कानो देखी में इस बार कॉरपोरेट जुगलबंदी
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इतिहास अपने आपको दोहराता है, बालक सयाने का पिता होता है। यह कहावत कॉरपोरेट जगत पर एक बार फिर सही लग रही है। खबर है कि देश के आला कॉरपोरेट घराने का एक बड़ा तबका मोदी सरकार के खिलाफ लामबंद होने लगा है।
2014 में भी कुछ ऐसा हुआ था। जब कॉरपोरेट तबका लामबंद होकर गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के पीछे खड़ा हो गया था। तब इस तबके की अगुआई नगर सेठ मुकेश भाई कर रहे थे।
हालांकि अभी साफ नहीं है कि इस बार अगुआई कौन सा घराना कर रहा है, लेकिन चाहे सुनील भारती मित्तल हों या रुईया ब्रदर्स, अनिल धीरूभाई अंबानी हों या धूत परिवार मौजूदा सरकार में दु:खियारों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
खबर यह भी है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी इससे काफी खुश चल रहे हैं। इतना ही नहीं केंद्र सरकार के एक केंद्रीय मंत्री भी खुश हैं। उन्हें लग रहा है कि नवंबर-दिसंबर तक देश की राजनीतिक आबो-हवा बदल जाएगी।
आसमान में टंगा नीतीश कुमार का ख्वाब
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का ख्वाब हवा में टंगा दिखाई दे रहा है। बिहार की राजनीति उनके लिए लगातार मुश्किल होती जा रही है। अब वह इसे महसूस भी करने लगे हैं। पिछले महीने नीतीश कुमार की प्रधानमंत्री से भेंट हुई थी।
प्रधानमंत्री ने चर्चा के दौरान बिहार के विकास से जुड़ी सारी बातें सुनी, लेकिन जैसे ही नीतीश कुमार राजनीतिक चर्चा पर आने चाहे प्रधानमंत्री जी इसका जिम्मा भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पर डालकर कन्नी काट गए। इसके बाद नीतिश कुमार ने दो रणनीति अपनाई। पहली तो यह कि उन्होंने लालू को फोन करके महागठबंधन का विकल्प खुला रखकर डराना चाहा और दूसरा अपने प्रतिनिधियों को भाजपा अध्यक्ष के पास भेजकर सीटों के बंटवारे को स्पष्ट करने का प्रयास किया। यानी आंख दिखाओ और हासिल कर लो।
इधर प्रधानमंत्री से मिले संकेत पर केंद्रीय खाद्य, उपभोक्ता मामले एवं वितरण मंत्री राम विलास पासवान ने नीतीश कुमार से चर्चा की पहल शुरू की। लेकिन जो खबर है, वह नीतीश के लिए डरावने भीत की तरह है। कांग्रेस और राजद में नीतीश को लेकर अवरोध हैं।
जीतन राम मांझी और शरद यादव भी उनकी राह में बड़ा कांटा बनकर खड़े हैं। दूसरी तरफ जिस बिहार में 2014 में भाजपा ने 22 सीटें जीती थी, लोजपा ने छह जीत ली थी और कुशवाहा की पार्टी रालोसपा का भी प्रदर्शन अच्छा था, वहां अमित शाह के पास आधा दर्जन से अधिक सीटें छोडऩे का चारा नहीं बचा है। बाकी नीतीश जी जानें।
उद्धव बाबा आप बताओ
शिवसेना के उद्धव ठाकरे की दाल गल नहीं रही है। भाजपा भी शिवसेना की कड़ी दाल चबाना नहीं चाहती। यह बात अलग है कि इसके बावजूद सार्वजनिक तौर पर अमित शाह शिवसेना के साथ संबंधों के हिमायती नजर आते हैं। आते ही नहीं हैं, बल्कि मातोश्री जाकर उद्धव शिवसेना चीफ उद्धव ठाकरे से मिल आए हैं।
उद्धव चाहते हैं कि भजपा 2019 के लोकसभा चुनाव के बाबत महाराष्ट्र में उनके लिए कम से कम आधी सीट छोड़ दे। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की परेशानी यह है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में जब भाजपा दो दर्जन के करीब सीट चुकी है 2019 में 24 सीटों पर चुनाव लडक़र अपने सीटों की संख्या क्यों घटाए। तर्क सीधा है, गणित पेंचीदा। उद्धव के पास तीखे बयान के साथ बस शर्त है तो अमित शाह के पास चुप रहने का विकल्प। भाई नहीं मानोगे तो.......क्या कर सकते हैं?
आखिर कौन है वह दुश्मन
भाजपा घर के भीतर खड़े दुश्मनों को तलाश रही है जो करते कुछ नहीं और नकारात्मक माहौल को हवा भी दे रहे हैं। यह वह वर्ग है जो दबी जुबान कह रहा है कि 2019 में एनडीए की सरकार बनेगी। लेकिन प्रधानमंत्री कौन बनेगा जैसे सवाल पर चतुराई दिखा दे रहा है।
साफ कह देता है कि मोदी जी के पीएम बनने पर कुछ नहीं कह सकता, लेकिन एनडीए को सरकार बनाने का बहुमत मिलने की गारंटी दे सकता है। केंद्र सरकार के एक राज्यमंत्री हैं। संघ में गहरी पैठ रखते हैं। उनकी भी राय कुछ इसी तरह की है।
कुछ समय पहले तक इसी वर्ग से केंद्र सरकार के बेस्ट परफार्मर के तौर पर नितिन गडक़री को प्रचारित करके उन्हें भावी प्रधानमंत्री के रूप में पेश किया जा रहा था। इसी तरह का एक वर्ग राजनाथ सिंह का प्रभाव बढऩे को भी हवा दे रहा है।
संघ के लोग भी ऐसी कानाफूसी से परेशान है। जबकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष शाह 2019 के प्रति आश्वस्त हैं। सूत्र बताते हैं कि दोनों लोगों से कह रहे हैं कि वह बस अपने काम में जुट जाएं और 2019 की चिंता छोड़ दें। 2014 के बारे में सोचें।
मराठा सरदार, शरद पवार
मराठा सरदार, शरद पवार काफी खुश चल रहे हैं। उम्र और राजनीतिक कॉरियर के आखिरी पड़ाव पर उनकी पूछ बढ़ गई है। पवार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के करीबियों में गिने जाते हैं। वैसे भी राजनीति में उनके दुश्मन कम और दोस्त ज्यादा हैं।
खबर है कि प्रधानमंत्री उनका कुशल क्षेम ले लेते हैं। यह तो एक बात हुई। दूसरा पक्ष और शानदार है। यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी शरद पवार को महत्व दे रही हैं। सोनिया तक तो ठीक है।
राहुल गांधी भी अक्सर शरद पवार के पास राजनीति मंत्र लेने के लिए चले जाते हैं। पवार को व्यवहारिक राजनीति करनी आती है। उन्हें पता है कि एनसीपी ज्यादा से ज्यादा डेढ़ दर्जन तक सीटें ही जीत सकती है। लिहाजा वह 2019 में कोई चमत्कार होने वाला सपना नहीं देख रहे हैं।
लिहाजा राहुल गांधी पवार की राय को अहमियत भी दे रहे हैं। वैसे भी राहुल के लिए दो शरद अहम होते जा रहे हैं। एक शरद पवार और दूसरे शरद यादव। दोनों ही शरद कांग्रेस की अगुआई वाले राष्ट्रीय गठबंधन को पावरफुल मानकर तीसरे मोर्चे की संभावना का गुब्बारा भी फोड़ रहे हैं। अब देखते जाइए आगे मराठा सरदार कहे जाने वाले शरद पवार आगे क्या राजनीतिक गुल खिलाते हैं।
माया को चाहिए बस 50 सीट
बसपा प्रमुख मायावती बहुजन का मिशन पूरा करने में कोई समझौता नहीं करती। इस बार उनके लिए बहुजन का मिशन 2019 में प्रस्तावित लोकसभा चुनाव में 50 सीटें लाना है। राजनीतिक तालमेल के जरिए उन्हें यह लक्ष्य आसान लग रहा है। मायावती को पता है कि ठीक-ठाक सीटें आ गई तो आगे बहुत कुछ ठीक होता जाएगा।
इसलिए वह तालमेल के मामले में भी कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहती। बसपा के नेता नंबर तीन का मानना है कि सबकुछ ठीक रहा तो अकेले उ.प्र. से ही 25-30 सीटें मिल जाएंगी। इसके आलावा पार्टी की बिहार, म.प्र., छत्तीसगढ़, कर्नाटक, हरियाणा में खाता खोलने उम्मीदें जिंदा हैं।
शायद इसीलिए मायावती प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों के खिलाफ खड़े होने में भी कोई संकोच नहीं कर रही हैं। लखनऊ में मायावती के आवास पर लगातार सक्रिय रहने वाले सूत्र का कहना है कि समय आने दीजिए सब ठीक हो जाएगा। अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के साथ तालमेल भी और अन्य राज्यों में सहयोगियों के साथ सीटों का बंटवारा भी।
कांग्रेस पार्टी के एक पुराने महासचिव हैं। मीडिया से भी उनका गहरा लगाव है। कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा दिल्ली के आलीशान होटल में दी गई रोजा इफ्तार दावत में उन्होंने एक मंशा जाहिर की। कुछ मीडिया के लोगों से सप्ताह में दो दिन प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आने और एकाध घंटे बैठकर टेबल चर्चा का प्लान रखा।
लोगों ने प्लान को हाथों-हाथ ले लिया। खबर भी जंगल के आग की तरह फैलकर उनके विरोधी खेमे में जा पहुंची। खबर पहुंचना था कि कई दिग्गज नेताओं के हाथ-पांव फूल गए। दिल्ली के एक नेता ने तो कई मीडिया कर्मियों से इसका ब्यौरा लेने की भी कोशिश की। लेकिन विरोधी गुट ने तब राहत की सांस ली जब वरिष्ठ कांग्रेसी नेता अपने बताए के मुताबिक योजना पर अमल ही नहीं किए।