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यूनिसेफ की रिपोर्ट: दो या अधिक जलवायु खतरों की जद में भारत के 97% बच्चे, स्वास्थ्य-पोषण पर खतरा
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।
Published by: Devesh Tripathi
Updated Thu, 25 Jun 2026 06:29 AM IST
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सार
यूनिसेफ की नई रिपोर्ट के अनुसार भारत के अधिकांश बच्चे जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न कई खतरों का एक साथ सामना कर रहे हैं। बढ़ती गर्मी, सूखा, बाढ़, तूफान और प्रदूषण जैसी चुनौतियां बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण और समग्र विकास को प्रभावित कर रही हैं। रिपोर्ट बताती है कि बड़ी संख्या में बच्चे ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहां कई जलवायु जोखिम एक साथ मौजूद हैं, जिससे उनकी संवेदनशीलता और बढ़ जाती है।
जलवायु परिवर्तन के खतरों में घिरे बच्चे
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
भारत में जलवायु परिवर्तन का असर बच्चों पर तेजी से गहराता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) की 16 जून 2026 को जारी रिपोर्ट के अनुसार देश के 97 प्रतिशत बच्चे कम से कम दो जलवायु खतरों का सामना कर रहे हैं, जबकि 23.4 करोड़ से अधिक बच्चे एक साथ तीन या उससे ज्यादा जलवायु जोखिमों की चपेट में हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक अत्यधिक गर्मी, सूखा, बाढ़, उष्णकटिबंधीय तूफान और वायु प्रदूषण जैसी चुनौतियां बच्चों के स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा और सुरक्षा पर गंभीर असर डाल रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 41.16 करोड़ बच्चे कम से कम दो जलवायु संबंधी खतरों से प्रभावित हैं। इनमें सूखा, नदियों और तटीय क्षेत्रों में बाढ़, उष्णकटिबंधीय तूफान, लू, अत्यधिक गर्मी, जंगल की आग और धूल भरी आंधियां शामिल हैं।
23.4 करोड़ से ज्यादा बच्चे कम से कम तीन जलवायु खतरों का कर रहे सामना
इनमें से 23.4 करोड़ से अधिक बच्चे, जो देश की कुल बाल आबादी का लगभग 55 प्रतिशत हैं, कम से कम तीन जलवायु खतरों का सामना कर रहे हैं। यूनिसेफ का कहना है कि कई बच्चों के लिए ये खतरे अलग-अलग नहीं बल्कि एक साथ मौजूद हैं, जिससे उनके जीवन और विकास पर कई स्तरों पर असर पड़ता है।
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रिपोर्ट बताती है कि सूखा और अत्यधिक गर्मी भारत में बच्चों के लिए सबसे व्यापक जलवायु जोखिम हैं। करीब 15.88 करोड़ बच्चे ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहां ये दोनों खतरे मौजूद हैं। वहीं 8.41 करोड़ बच्चे ऐसे इलाकों में रहते हैं जहां उष्णकटिबंधीय तूफान, सूखा और अत्यधिक गर्मी तीनों का खतरा है। इसके अलावा 3.85 करोड़ बच्चे नदियों में बाढ़, सूखा और अत्यधिक गर्मी के संयुक्त जोखिम वाले क्षेत्रों में रहते हैं।
सूखा संभावित क्षेत्रों में 41.02 करोड़ बच्चे
यूनिसेफ के मुताबिक सूखा भारत में बच्चों को प्रभावित करने वाला सबसे व्यापक जलवायु खतरा है। देश के 96 प्रतिशत से अधिक बच्चे, यानी लगभग 41.02 करोड़ बच्चे, ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहां सूखे की आशंका बनी रहती है। सूखे का असर केवल पानी की उपलब्धता तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह खाद्य सुरक्षा, पोषण और परिवारों की आजीविका को भी प्रभावित करता है। इसके परिणामस्वरूप बच्चों में कुपोषण और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ जाता है।
रिपोर्ट के मुताबिक अत्यधिक गर्मी, सूखा, बाढ़, उष्णकटिबंधीय तूफान और वायु प्रदूषण जैसी चुनौतियां बच्चों के स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा और सुरक्षा पर गंभीर असर डाल रही हैं। रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 41.16 करोड़ बच्चे कम से कम दो जलवायु संबंधी खतरों से प्रभावित हैं। इनमें सूखा, नदियों और तटीय क्षेत्रों में बाढ़, उष्णकटिबंधीय तूफान, लू, अत्यधिक गर्मी, जंगल की आग और धूल भरी आंधियां शामिल हैं।
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23.4 करोड़ से ज्यादा बच्चे कम से कम तीन जलवायु खतरों का कर रहे सामना
इनमें से 23.4 करोड़ से अधिक बच्चे, जो देश की कुल बाल आबादी का लगभग 55 प्रतिशत हैं, कम से कम तीन जलवायु खतरों का सामना कर रहे हैं। यूनिसेफ का कहना है कि कई बच्चों के लिए ये खतरे अलग-अलग नहीं बल्कि एक साथ मौजूद हैं, जिससे उनके जीवन और विकास पर कई स्तरों पर असर पड़ता है।
रिपोर्ट बताती है कि सूखा और अत्यधिक गर्मी भारत में बच्चों के लिए सबसे व्यापक जलवायु जोखिम हैं। करीब 15.88 करोड़ बच्चे ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहां ये दोनों खतरे मौजूद हैं। वहीं 8.41 करोड़ बच्चे ऐसे इलाकों में रहते हैं जहां उष्णकटिबंधीय तूफान, सूखा और अत्यधिक गर्मी तीनों का खतरा है। इसके अलावा 3.85 करोड़ बच्चे नदियों में बाढ़, सूखा और अत्यधिक गर्मी के संयुक्त जोखिम वाले क्षेत्रों में रहते हैं।
सूखा संभावित क्षेत्रों में 41.02 करोड़ बच्चे
यूनिसेफ के मुताबिक सूखा भारत में बच्चों को प्रभावित करने वाला सबसे व्यापक जलवायु खतरा है। देश के 96 प्रतिशत से अधिक बच्चे, यानी लगभग 41.02 करोड़ बच्चे, ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहां सूखे की आशंका बनी रहती है। सूखे का असर केवल पानी की उपलब्धता तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह खाद्य सुरक्षा, पोषण और परिवारों की आजीविका को भी प्रभावित करता है। इसके परिणामस्वरूप बच्चों में कुपोषण और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ जाता है।