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West Bengal: बंगाल में चुनाव की आहट के साथ फिर 'सेटिंग' की चर्चा, जानिए सत्ता पाने में क्यों है इतना कारगर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोलकाता
Published by: नितिन गौतम
Updated Thu, 19 Feb 2026 02:29 PM IST
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सार
बंगाल में विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है। बंगाल की राजनीति में अक्सर प्रतिद्वंदी दलों के बीच गुप्त समझौते का मुद्दा बनता और चुनाव पर इसका व्यापक असर भी होता है। तो आइए जानते हैं कि बंगाल के चुनाव में सेटिंग शब्द क्यों इतना चर्चा में रहता है।
ममता बनर्जी, सीएम, पश्चिम बंगाल
- फोटो : ANI
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विस्तार
पश्चिम बंगाल की राजनीति में 'सेटिंग' ऐसा शब्द है, जो बहुत सुनने को मिलता है और यह शब्द रहस्य और आरोप—दोनों का पर्याय बन चुका है। 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले यह शब्द एक बार फिर सियासी बहस के केंद्र में लौट आया है। प्रतिद्वंद्वी दलों के बीच गुप्त समझौते (सेटिंग) के आरोप लग रहे हैं। राज्य की सत्ताधारी टीएमसी, मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा और वाम मोर्चा सभी एक दूसरे पर निशाना साध रहे हैं।
बंगाल की राजनीति में क्या है ये 'सेटिंग' शब्द
बंगाल की राजनीति में अक्सर सीपीमूल (सीपीआईएम और तृणमूल), बिजेमूल (भाजपा और तृणमूल) और राम-बाम (भाजपा और वाम मोर्चा) जैसे शब्द सुनाई देते हैं। टीएमसी लंबे समय से 'राम-बाम की थ्योरी पेश करती रही है, जिसके अनुसार 2019 के बाद वाम दलों के वोट धीरे-धीरे भाजपा की ओर स्थानांतरित हुए, जिससे भाजपा को मजबूती मिली। वहीं सीपीआई(एम) दोनों प्रमुख दलों पर एक-दूसरे के अस्तित्व से लाभ उठाने का आरोप लगाती है। भाजपा नेताओं का कहना है कि जब भी चुनावी समीकरण बनते हैं, टीएमसी और वाम दलों के बीच 'रणनीतिक सहयोग' दिखता है। चुनाव नजदीक आते ही यह बयानबाजी और तीखी हो गई है। शासन और विकास के मुद्दों से ध्यान हटकर कथित गुप्त गठबंधनों की चर्चा प्रमुख हो गई है।
आरोप-प्रत्यारोप तेज
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बंगाल की राजनीति में क्या है ये 'सेटिंग' शब्द
बंगाल की राजनीति में अक्सर सीपीमूल (सीपीआईएम और तृणमूल), बिजेमूल (भाजपा और तृणमूल) और राम-बाम (भाजपा और वाम मोर्चा) जैसे शब्द सुनाई देते हैं। टीएमसी लंबे समय से 'राम-बाम की थ्योरी पेश करती रही है, जिसके अनुसार 2019 के बाद वाम दलों के वोट धीरे-धीरे भाजपा की ओर स्थानांतरित हुए, जिससे भाजपा को मजबूती मिली। वहीं सीपीआई(एम) दोनों प्रमुख दलों पर एक-दूसरे के अस्तित्व से लाभ उठाने का आरोप लगाती है। भाजपा नेताओं का कहना है कि जब भी चुनावी समीकरण बनते हैं, टीएमसी और वाम दलों के बीच 'रणनीतिक सहयोग' दिखता है। चुनाव नजदीक आते ही यह बयानबाजी और तीखी हो गई है। शासन और विकास के मुद्दों से ध्यान हटकर कथित गुप्त गठबंधनों की चर्चा प्रमुख हो गई है।
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आरोप-प्रत्यारोप तेज
- टीएमसी नेता कुनाल घोष ने 'सेटिंग' (गुप्त समझौते) के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि जो राजनीतिक रूप से चुनौती नहीं दे पाते, वही ऐसी बातें गढ़ते हैं।
- राज्य भाजपा अध्यक्ष सामिक भट्टाचार्य का कहना है कि कई महत्वपूर्ण सीटों पर विपक्षी वोटों का बिखराव सत्तारूढ़ दल को फायदा पहुंचाता है। उनका आरोप है कि वाम दल और कांग्रेस अप्रत्यक्ष रूप से टीएमसी को लाभ पहुंचाते रहे हैं।
- सीपीआईएम नेता सुजन चक्रवर्ती ने भाजपा और टीएमसी के बीच 'डर की राजनीति' करने का आरोप लगाया। कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी का कहना है कि जब राजनीति व्यक्तिकेंद्रित हो जाती है, तो वैचारिक बहस की जगह अफवाहें ले लेती हैं।
- निलंबित टीएमसी विधायक हुमायूं कबीर की नई पार्टी 'जनता उन्नयन पार्टी' ने भी नई चर्चाओं को जन्म दिया है। इसने इन आशंकाओं को हवा दी है कि नए दल वोट समीकरण बदलने के लिए खड़े किए जा रहे हैं।
- टीएमसी नेताओं का आरोप है कि उभरते छोटे दल भाजपा को फायदा पहुंचाने के लिए वोट काटने का काम कर रहे हैं। इसी तरह आईएसएफ और एआईएमआईएम पर भी ऐसे आरोप लगाए गए हैं। हालांकि इन दलों ने आरोपों को खारिज किया है।
- विश्लेषकों के अनुसार, बंगाल में 'सेटिंग' की राजनीति नई नहीं है। 1967 में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के गठन और संयुक्त मोर्चा के दौरान भी गुप्त समझौतों के आरोप लगे थे।
- वाम मोर्चा शासनकाल में टीएमसी ने कांग्रेस और सीपीआईएम की नजदीकी के आरोप लगाए थे।
- राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे आरोपों को ठोस सबूत की जरूरत नहीं होती। जांच में देरी, केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई या राजनीतिक चुप्पी—सब अटकलों को जन्म देती हैं।
- बंगाल में 'सेटिंग' अब महज चुनावी स्टंट नहीं है, बल्कि चुनावी हकीकत बन चुकी है, जिसे सभी दल सार्वजनिक रूप से नकारते हैं, लेकिन मतदाता उत्सुकता से सुनते हैं।