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TMC: ममता के नाम पर बागियों का शक्ति प्रदर्शन, 58 विधायकों ने ऋतुब्रत को विपक्ष का नेता बनाने की मांग की
अमर उजाला ब्यूरो, कोलकाता
Published by: नितिन गौतम
Updated Wed, 03 Jun 2026 01:44 PM IST
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सार
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस टूट के कगार पर है। 58 विधायकों ने विधानसभा स्पीकर से मांग की है कि ऋतुब्रत बनर्जी को नेता विपक्ष के तौर पर मान्यता दी जाए। बागी विधायकों में टीएमसी के कई बड़े नाम भी शामिल हैं।
ममता बनर्जी और ऋतुब्रत बनर्जी
- फोटो : पीटीआई/ फेसबुक (ऋतुब्रत बनर्जी)
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विस्तार
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी सियासी उठा-पटक के बीच पार्टी के 58 बागी विधायकों ने बुधवार को विधानसभा अध्यक्ष रथीन बोस को पत्र सौंपकर ऋतुब्रत बनर्जी को विधानसभा में विपक्ष का नेता मान्यता देने
की मांग की। दिलचस्प यह है कि इस शक्ति प्रदर्शन के बावजूद बागी विधायकों ने पत्र में ममता बनर्जी को ही पार्टी की नेता और सभानेत्री बताया है, जिससे संकेत मिला है कि उनका विरोध सीधे तौर पर अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को लेकर है।
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक बागी खेमे की ओर से दिए गए पत्र में संदीपन साहा, जावेद खान और शिउली साहा को उपनेता तथा अखरुज्जमान को मुख्य सचेतक बनाने का प्रस्ताव भी रखा गया है। विधानसभा सूत्रों के अनुसार स्पीकर ने पत्र स्वीकार कर लिया है, हालांकि अंतिम निर्णय लेने से पहले सभी हस्ताक्षरों का सत्यापन कराया जाएगा। माना जा रहा है कि इस मुद्दे पर जल्द फैसला हो सकता है।
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कैसे हुई विवाद की शुरुआत?
तृणमूल में मौजूदा संकट की शुरुआत विपक्ष के नेता पद के लिए वरिष्ठ विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय के समर्थन में भेजे गए एक पत्र से हुई थी। आरोप लगा कि उस पत्र में कई विधायकों के हस्ताक्षर जाली थे। मामले में एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस और सीआईडी जांच कर रही है तथा कई विधायकों से पूछताछ की जा चुकी है।
इसी विवाद के बाद ऋतुब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था। इसके बाद कई विधायक खुलकर पार्टी नेतृत्व के खिलाफ सामने आए और बागी खेमे का आकार लगातार बढ़ता गया। इसके साथ ही तृणमूल में संभावित विभाजन और नए राजनीतिक समीकरणों को लेकर अटकलें भी तेज हो गई हैं। बागी विधायक अरुणाभ सेन ने कहा, 'मैं आज भी ममता बनर्जी को अपना नेता मानता हूं, लेकिन अभिषेक बनर्जी को कभी नेता नहीं माना और न ही मानूंगा। हमने विधानसभा में विपक्ष का नेता चुनकर स्पीकर को पत्र सौंप दिया है।'
अब निगाहें विधानसभा अध्यक्ष के फैसले पर टिकी हैं। यदि 58 विधायकों के समर्थन का दावा वैध पाया जाता है तो पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल के भीतर शक्ति संतुलन को लेकर बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
बागी विधायकों में कई बड़े नाम शामिल
बुधवार को ऋतब्रत बंद्योपाध्याय 58 विधायकों के समर्थन पत्र के साथ विधानसभा पहुंचे। इसके बाद से 'नई तृणमूल' के गठन और विधानसभा में नए शक्ति संतुलन को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। हालांकि इन दावों की अभी तक आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। रिपोर्टों में जिन नेताओं के नाम संभावित नए गुट के साथ जोड़े जा रहे हैं, उनमें पूर्व मंत्री और हावड़ा मध्य के विधायक अरूप राय, डोमजूर के तापस माइती, महेशतला के शुभाशीष दास, कुलपी की बर्णाली धारा, केशपुर की शिउली साहा, सामसेरगंज के मोहम्मद नूर आलम, हरिहरपाड़ा के नियामत शेख, लालगोला के अब्दुल अजीज, भगवानगोला के रियात हुसैन, सूती के इमानी विश्वास, रघुनाथगंज के आक्रुज्जामान, खड़गपुर के दिनेन राय और सुजापुर की सबीना यासमीन प्रमुख हैं। इसके अलावा समर मुखोपाध्याय, रथीन घोष, संदीपन साहा, चंद्रनाथ सिन्हा और समीर जना समेत कई अन्य नेताओं के नाम भी चर्चा में हैं।
राजनीतिक हलकों में दावा किया जा रहा है कि दो-तिहाई से अधिक विधायकों के समर्थन के साथ एक अलग गुट बनाने की तैयारी चल रही है। दिलचस्प बात यह है कि नए गुट से जुड़े बताए जा रहे नेताओं के बारे में कहा जा रहा है कि वे अब भी ममता बनर्जी को अपना नेता मानते हैं, लेकिन पार्टी के मौजूदा संगठनात्मक ढांचे और निर्णय प्रक्रिया को लेकर असंतोष रखते हैं।
संगठन के भीतर शक्ति संतुलन की लड़ाई
इस वजह से इसे सीधे नेतृत्व परिवर्तन की लड़ाई के बजाय संगठन के भीतर शक्ति संतुलन की लड़ाई के रूप में भी देखा जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस ने अब तक इन दावों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। वहीं नए गुट की ओर से भी किसी औपचारिक घोषणा, नेतृत्व संरचना या राजनीतिक रणनीति का खुलासा नहीं किया गया है। ऐसे में बंगाल की राजनीति में जारी घटनाक्रम पर पूरे देश की नजरें टिकी हैं, क्योंकि इसका असर न केवल राज्य की सत्ता बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी राजनीति की दिशा पर भी पड़ सकता है।
की मांग की। दिलचस्प यह है कि इस शक्ति प्रदर्शन के बावजूद बागी विधायकों ने पत्र में ममता बनर्जी को ही पार्टी की नेता और सभानेत्री बताया है, जिससे संकेत मिला है कि उनका विरोध सीधे तौर पर अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को लेकर है।
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सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक बागी खेमे की ओर से दिए गए पत्र में संदीपन साहा, जावेद खान और शिउली साहा को उपनेता तथा अखरुज्जमान को मुख्य सचेतक बनाने का प्रस्ताव भी रखा गया है। विधानसभा सूत्रों के अनुसार स्पीकर ने पत्र स्वीकार कर लिया है, हालांकि अंतिम निर्णय लेने से पहले सभी हस्ताक्षरों का सत्यापन कराया जाएगा। माना जा रहा है कि इस मुद्दे पर जल्द फैसला हो सकता है।
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कैसे हुई विवाद की शुरुआत?
तृणमूल में मौजूदा संकट की शुरुआत विपक्ष के नेता पद के लिए वरिष्ठ विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय के समर्थन में भेजे गए एक पत्र से हुई थी। आरोप लगा कि उस पत्र में कई विधायकों के हस्ताक्षर जाली थे। मामले में एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस और सीआईडी जांच कर रही है तथा कई विधायकों से पूछताछ की जा चुकी है।
इसी विवाद के बाद ऋतुब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था। इसके बाद कई विधायक खुलकर पार्टी नेतृत्व के खिलाफ सामने आए और बागी खेमे का आकार लगातार बढ़ता गया। इसके साथ ही तृणमूल में संभावित विभाजन और नए राजनीतिक समीकरणों को लेकर अटकलें भी तेज हो गई हैं। बागी विधायक अरुणाभ सेन ने कहा, 'मैं आज भी ममता बनर्जी को अपना नेता मानता हूं, लेकिन अभिषेक बनर्जी को कभी नेता नहीं माना और न ही मानूंगा। हमने विधानसभा में विपक्ष का नेता चुनकर स्पीकर को पत्र सौंप दिया है।'
अब निगाहें विधानसभा अध्यक्ष के फैसले पर टिकी हैं। यदि 58 विधायकों के समर्थन का दावा वैध पाया जाता है तो पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल के भीतर शक्ति संतुलन को लेकर बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
बागी विधायकों में कई बड़े नाम शामिल
बुधवार को ऋतब्रत बंद्योपाध्याय 58 विधायकों के समर्थन पत्र के साथ विधानसभा पहुंचे। इसके बाद से 'नई तृणमूल' के गठन और विधानसभा में नए शक्ति संतुलन को लेकर अटकलें तेज हो गई हैं। हालांकि इन दावों की अभी तक आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। रिपोर्टों में जिन नेताओं के नाम संभावित नए गुट के साथ जोड़े जा रहे हैं, उनमें पूर्व मंत्री और हावड़ा मध्य के विधायक अरूप राय, डोमजूर के तापस माइती, महेशतला के शुभाशीष दास, कुलपी की बर्णाली धारा, केशपुर की शिउली साहा, सामसेरगंज के मोहम्मद नूर आलम, हरिहरपाड़ा के नियामत शेख, लालगोला के अब्दुल अजीज, भगवानगोला के रियात हुसैन, सूती के इमानी विश्वास, रघुनाथगंज के आक्रुज्जामान, खड़गपुर के दिनेन राय और सुजापुर की सबीना यासमीन प्रमुख हैं। इसके अलावा समर मुखोपाध्याय, रथीन घोष, संदीपन साहा, चंद्रनाथ सिन्हा और समीर जना समेत कई अन्य नेताओं के नाम भी चर्चा में हैं।
राजनीतिक हलकों में दावा किया जा रहा है कि दो-तिहाई से अधिक विधायकों के समर्थन के साथ एक अलग गुट बनाने की तैयारी चल रही है। दिलचस्प बात यह है कि नए गुट से जुड़े बताए जा रहे नेताओं के बारे में कहा जा रहा है कि वे अब भी ममता बनर्जी को अपना नेता मानते हैं, लेकिन पार्टी के मौजूदा संगठनात्मक ढांचे और निर्णय प्रक्रिया को लेकर असंतोष रखते हैं।
संगठन के भीतर शक्ति संतुलन की लड़ाई
इस वजह से इसे सीधे नेतृत्व परिवर्तन की लड़ाई के बजाय संगठन के भीतर शक्ति संतुलन की लड़ाई के रूप में भी देखा जा रहा है। तृणमूल कांग्रेस ने अब तक इन दावों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। वहीं नए गुट की ओर से भी किसी औपचारिक घोषणा, नेतृत्व संरचना या राजनीतिक रणनीति का खुलासा नहीं किया गया है। ऐसे में बंगाल की राजनीति में जारी घटनाक्रम पर पूरे देश की नजरें टिकी हैं, क्योंकि इसका असर न केवल राज्य की सत्ता बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी राजनीति की दिशा पर भी पड़ सकता है।