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Space: अब सेना के कहने पर ऑन-डिमांड लॉन्च होंगे जासूसी उपग्रह, विक्रम-1 की सफलता से बढ़ेगी भारत की ताकत
सार
भारत के पहले निजी ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 की सफलता ने देश की अंतरिक्ष और रक्षा क्षमताओं को नई मजबूती दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में यह तकनीक आपात स्थिति में सैन्य उपग्रहों की त्वरित लॉन्चिंग और स्पेस सुरक्षा को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकती है।
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भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
भारत के पहले निजी ऑर्बिटल रॉकेट विक्रम-1 की सफलता ने देश की सामरिक सुरक्षा की इबारत भी लिख दी है। सतह पर यह भले ही एक वाणिज्यिक स्टार्टअप की कामयाबी दिखे, लेकिन रक्षा गलियारों में इसे अंतरिक्ष युद्ध के लिहाज से गेमचेंजर माना जा रहा है। विक्रम-1 की सफलता ने भारत को वह तकनीकी ताकत दी है, जो भविष्य में रैपिड स्पेस मोबिलिटी यानी आपातकाल में तुरंत रॉकेट दागने की क्षमता के लिए जरूरी थी।
युद्ध में उपयोगिता
तेजी से बदलते युद्ध में जमीन, हवा और पानी के साथ-साथ अंतरिक्ष भी एक डोमेन के तौर पर तेजी से सामने आ रहा है। कहा जाता है कि भविष्य के युद्ध में जिसकी अंतरिक्ष पर पकड़ है, जीत उसी की होगी। किसी बड़े युद्ध की शुरुआत में ही अगर दुश्मन एंटी-सैटेलाइट मिसाइल दागकर किसी सैन्य उपग्रह को निशाना बना दे तो संचार व जीपीएस के अभाव में सेना अंधी हो सकती है। आपात स्थिति में इसरो के भारी-भरकम रॉकेट्स को तैयार करने में लंबा समय लगता है। लेकिन विक्रम-1 जैसे छोटे रॉकेट्स को बेहद कम समय में तैयार कर लॉन्च पैड पर लाया जा सकता है। युद्ध के दौरान यदि कोई सैन्य उपग्रह नष्ट होता है, तो भारत तुरंत दूसरा टैक्टिकल सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजकर अपनी खुफिया निगरानी बहाल रख सकता है।
होगी समय की बचत
आमतौर पर बड़े अंतरिक्ष रॉकेट तरल ईंधन पर निर्भर होते हैं, जिन्हें भरने में समय लगता है। इसके विपरीत विक्रम-1 में ठोस ईंधन तकनीक होती है, जिससे आपात स्थिति में इसको तेजी से लॉन्च किया जा सकता है।
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बड़े देशों की राह पर भारत
अमेरिकी सेना ने स्पेसएक्स जैसी निजी कंपनियों को अपने लॉन्चिंग पारितंत्र में अहम स्थान दिया है। चीन भी अपनी निजी कंपनियों के जरिए सैन्य उपग्रहों का जाल बिछा रहा है। विक्रम-1 के जरिए भारत ने भी इस एलीट क्लब में एंट्री कर ली है। भविष्य में भारत की डिफेंस स्पेस एजेंसी को छोटे जासूसी उपग्रहों के लिए इसरो के भरोसे रहने की जरूरत नहीं होगी। देश के पास अब एक ऐसा निजी अंतरिक्ष उद्योग तैयार हो रहा है, जो सेना की तात्कालिक जरूरतों के हिसाब से छोटे निगरानी उपग्रह तुरंत अंतरिक्ष में भेज सकता है।
आगे की राह क्या?
किसी भी निजी रॉकेट को सैन्य इस्तेमाल की हरी झंडी मिलने से पहले कड़े सैन्य परीक्षणों से गुजरना होता है। सैन्य उपयोग से पहले निजी क्षेत्र को कई सफल व्यावसायिक लॉन्च कर अपनी विश्वसनीयता साबित करनी होगी। इसमें तीन से पांच साल का समय लगेगा। जानकारों का मानना है कि सेना के लिए वास्तविक ऑन डिमांड लॉन्चिंग की स्थिति आने में अभी 2030 तक का वक्त लग सकता है।
क्या है विशेषज्ञों की राय?
पूर्व डीजीएमओ और इंडियन स्पेस एसोसिएशन के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल अनिल कुमार भट्ट ने अमर उजाला से कहा कि विक्रम-1 एक छोटे रॉकेट की श्रेणी में आता है। ऐसे रॉकेट्स को कम समय में लॉन्च किया जा सकेगा। यदि दुश्मन ने सैटेलाइट हटा दी है या आपको किसी खास स्थान पर ज्यादा सैटेलाइट की जरूरत है, तो ऐसे सैटेलाइट्स लॉन्च करने में इस रॉकेट का इस्तेमाल हो सकता है। जनरल भट्ट ने कहा कि पहले यह क्षमता सिर्फ इसरो तक सीमित थी, लेकिन अब हमारे निजी क्षेत्र में भी है। इसका इस्तेमाल अगर सेना भी करना चाहे तो हो सकता है। किसी भी देश की ज्यादा से ज्यादा सैटेलाइट लॉन्च करने की क्षमता, स्पेस कैपेबिलिटी को जाहिर करती है। यदि हमें सैन्य उपग्रह भी लॉन्च करने हैं तो इस क्षमता का इस्तेमाल हो सकता है।
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युद्ध में उपयोगिता
तेजी से बदलते युद्ध में जमीन, हवा और पानी के साथ-साथ अंतरिक्ष भी एक डोमेन के तौर पर तेजी से सामने आ रहा है। कहा जाता है कि भविष्य के युद्ध में जिसकी अंतरिक्ष पर पकड़ है, जीत उसी की होगी। किसी बड़े युद्ध की शुरुआत में ही अगर दुश्मन एंटी-सैटेलाइट मिसाइल दागकर किसी सैन्य उपग्रह को निशाना बना दे तो संचार व जीपीएस के अभाव में सेना अंधी हो सकती है। आपात स्थिति में इसरो के भारी-भरकम रॉकेट्स को तैयार करने में लंबा समय लगता है। लेकिन विक्रम-1 जैसे छोटे रॉकेट्स को बेहद कम समय में तैयार कर लॉन्च पैड पर लाया जा सकता है। युद्ध के दौरान यदि कोई सैन्य उपग्रह नष्ट होता है, तो भारत तुरंत दूसरा टैक्टिकल सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजकर अपनी खुफिया निगरानी बहाल रख सकता है।
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होगी समय की बचत
आमतौर पर बड़े अंतरिक्ष रॉकेट तरल ईंधन पर निर्भर होते हैं, जिन्हें भरने में समय लगता है। इसके विपरीत विक्रम-1 में ठोस ईंधन तकनीक होती है, जिससे आपात स्थिति में इसको तेजी से लॉन्च किया जा सकता है।
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बड़े देशों की राह पर भारत
अमेरिकी सेना ने स्पेसएक्स जैसी निजी कंपनियों को अपने लॉन्चिंग पारितंत्र में अहम स्थान दिया है। चीन भी अपनी निजी कंपनियों के जरिए सैन्य उपग्रहों का जाल बिछा रहा है। विक्रम-1 के जरिए भारत ने भी इस एलीट क्लब में एंट्री कर ली है। भविष्य में भारत की डिफेंस स्पेस एजेंसी को छोटे जासूसी उपग्रहों के लिए इसरो के भरोसे रहने की जरूरत नहीं होगी। देश के पास अब एक ऐसा निजी अंतरिक्ष उद्योग तैयार हो रहा है, जो सेना की तात्कालिक जरूरतों के हिसाब से छोटे निगरानी उपग्रह तुरंत अंतरिक्ष में भेज सकता है।
आगे की राह क्या?
किसी भी निजी रॉकेट को सैन्य इस्तेमाल की हरी झंडी मिलने से पहले कड़े सैन्य परीक्षणों से गुजरना होता है। सैन्य उपयोग से पहले निजी क्षेत्र को कई सफल व्यावसायिक लॉन्च कर अपनी विश्वसनीयता साबित करनी होगी। इसमें तीन से पांच साल का समय लगेगा। जानकारों का मानना है कि सेना के लिए वास्तविक ऑन डिमांड लॉन्चिंग की स्थिति आने में अभी 2030 तक का वक्त लग सकता है।
क्या है विशेषज्ञों की राय?
पूर्व डीजीएमओ और इंडियन स्पेस एसोसिएशन के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल अनिल कुमार भट्ट ने अमर उजाला से कहा कि विक्रम-1 एक छोटे रॉकेट की श्रेणी में आता है। ऐसे रॉकेट्स को कम समय में लॉन्च किया जा सकेगा। यदि दुश्मन ने सैटेलाइट हटा दी है या आपको किसी खास स्थान पर ज्यादा सैटेलाइट की जरूरत है, तो ऐसे सैटेलाइट्स लॉन्च करने में इस रॉकेट का इस्तेमाल हो सकता है। जनरल भट्ट ने कहा कि पहले यह क्षमता सिर्फ इसरो तक सीमित थी, लेकिन अब हमारे निजी क्षेत्र में भी है। इसका इस्तेमाल अगर सेना भी करना चाहे तो हो सकता है। किसी भी देश की ज्यादा से ज्यादा सैटेलाइट लॉन्च करने की क्षमता, स्पेस कैपेबिलिटी को जाहिर करती है। यदि हमें सैन्य उपग्रह भी लॉन्च करने हैं तो इस क्षमता का इस्तेमाल हो सकता है।