Explainer: सदन दर सदन टूटती टीएमसी, काकोली के दावे निकले सही तो क्या ममता का होगा उद्धव जैसा हाल?
तृणमूल कांग्रेस में बढ़ती अंदरूनी कलह ने पश्चिम बंगाल से लेकर दिल्ली तक राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है। कई सांसदों के बागी खेमे के संपर्क में होने की खबरों के बीच सवाल उठ रहा है कि क्या पार्टी संसद में टूट की ओर बढ़ रही है। अगर सांसद पार्टी छोड़ते हैं तो क्या उनकी सदस्यता चली जाएगी? दल-बदल विरोधी कानून के तहत कब अयोग्यता लागू होती है और कब दो-तिहाई सांसदों का समर्थन उन्हें कानूनी संरक्षण देता है? आइए विस्तार जानते हैं...
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विस्तार
पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर मचा सियासी घमासान दिल्ली तक पहुंच गया है। राज्यसभा में टीएमसी के पूर्व मुख्य सचेतक सुखेंदु शेखर रॉय ने सांसद पद और पार्टी दोनों से इस्तीफा दे दिया। लोकसभा में भी पार्टी दो फाड़ हो गई है। सोमवार को टीएमसी के 14 सांसदों ने भाजपा नेता भूपेंद्र यादव से मुलाकात की। बागी गुट अपने साथ 20 सांसदों के समर्थन का दावा कर रहा है।
ऐसे में सवाल यह है कि इस बगावत का लोकसभा में क्या असर पड़ेगा? क्या राज्यसभा में भी पार्टी दो हिस्सों में बंट सकती है? ममता के पास बागी विधायकों और सांसदों पर कार्रवाई करने के क्या विकल्प हैं? सांसद या विधायक पार्टी छोड़ते हैं तो क्या उनकी सदस्यता चली जाएगी? दल-बदल विरोधी कानून क्या कहता है? आइये जानते हैं...
टीएमसी के कितने लोकसभा सांसद बागी हुए?
लोकसभा में इस वक्त तृणमूल कांग्रेस के 28 सांसद हैं। पार्टी की बागी सांसद काकोली घोष ने 20 टीएमसी सांसदों के एनडीए गठबंधन को समर्थन का दावा किया है। हालांकि, सोमवार को भाजपा नेता भूपेंद्र यादव से मिलने पहुंचे टीएमसी सांसदों की संख्या सिर्फ 14 बताई गई है।
इस बगावत का लोकसभा में क्या असर पड़ेगा?
काकोली घोष ने सोमवार को कहा कि मेरे साथ टीएमसी के करीब 20 सांसदों ने भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को समर्थन देने का फैसला किया है। घोष ने कहा कि इस संबंध में 20 टीएमसी सांसदों के हस्ताक्षर वाला पत्र लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को भेजकर दिया गया है। लोकसभा में टीएमसी के 28 सदस्य हैं। अगर 20 सदस्यों के हस्ताक्षर वाली बात सही है तो ये आंकड़ा पार्टी की सदस्य संख्या के दो-तिहाई (19) से अधिक होगी। इस स्थिति में बागी गुट असली टीएमसी होने दावा कर सकता है। या फिर किसी पार्टी में विलय का पत्र भी दे सकते हैं। दोनों स्थितियों में लोकसभा में एनडीए की स्थिति और मजबूत हो जाएगी। इतना ही नहीं बागी सदस्यों वाली टीएमसी एनडीए का दूसरा सबसे बड़ा दल बन जाएगी। अभी एनडीए में 240 सदस्यों वाली भाजपा सबसे बड़ा दल है। इसके बाद 16 सदस्यों वाली टीडीपी और 12 सदस्यों वाला जदयू आते हैं।
2/3 का गणित क्या कहता है?
दल-बदल कानून से बचने के लिए किसी दल के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सांसदों या विधायकों को एक साथ मुख्य पार्टी से अलग होना या संसदीय दल के विलय का समर्थन करना होता है। इस स्थिति में इन सांसदों या विधायकों की सदस्यता नहीं जाती है। इसका सबसे ताजा उदाहरण राज्यसभा में देखने को मिला था। जब 10 सदस्यों वाली आम आदमी पार्टी के सात सांसदों ने मुख्य पार्टी से खुद को अलग करके आम आदमी पार्टी संसदीय दल का विलय भाजपा में कर लिया था। खुद को असली पार्टी बताने का दावा भी ये सांसद कर सकते हैं। इसका उदाहरण 2022 में महाराष्ट्र में देखने को मिला था। जब शिवसेना से दो-तिहाई से ज्यादा विधायकों ने उद्धव ठाकरे से बगावत करके अपना अलग गुट बना लिया था। बाद में भाजपा के समर्थन से राज्य की सत्ता में आ गए थे। इतना ही नहीं इस बागी गुट ने विधानसभा के साथ लोकसभा और राज्यसभा में भी ये करके, खुद के असली शिवसेना होने की लड़ाई भी जीती थी।
क्या टीएमसी के सांसदों पर दल-बदल कानून लागू हो सकता है?
अगर टीएमसी के बागी सांसद दो तिहाई से कम रह जाते हैं तो इन पर दल-बदल कानून लागू हो सकता है। यानी बागियों की संख्या 19 से कम होने की स्थिति में सभी बागी सांसदों की संसद सदस्यता जा सकती है। ये दल बदल कानून भी तब लगेगा जब पार्टी की ओर से लोकसभा अध्यक्ष को इस संबंध में शिकायत की जाएगी। उसके बाद अध्यक्ष शिकायत पर सुनवाई करके फैसला लेंगे। मौजूदा स्थिति में टीएमसी सांसदों के पार्टी नेतृत्व से नाराज होने और बागी खेमे के संपर्क में होने की चर्चा है। केवल असंतोष जताने, अलग राय रखने या किसी दूसरे दल के नेताओं से मुलाकात करने भर से दल-बदल विरोधी कानून लागू नहीं किया जा सकता है। कानून तभी प्रभावी होता है जब किसी सांसद की गतिविधियां उसकी मूल पार्टी छोड़ने या दूसरी पार्टी का समर्थन करने की श्रेणी में आ जाएं।

क्या टीएमसी के राज्यसभा सांसद भी बगावत कर रहे हैं?
पार्टी के राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर राय ने सोमवार को पार्टी और राज्यसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद पार्टी सांसदों की संख्या 13 से घटकर 12 हो गई। इसके अलावा अभी अन्य किसी राज्यसभा सांसद के बागी होने की चर्चा नहीं है। राज्यसभा में अगर इस तरह की बगावत होती है तो बागियों की संख्या कम से कम 8 होनी होगी। इसके बाद ही ये बागी पार्टी से अलग गुट बना सकेंगे।
विधानसभा में टीएमसी का क्या हाल है?
मई में आए विधानसभा चुनाव नतीजे के बाद टीएमसी दो गुटों में बंट गईं। बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी ने 58 बागी विधायकों का समर्थन हासिल कर नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी पर कब्जा कर लिया। जबकि, ममता बनर्जी ने नेता प्रतिपक्ष के लिए शोभनदेव चट्टोपाध्याय के नाम का एलान किया था। बनर्जी ने दावा किया कि उन्हें पार्टी के 80 में से 61 विधायकों का समर्थन प्राप्त है। यहां भी बागियों की संख्या पार्टी विधायकों की संख्या के दो तिहाई (54) से ज्यादा है।
दल-बदल कानून आया क्यों?
बात साल 1967 की है। हरियाणा में सत्ता संघर्ष चल रहा था। विधायक आए दिन पाला बदल रहे थे। हर दिन सरकार के साथ और खिलाफ होने वाले विधायकों के नाम सामने आते थे। इसी दौरान हसनपुर के निर्दलीय विधायक गया लाल ने एक ही दिन में तीन बार गुट बदल लिया था। इसके बाद भारतीय राजनीति में "आया राम, गया राम" शब्द प्रचलित हो गया। उस दौर में कई राज्यों में विधायकों की खरीद-फरोख्त और बार-बार सरकारें गिराने की घटनाएं सामने आईं।
इसी राजनीतिक अस्थिरता को रोकने के लिए 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने संविधान में दसवीं अनुसूची जोड़ी। इसे ही दल-बदल विरोधी कानून कहा जाता है। अलग-अलग मौकों पर इस कानून में कई बदलाव भी किए गए।
कब लागू होता है यह कानून?
किसी सांसद या विधायक को दल-बदलू माना जा सकता है अगर वह:
- स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ दे।
- किसी दूसरी पार्टी में शामिल हो जाए।
- पार्टी व्हिप के खिलाफ मतदान करे।
- मतदान से अनुपस्थित रहे जबकि पार्टी ने उपस्थित रहने का निर्देश दिया हो।
- उसके सार्वजनिक आचरण से यह साबित हो कि वह अपनी पार्टी छोड़ चुका है।
सुप्रीम कोर्ट कई मामलों में स्पष्ट कर चुका है कि केवल लिखित इस्तीफा ही जरूरी नहीं है। अगर किसी नेता की गतिविधियां दूसरी पार्टी के समर्थन में दिखती हैं, तो इसे भी "स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ना" माना जा सकता है।
दल-बदल का कानून लगेगा या नहीं ये फैसला कौन करता है?
लोकसभा सांसदों के मामले में लोकसभा अध्यक्ष ये फैसला करते हैं। वहीं, राज्यसभा सदस्यों के मामले में राज्यसभा के सभापति ये फैसला लेते हैं। इसी तरह विधायकों के मामले में विधानसभा अध्यक्ष को यह तय करना होता है। अगर किसी सदस्य के खिलाफ दल-बदल की शिकायत की जाती है तो अंतिम फैसला संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी लेते हैं। हालांकि उनके फैसले को बाद में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।
अगर बागी गुट 2/3 संख्या नहीं जुटा पाता तो क्या होता है?
अगर बगावत करने वाले सांसद या विधायक अकेले या छोटे समूह में पार्टी छोड़ते हैं और उसके पास पार्टी के विधायी दल की कुल संख्या का दो-तिहाई समर्थन नहीं होता है, तो:
- उनकी सदस्यता रद्द हो सकती है। उसकी सीट खाली घोषित की जा सकती है। यही वजह है कि किसी भी राजनीतिक टूट या बगावत में सबसे ज्यादा चर्चा 2/3 संख्या के गणित की होती है।
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के कुछ विधायकों ने भी तो बगावत की थी, उनकी सदस्यता क्यों नहीं गई?
पिछले साल सपा ने भाजपा को समर्थन देने के आरोप में अपने तीन विधायकों को पार्टी से निष्कासित कर दिया था। इनमें अयोध्या के गोसाईंगंज सीट से जीते अभय सिंह, अमेठी की गौरीगंज सीट से जीते राकेश प्रताप सिंह और रायबरेली की ऊंचाहार सीट से जीते मनोज पांडेय शामिल थे। इन सभी की विधानसभा सदस्यता नहीं गई। विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने इन तीनों विधायकों को असंबद्ध सदस्य घोषित कर दिया। अब मनोज पांडेय योगी आदित्यनाथ की कैबिनेट का हिस्सा हैं।
दरअसल दल-बदल विरोधी कानून के तहत केवल पार्टी से निकाले जाने भर से किसी विधायक या सांसद की सदस्यता समाप्त नहीं होती। सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया है कि अगर कोई व्यक्ति किसी राजनीतिक दल के टिकट पर निर्वाचित हुआ है और बाद में पार्टी उसे निष्कासित कर देती है, तो वह सदन में उस दल से निर्वाचित सदस्य ही माना जाता है और "अनअटैच्ड सदस्य" के रूप में अपनी सीट बरकरार रख सकता है। उसकी सदस्यता तभी खतरे में पड़ती है जब वह स्वयं पार्टी छोड़ दे, किसी दूसरी पार्टी में शामिल हो जाए या ऐसे कदम उठाए जिन्हें मूल पार्टी की सदस्यता स्वेच्छा से त्यागना माना जाए। यही वजह है कि निष्कासन और दल-बदल को कानून अलग-अलग परिस्थितियों के रूप में देखता है।