट्री को भी निर्देश दिया कि भविष्य में इस याचिकाकर्ता की किसी भी जनहित याचिका को स्वीकार न किया जाए।
यह भी पढ़ें: कानून के समक्ष समानता: सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस बोले- तकनीक अब सांविधानिक साधन, न्याय तक पहुंच करती है मजबूत
याचिकाकर्ता की क्या थी मांग?
याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस को आधिकारिक तौर पर राष्ट्रपुत्र घोषित किया जाए। इसके साथ ही याचिका में कहा गया था कि 21 अक्टूबर 1943 को आजाद हिंद फौज के स्थापना दिवस और 23 जनवरी को नेताजी की जयंती को नेशनल डे यानी राष्ट्रीय दिवस के रूप में घोषित किया जाए।
अदालत ने इन सभी मांगों को सुनने के बाद कहा कि इस तरह के मुद्दों पर बार बार याचिका दाखिल करना कोर्ट के समय की बर्बादी है। साल 2024 की शुरुआत में भी इसी याचिकाकर्ता ने लगभग इन्हीं मांगों के साथ कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था जिसे उस समय भी खारिज कर दिया गया था।
यह भी पढ़ें: 'पढ़े-लिखे भी बन रहे शिकार': डिजिटल अरेस्ट पर CJI सूर्यकांत ने जताई चिंता, RBI समेत बैंकों को दिए सख्त आदेश
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सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्य बागची की बेंच ने कहा कि यह याचिका सिर्फ पब्लिसिटी पाने का एक जरिया लगती है। कोर्ट कहा कि इसी याचिकाकर्ता ने पहले भी ऐसी ही मांग के साथ याचिका दाखिल की थी जिसे खारिज कर दिया गया था। बार बार एक ही बात कोर्ट में लाने पर बेंच ने नाराजगी जाहिर की।
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'सुप्रीम कोर्ट में एंट्री बंद कर देंगे'
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने व्यक्तिगत रूप से पेश हुए याचिकाकर्ता को चेतावनी देते हुए कहा, "सुप्रीम कोर्ट में एंट्री बंद कर देंगे।" कोर्ट ने याचिकाकर्ता पिनाकपाणी मोहंती द्वारा दायर इस याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को चेतावनी दी कि वह कानूनी प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल न करें। बेंच ने रजिस्ट्री को भी निर्देश दिया कि भविष्य में इस याचिकाकर्ता की किसी भी जनहित याचिका को स्वीकार न किया जाए।
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याचिकाकर्ता की क्या थी मांग?
याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस को आधिकारिक तौर पर राष्ट्रपुत्र घोषित किया जाए। इसके साथ ही याचिका में कहा गया था कि 21 अक्टूबर 1943 को आजाद हिंद फौज के स्थापना दिवस और 23 जनवरी को नेताजी की जयंती को नेशनल डे यानी राष्ट्रीय दिवस के रूप में घोषित किया जाए।
अदालत ने इन सभी मांगों को सुनने के बाद कहा कि इस तरह के मुद्दों पर बार बार याचिका दाखिल करना कोर्ट के समय की बर्बादी है। साल 2024 की शुरुआत में भी इसी याचिकाकर्ता ने लगभग इन्हीं मांगों के साथ कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था जिसे उस समय भी खारिज कर दिया गया था।
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जज पर टिप्पणी कर सनसनी फैलाना बर्दाश्त नहीं : शीर्ष कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सेलिब्रिटी मैनेजर दिशा सालियान मामले में वकील निलेश ओझा की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें बॉम्बे हाईकोर्ट की तरफ से उनके खिलाफ शुरू अवमानना कार्यवाही को चुनौती दी गई थी।
जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सोमवार को कहा कि प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जज पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाना न्यायपालिका की नींव पर प्रहार है। यह बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है। शीर्ष अदालत ने कहा, न्यायिक स्वतंत्रता लोकतंत्र का आधार है। वकील, जो कोर्ट का अधिकारी होता है, उसका व्यवहार गरिमापूर्ण होना चाहिए। पीठ के अनुसार अदालती आदेशों की कानूनी आलोचना संभव है, लेकिन जज की निष्ठा पर व्यक्तिगत कीचड़ उछालना पेशेवर मर्यादा के विरुद्ध है। कोर्ट ने हाईकोर्ट को इस मामले में स्वतंत्र रूप से तेजी से सुनवाई पूरी करने के निर्देश दिए हैं।
जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सोमवार को कहा कि प्रेस कॉन्फ्रेंस कर जज पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाना न्यायपालिका की नींव पर प्रहार है। यह बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है। शीर्ष अदालत ने कहा, न्यायिक स्वतंत्रता लोकतंत्र का आधार है। वकील, जो कोर्ट का अधिकारी होता है, उसका व्यवहार गरिमापूर्ण होना चाहिए। पीठ के अनुसार अदालती आदेशों की कानूनी आलोचना संभव है, लेकिन जज की निष्ठा पर व्यक्तिगत कीचड़ उछालना पेशेवर मर्यादा के विरुद्ध है। कोर्ट ने हाईकोर्ट को इस मामले में स्वतंत्र रूप से तेजी से सुनवाई पूरी करने के निर्देश दिए हैं।

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