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UP Nikay Chunav: निकाय चुनाव पर यूपी से पहले इन चार राज्यों के लिए आ चुका है सुप्रीम कोर्ट का फैसला, समझें

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: हिमांशु मिश्रा Updated Mon, 02 Jan 2023 04:26 PM IST
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सार

आइए जानते हैं क्या है यूपी नगर निकाय चुनाव से जुड़ा पूरा मामला? सुप्रीम कोर्ट क्या फैसला दे सकता है? यूपी सरकार ने कोर्ट में क्या दलील दी है? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या आदेश दिया है?
 

UP Nagar Nikay Chunav: What decision can the Supreme Court give regarding UP municipal elections?
up nikay chup nikay chunav, यूपी निकाय चुनाव, यूपी नगर निगम चुनावunav, यूपी निकाय चुनाव - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

यूपी नगर निकाय चुनाव को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दिए गए फैसले के खिलाफ यूपी सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि वह इस मामले में चार जनवरी को सुनवाई करेगी। राज्य सरकार ने अपनी याचिका में कहा है कि उच्च न्यायालय पांच दिसंबर की मसौदा अधिसूचना को रद्द नहीं कर सकता है, जो अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों के अलावा अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) के लिए शहरी निकाय चुनावों में सीटों के आरक्षण का प्रावधान करता है। आइए जानते हैं क्या है पूरा मामला? सुप्रीम कोर्ट क्या फैसला दे सकता है? यूपी सरकार ने कोर्ट में क्या दलील दी है? 
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पहले जान लीजिए क्या है मामला 
पांच दिसंबर को यूपी सरकार ने नगर निकाय चुनाव के लिए आरक्षण की अधिसूचना जारी की थी। इसके खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी। कहा गया कि यूपी सरकार ने आरक्षण तय करने में सुप्रीम कोर्ट के ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूले का पालन नहीं किया है।

मंगलवार 27 दिसंबर को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाया था। कोर्ट ने बिना ओबीसी आरक्षण लागू किए ही चुनाव कराने का आदेश दिया है। न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति सौरभ लवानिया की खंडपीठ ने कहा कि बगैर ट्रिपल टेस्ट की औपचारिकता पूरी किए ओबीसी को कोई आरक्षण नहीं दिया जाएगा। 

कोर्ट ने कहा चूंकि नगर पालिकाओं का कार्यकाल या तो खत्म हो चुका है या फिर खत्म होने वाला है, ऐसे में राज्य सरकार/ राज्य निर्वाचन आयोग तत्काल चुनाव अधिसूचित करें। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि ट्रिपल टेस्ट संबंधी आयोग बनने पर ट्रांसजेंडर्स को पिछड़ा वर्ग में शामिल किए जाने के दावे पर गौर किया जाएगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट के इसी आदेश के खिलाफ यूपी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। 
 
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इन चार फैसलों से समझें यूपी नगर निकाय को लेकर क्या आदेश दे सकता है सुप्रीम कोर्ट? 
यूपी की तरह ही चार अन्य राज्यों में भी नगर निकाय चुनाव में आरक्षण का पेंच फंसा था। इन मामलों में भी पहले हाईकोर्ट ने सरकार के खिलाफ ही आदेश दिया था। जैसा कि यूपी में भी हुआ है। इसके बाद सभी राज्यों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। आइए जानते हैं चारों राज्यों में क्या-क्या हुआ था? 
 
 

1. महाराष्ट्र: इस साल की शुरुआत में बिना ट्रिपल टेस्ट लागू करके ओबीसी आरक्षण देने के महाराष्ट्र सरकार के फैसले को खारिज कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने भी बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। तब राज्य सरकार पिछड़ों को आरक्षण देने के लिए अध्यादेश ले आई। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस अध्यादेश को भी खारिज कर दिया। अंत में राज्य सरकार को पिछड़ा आयोग का गठन करना पड़ा और उसकी सिफारिशों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की अनुमति दी। 
 
 

2. बिहार: राज्य सरकार ने पिछड़ा वर्ग आयोग की जगह पहले से काम कर रहे अति पिछड़ा आयोग को ओबीसी आरक्षण की रिपोर्ट तैयार करने का काम सौंप दिया। इस फैसले को यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई कि यह समर्पित पिछड़ा आयोग नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने आयोग की रिपोर्ट के आधार पर जारी चुनाव कार्यक्रम में कोई दखल नहीं दिया। लेकिन, आयोग की वैधता पर जरूर जनवरी में सुनवाई होगी। 
 

 

3. मध्य प्रदेश: यहां भी नगर निकाय का चुनाव अदालत में फंस गया। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बिना ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला लागू किए चुनाव कराने के सरकार के फैसले को खारिज कर दिया था। इसके खिलाफ मध्य प्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई थी। मई, 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य चुनाव आयोग को बिना ओबीसी आरक्षण लागू किए चुनाव कराने का आदेश दे दिया। हालांकि, बाद में सरकार ने राज्य पिछड़ा आयोग का गठन किया और उसकी सिफारिशों के आधार पर ही चुनाव हुए। 
 
 

4. झारखंड: यहां भी राज्य सरकार ने बिना पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किए नगर निकाय चुनाव की घोषणा कर दी थी। इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। तब हेमंत सोरेन सरकार ने कोर्ट से आयोग के गठन के लिए समय मांगा। अब आयोग का गठन हो चुका है। अब इसी की रिपोर्ट के आधार पर यहां स्थानीय निकाय चुनाव होंगे।  

यूपी सरकार की याचिका पर क्या फैसला आ सकता है? 
जिन-जिन राज्यों में ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूले को नजरअंदाज किया गया, उन सभी जगहों पर नगर निकाय चुनाव फंस गया। सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता चंद्र प्रकाश पांडेय कहते हैं कि यूपी में भी महाराष्ट्र, बिहार, मध्य प्रदेश और झारखंड की तरह ही पेंच फंस गया। हाईकोर्ट के आदेश के बाद यूपी सरकार ने ओबीसी आरक्षण का फॉर्मूला तय करने के लिए पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन भी कर दिया है। संभव है कि कोर्ट की तरफ से सरकार को तुरंत अधिसूचना जारी करने के मामले में कुछ राहत मिल जाए। सरकार को ओबीसी आरक्षण लागू करने के लिए कुछ समय दे दिया जाए। इसकी सबसे ज्यादा गुंजाइश दिख रही है। क्योंकि बाकी राज्यों के मामलों में भी कोर्ट ने नियम के अनुसार ही चुनाव कराने को कहा था। 
 

अब जानिए क्या है ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूला, जिसके फेर में फंसा है चुनाव
सुप्रीम कोर्ट ने विकास किशनराव गवली की याचिका पर सुनवाई करते हुए ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूले से नगर निकाय चुनाव कराने का आदेश दिया था। कोर्ट का ये आदेश सभी राज्यों को लागू करना था, लेकिन अब उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में लागू नहीं हो सका है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि निकाय चुनाव में राज्य सरकार ट्रिपल टेस्ट फार्मूले का पालन करने के बाद ही ओबीसी आरक्षण तय कर सकती है। इस ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूले में तीन अहम बातें हैं। 
 

1. स्थानीय निकायों में पिछड़ेपन की प्रकृति की जांच के लिए एक आयोग की स्थापना की जाए। यह आयोग निकायों में पिछड़ेपन की प्रकृति का आंकलन करेगा और सीटों के लिए आरक्षण प्रस्तावित करेगा।
2. आयोग की सिफारिशों के तहत स्थानीय निकायों की ओर से ओबीसी की संख्या का परीक्षण कराया जाए और उसका सत्यापन किया जाए।
3. इसके बाद ओबीसी आरक्षण तय करने से पहले यह ध्यान रखा जाए कि एससी-एसटी और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए कुल आरक्षित सीटें 50 फीसदी से ज्यादा न हों।
 

ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूले पर सरकार का क्या कहना है? 
पांच दिसंबर को यूपी सरकार ने नगर निकाय चुनाव के लिए आरक्षण की अधिसूचना जारी की। आरोप है कि सरकार ने इसमें सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार, ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूले का पालन नहीं किया। मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा तो उत्तर प्रदेश सरकार ने हलफनामा दाखिल कर अपना जवाब दिया। सरकार का कहना है कि उसने सात अप्रैल 2017 को विस्तृत प्रक्रिया के साथ निकाय चुनाव के लिए ओबीसी आबादी की पहचान के लिए दिशा निर्देश जारी किए थे, जो ट्रिपल टेस्ट फार्मूले की पहली शर्त है। इसके बाद ओबीसी के अनुपातिक आरक्षण के नियम को यूपी सरकार सख्ती से पालन कर रही है। 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण न दिए जाने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का भी पालन किया जा रहा है।
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