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West Bengal: भवानीपुर और नंदीग्राम में हुमायूं की एंट्री, बढ़ा सियासी तापमान; वोटर लिस्ट ने बढ़ाई हलचल
अमर उजाला ब्यूरो, कोलकाता।
Published by: Devesh Tripathi
Updated Tue, 24 Mar 2026 04:05 AM IST
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सार
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एजेयूपी जैसी छोटी पार्टियों का प्रभाव सीट जीतने से ज्यादा किंगमेकर जैसा होता है, वे खुद भले न जीतें, लेकिन 2-5% वोट शेयर के जरिये नतीजे की दिशा बदल सकते हैं। भवानीपुर में यह असर तृणमूल के लिए चुनौती बन सकता है, जबकि नंदीग्राम में यह भाजपा के लिए अप्रत्यक्ष फायदा बन सकता है।
आम जनता उन्नयन पार्टी के नेता हुमायूं कबीर
- फोटो : ANI
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विस्तार
पश्चिम बंगाल में चुनावी तस्वीर अब और जटिल होती जा रही है। एक ओर भवानीपुर और नंदीग्राम जैसी हाईप्रोफाइल सीटों पर हुमायूं कबीर की एंट्री ने मुकाबले को त्रिकोणीय बनाकर वोटों के बिखराव की नई संभावना पैदा कर दी है, तो दूसरी ओर नंदीग्राम में शुभेंदु अधिकारी की सभा के बाद तृणमूल उम्मीदवार पवित्र कर के घर के बाहर ‘चोर-चोर’ के नारे लगने से सियासी तापमान बढ़ गया है।
इसी बीच मतदाता सूची संशोधन (एसआईआर) की सप्लीमेंट्री लिस्ट जारी होने से पहले लाखों नामों के जुड़ने-कटने को लेकर चुनाव आयोग अलर्ट मोड में है। ऐसे में साफ है कि इस बार मुकाबला सिर्फ राजनीतिक दलों के बीच नहीं, बल्कि जमीनी तनाव, वोटों के सूक्ष्म गणित और प्रशासनिक सतर्कता के बीच तय होगा।
हाईवोल्टेज सीटें हैं भवानीपुर और नंदीग्राम
पश्चिम बंगाल की राजनीति में हाईवोल्टेज सीटें भवानीपुर और नंदीग्राम पहले से ही तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधी लड़ाई का केंद्र रही हैं, लेकिन हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी (एजेयूपी) ने इन दोनों सीटों पर उम्मीदवार उतारकर मुकाबले को त्रिकोणीय बनाते हुए समीकरणों को और जटिल कर दिया है। भवानीपुर में पूनम बेगम और नंदीग्राम में शाहिदुल हक को मैदान में उतारकर हुमायूं ने संकेत दिया है कि वह सीमित ही सही, लेकिन निर्णायक हस्तक्षेप की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
भवानीपुर में मुस्लिम और अल्पसंख्यकों का वोट निर्णायक
भवानीपुर में जहां ममता बनर्जी की प्रतिष्ठा दांव पर रहती है, वहां मुकाबला परंपरागत रूप से ध्रुवीकृत रहा है। इस सीट पर मुस्लिम और अल्पसंख्यक वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं, जो अब तक बड़े पैमाने पर तृणमूल के साथ रहे हैं। ऐसे में ओजेयूपी की एंट्री इस वोट बैंक में आंशिक सेंध लगा सकती है। हालांकि, यह सेंध कितनी गहरी होगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि हुमायूं कबीर का प्रभाव स्थानीय स्तर पर कितना संगठित है। यदि उनका असर सीमित रहता है, तो तृणमूल को बड़ा नुकसान नहीं होगा, लेकिन मामूली वोट कटाव भी करीबी मुकाबले में फर्क डाल सकता है, जिसका अप्रत्यक्ष फायदा भाजपा को मिल सकता है।
नंदीग्राम में मुकाबला बहुकोणीय
दूसरी ओर नंदीग्राम में, जहां शुभेंदु अधिकारी और ममता बनर्जी के बीच सीधी टक्कर की राजनीतिक विरासत रही है, वहां मुकाबला पहले से बहुकोणीय होता जा रहा है। वाम दल और आईएसएफ की मौजूदगी के बीच अब एजेयूपी की एंट्री ने विपक्षी वोटों के और बिखराव की संभावना बढ़ा दी है। नंदीग्राम में मुस्लिम और ग्रामीण वोट बैंक का एक हिस्सा पहले ही विभाजित है, ऐसे में हुमायूं का उम्मीदवार इस बिखराव को और बढ़ा सकता है, जिससे सीधा लाभ भाजपा को मिल सकता है, खासकर तब जब तृणमूल विरोधी वोट एकजुट न हों।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एजेयूपी जैसी छोटी पार्टियों का प्रभाव सीट जीतने से ज्यादा किंगमेकर जैसा होता है, वे खुद भले न जीतें, लेकिन 2-5% वोट शेयर के जरिये नतीजे की दिशा बदल सकते हैं। भवानीपुर में यह असर तृणमूल के लिए चुनौती बन सकता है, जबकि नंदीग्राम में यह भाजपा के लिए अप्रत्यक्ष फायदा बन सकता है।
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इसी बीच मतदाता सूची संशोधन (एसआईआर) की सप्लीमेंट्री लिस्ट जारी होने से पहले लाखों नामों के जुड़ने-कटने को लेकर चुनाव आयोग अलर्ट मोड में है। ऐसे में साफ है कि इस बार मुकाबला सिर्फ राजनीतिक दलों के बीच नहीं, बल्कि जमीनी तनाव, वोटों के सूक्ष्म गणित और प्रशासनिक सतर्कता के बीच तय होगा।
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हाईवोल्टेज सीटें हैं भवानीपुर और नंदीग्राम
पश्चिम बंगाल की राजनीति में हाईवोल्टेज सीटें भवानीपुर और नंदीग्राम पहले से ही तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधी लड़ाई का केंद्र रही हैं, लेकिन हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी (एजेयूपी) ने इन दोनों सीटों पर उम्मीदवार उतारकर मुकाबले को त्रिकोणीय बनाते हुए समीकरणों को और जटिल कर दिया है। भवानीपुर में पूनम बेगम और नंदीग्राम में शाहिदुल हक को मैदान में उतारकर हुमायूं ने संकेत दिया है कि वह सीमित ही सही, लेकिन निर्णायक हस्तक्षेप की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
भवानीपुर में मुस्लिम और अल्पसंख्यकों का वोट निर्णायक
भवानीपुर में जहां ममता बनर्जी की प्रतिष्ठा दांव पर रहती है, वहां मुकाबला परंपरागत रूप से ध्रुवीकृत रहा है। इस सीट पर मुस्लिम और अल्पसंख्यक वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं, जो अब तक बड़े पैमाने पर तृणमूल के साथ रहे हैं। ऐसे में ओजेयूपी की एंट्री इस वोट बैंक में आंशिक सेंध लगा सकती है। हालांकि, यह सेंध कितनी गहरी होगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि हुमायूं कबीर का प्रभाव स्थानीय स्तर पर कितना संगठित है। यदि उनका असर सीमित रहता है, तो तृणमूल को बड़ा नुकसान नहीं होगा, लेकिन मामूली वोट कटाव भी करीबी मुकाबले में फर्क डाल सकता है, जिसका अप्रत्यक्ष फायदा भाजपा को मिल सकता है।
नंदीग्राम में मुकाबला बहुकोणीय
दूसरी ओर नंदीग्राम में, जहां शुभेंदु अधिकारी और ममता बनर्जी के बीच सीधी टक्कर की राजनीतिक विरासत रही है, वहां मुकाबला पहले से बहुकोणीय होता जा रहा है। वाम दल और आईएसएफ की मौजूदगी के बीच अब एजेयूपी की एंट्री ने विपक्षी वोटों के और बिखराव की संभावना बढ़ा दी है। नंदीग्राम में मुस्लिम और ग्रामीण वोट बैंक का एक हिस्सा पहले ही विभाजित है, ऐसे में हुमायूं का उम्मीदवार इस बिखराव को और बढ़ा सकता है, जिससे सीधा लाभ भाजपा को मिल सकता है, खासकर तब जब तृणमूल विरोधी वोट एकजुट न हों।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एजेयूपी जैसी छोटी पार्टियों का प्रभाव सीट जीतने से ज्यादा किंगमेकर जैसा होता है, वे खुद भले न जीतें, लेकिन 2-5% वोट शेयर के जरिये नतीजे की दिशा बदल सकते हैं। भवानीपुर में यह असर तृणमूल के लिए चुनौती बन सकता है, जबकि नंदीग्राम में यह भाजपा के लिए अप्रत्यक्ष फायदा बन सकता है।
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