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Tamil Nadu Election Analysis: 49 साल की द्रविड़ सत्ता को विजय की चुनौती; अन्नाद्रमुक या द्रमुक, कौन देगा साथ?

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चेन्नई Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Mon, 04 May 2026 11:02 AM IST
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सार

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के शुरुआती रुझानों ने सबको चौंका दिया है। 49 साल से राज कर रही द्रमुक और अन्नाद्रमुक को पछाड़कर अभिनेता विजय की दो साल पुरानी पार्टी टीवीके सबसे आगे निकलती दिखाई दे रही है। टीवीके 100 से ज्यादा सीटों पर आगे है, जबकि फिलहाल तक सीएम स्टालिन खुद पीछे चल रहे हैं। राज्य में इस बार मुकाबला त्रिकोणीय है। आइए, तमिलनाडु चुनाव के नतीजों को समझते हैं...

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टीवीके प्रमुख विजय थलापति। - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

तमिलनाडु की राजनीति में दशकों बाद ऐसी आंधी दिख रही है, जिसने बड़े-बड़े राजनीतिक पंडितों को हैरान कर दिया है। सिनेमाई पर्दे के हीरो से असल जिंदगी के राजनेता बने विजय ने राज्य की जनता के सामने एक नया और मजबूत विकल्प पेश किया। पुरानी पार्टियों के परिवारवाद, भ्रष्टाचार और घिसे-पिटे चुनावी वादों से ऊब चुके मतदाता, खासकर युवा और महिलाएं, अब विजय के रूप में एक नई उम्मीद देख रहे हैं।
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49 साल की द्रविड़ सत्ता को विजय की चुनौती
तमिलनाडु की राजनीति में पिछले 49 वर्षों से केवल दो ही द्रविड़ पार्टियों, द्रमुक और अन्नाद्रमुक का दबदबा रहा है। राज्य की सत्ता हमेशा इन्हीं दोनों खेमों के बीच घूमती रही है, लेकिन अब अभिनेता से नेता बने थलापति विजय की पार्टी टीवीके ने इस दशकों पुराने एकाधिकार को सीधी और कड़ी चुनौती दी है। विजय की रैलियों में जो भीड़ दिखाई दे रही थी। वो वोट में परिवर्तित होती दिखी। 49 साल की मजबूत द्रविड़ सत्ता के सामने विजय एक बड़े तूफान की तरह खड़े हो गए हैं।
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नंबरगेम में फंसा पेंच तो किस ओर जाएंगे विजय?
चुनाव के रुझानों में थलापति विजय की पार्टी टीवीके भले ही सबसे ज्यादा सीटों पर आगे चल रही है, लेकिन सियासत में जब तक जादुई आंकड़ा पार न हो जाए, तब तक कुछ भी तय नहीं माना जाता। दरअसल तमिलनाडु में सरकार बनाने के लिए 118 नंबर होना चाहिए। फिलहाल विजय की पार्टी 100 से 110 सीटों के आसपास आगे चल रही है। ऐसे में राजनीतिक गलियारों में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि अगर विजय अपने दम पर सरकार बनाने से चूक जाते हैं और त्रिशंकु विधानसभा की नौबत आती है, तो वह किस पार्टी का समर्थन लेंगे या किसे अपना सकते हैं।



दरअसल अपनी लगभग हर चुनावी रैली में विजय ने सत्ताधारी पार्टी द्रमुक और केंद्र में बैठी भाजपा पर जमकर निशाना साधा । उन्होंने इन दोनों पार्टियों को अपना मुख्य राजनीतिक और वैचारिक प्रतिद्वंद्वी बताया है। लेकिन, इस पूरी आक्रामक बयानबाजी के बीच एक बात जिसने सबका ध्यान खींचा, वह यह थी कि विजय ने मुख्य विपक्षी पार्टी अन्नाद्रमुक पर हमेशा 'हल्का हाथ' रखा। उन्होंने अन्नाद्रमुक के खिलाफ कोई तीखा या कड़वा हमला नहीं किया। इस का फायदा अब विजय को मिल सकता है।

अगर नतीजों में नंबरगेम का पेंच फंसता है, तो संभावना है अन्नाद्रमुक और टीवीके का साथ आना सबसे स्वाभाविक कदम होगा। अन्नाद्रमुक भी यह भली-भांति जानती है कि द्रमुक को सत्ता से बेदखल करने के लिए यह सबसे सुनहरा मौका है। ऐसे में पूरी संभावना है कि अन्नाद्रमुक, अपनी सहयोगी भाजपा का साथ छोड़कर सीधे तौर पर विजय को अपना समर्थन दे दे।

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'मास्टर' ने कैसे सबको किया चित?
राज्य में पिछले पांच दशकों से चली आ रही द्रमुक और अन्नाद्रमुक की राजनीति के मजबूत किले को थलापति विजय की मात्र दो साल पुरानी पार्टी टीवीके ने हिलाकर रख दिया है। अब तक सत्ता का राजदंड केवल इन्हीं दो द्रविड़ पार्टियों के बीच घूमता था, लेकिन इस बार टीवीके के उदय ने उस एकाधिकार को पूरी तरह से तोड़ दिया है। यह रुझान इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि तमिलनाडु का मतदाता, विशेषकर पहली बार वोट डालने वाले युवा और महिलाएं, अब पुरानी पार्टियों के परिवारवाद, भ्रष्टाचार और घिसे-पिटे चेहरों से ऊब चुका है। विजय ने जमीनी स्तर पर जनता की नब्ज को मजबूती से पकड़ा है, जिसने 75 साल पुरानी सत्ताधारी पार्टी और मुख्य विपक्ष दोनों के ही पसीने छुड़ा दिए हैं।

टीवीके को मिला स्टालिन के खिलाफ जो सत्ता विरोधी लहर का फायदा
चुनावी गणित और जमीनी हकीकत के नजरिए से देखें, तो इस बार वोटों का भारी बिखराव भी हार-जीत का असली फैसला कर रहा है। इस त्रिकोणीय और बहुकोणीय मुकाबले के कारण अब किसी भी पार्टी के लिए महज 30 से 35 प्रतिशत वोट शेयर के साथ सीट फतह करना मुमकिन हो गया है। मुख्यमंत्री स्टालिन के खिलाफ जो सत्ता विरोधी लहर थी, उसका सीधा और सबसे बड़ा फायदा टीवीके को मिल रहा है, क्योंकि अन्नाद्रमुक और भाजपा जनता का पूरा भरोसा जीतने में पिछड़ते दिख रहे हैं। कुल मिलाकर, यह चुनाव तमिलनाडु की राजनीति में एक नए युग का शंखनाद है, जहां पारंपरिक जातिगत और गठबंधन के पुराने समीकरणों पर जनता की बदलाव की मजबूत चाहत भारी पड़ गई है।

ये समीकरण हैं हार-जीत का कारण
इस चुनाव में सत्ता विरोधी लहर से ज्यादा परिवारवाद और नेताओं के अहंकार को लेकर जनता में नाराजगी है। द्रमुक इस चुनाव को भाजपा को दक्षिण से दूर रखने की लड़ाई बता रही है, जबकि भाजपा अन्नाद्रमुक के सहारे राज्य में अपनी जगह पक्की करना चाहती है। राज्य में ओबीसी वर्ग सबसे बड़ा वोट बैंक है, जिसमें वन्नियार, गाउंडर और मुधरैयार जैसी जातियां चुनावी नतीजे तय करती हैं। लेकिन इस बार टीवीके ने फर्स्ट टाइम वोटर्स और राज्य की 3.24 करोड़ महिला वोटरों के बीच गहरी सेंधमारी की है। 15 वर्षों में चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की संख्या दोगुनी हो गई है। इस बार रिकॉर्ड 4600 उम्मीदवार मैदान में हैं। जयललिता और करुणानिधि जैसे कद्दावर नेताओं के बाद यह पहली पीढ़ी का चुनाव है, जहां नई लीडरशिप की असली परीक्षा हो रही है। 


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