Explainer: सरोगेट विज्ञापन क्या है, इलायची की आड़ में तंबाकू बेचने का ये कैसा खेल, क्यों फंसे ये अभिनेता?
महाराष्ट्र एफडीए की ओर से विमल इलायची के विज्ञापन को लेकर तीन अभिनेताओं को नोटिस दिया गया है। इस विवाद ने एक बार फिर सरोगेट विज्ञापन पर बहस छेड़ दी है। मामला सिर्फ किसी एक ब्रांड या विज्ञापन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सवाल भी अहम है कि प्रतिबंधित उत्पादों की पहचान दूसरे उत्पादों के जरिए किस तरह उपभोक्ताओं तक पहुंचती है? आइए विस्तार से जानते हैं।
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विस्तार
महाराष्ट्र में पान मसाला और तंबाकू से जुड़े एक विज्ञापन को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन यानी एफडीए ने अभिनेता शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ को एक इलायची के विज्ञापन के मामले में नोटिस भेजकर जवाब मांगा है। एफडीए को यह सरोगेट विज्ञापन का मामला दिखाई दे रहा है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या है पूरा मामला? आखिर सरोगेट विज्ञापन क्या होता है? इसे पहचानने के लिए किन बातों को देखा जाता है? भारत में ऐसे विज्ञापनों को लेकर क्या नियम हैं? क्या पैकेजिंग पर भी ऐसे नियम हैं? नियम तोड़ने पर क्या कार्रवाई हो सकती है? खाद्य सुरक्षा नियम क्या है? सरोगेट विज्ञापन पर अदालतों का रुख क्या रहा है? अंतरराष्ट्रीय कानून क्या कहता है? तंबाकू के अप्रत्यक्ष प्रचार पर डब्लूएचओ के नियम क्या हैं? तंबाकू कैसे खतरनाक है? आइये जानते हैं...
क्या है पूरा मामला?
एफडीए ने तीनों अभिनेता के विमल इलायची के विज्ञापन को लेकर कारण बताओ नोटिस जारी किया है। एफडीए का कहना है कि पहली नजर में यह विज्ञापन प्रतिबंधित पान मसाला और तंबाकू उत्पादों के अप्रत्यक्ष या सरोगेट प्रचार जैसा दिखाई देता है। तीनों कलाकार इस विज्ञापन में ब्रांड एंडोर्सर के तौर पर शामिल हैं।
यह मामला महाराष्ट्र में इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि राज्य में तंबाकू या निकोटीन वाले गुटखा और पान मसाला पर प्रतिबंध है। एफडीए के अनुसार यह प्रतिबंध 2012 से लागू है और इसे समय-समय पर बढ़ाया जाता रहा है। मौजूदा प्रतिबंध 13 जुलाई 2026 से एक और साल के लिए बढ़ाया गया है। एफडीए के मुताबिक, विज्ञापन में विमल इलायची नाम, उसकी प्रस्तुति, संवाद और बाजार में ब्रांड की पहचान ऐसे सवाल खड़े करते हैं कि क्या इसके जरिए उस विमल ब्रांड का प्रचार हो रहा है, जो पान मसाला से भी जुड़ा है। एजेंसी ने इसे लेकर संबंधित कलाकारों से जवाब और दस्तावेज मांगे हैं। साथ ही कलाकारों से यह भी बताने को कहा है कि विज्ञापन में शामिल होने से पहले उन्होंने या उनकी एजेंसियों ने क्या ड्यू डिलिजेंस की थी। इसके लिए एंडोर्समेंट कॉन्ट्रैक्ट, कैंपेन ब्रीफ, पारिश्रमिक की जानकारी और विज्ञापन से जुड़े अन्य दस्तावेज मांगे गए हैं।
बता दें कि 2022 में अक्षय कुमार को विमल इलायची के विज्ञापन में नजर आने के बाद सोशल मीडिया पर आलोचना का सामना करना पड़ा था। इसके बाद उन्होंने माफी मांगते हुए विज्ञापन से अलग होने और अपनी पूरी एंडोर्समेंट फीस अच्छे काम के लिए दान करने की बात कही थी।
विमल को लेकर पहले भी उठ चुका है सवाल
2018 में विमल इलायची के विज्ञापन को लेकर स्वास्थ्य अधिकारियों ने आपत्ति जताते हुए कारण बताओ नोटिस जारी किया था। आरोप था कि तंबाकू उत्पादों से जुड़े विमल ब्रांड का इस्तेमाल इलायची के विज्ञापन के जरिए अप्रत्यक्ष प्रचार के लिए किया जा रहा है। मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा और 2024 में अदालत ने कहा कि यह सरोगेट विज्ञापन है या नहीं, इसका फैसला सबूतों के आधार पर किया जाना चाहिए।
सरोगेट विज्ञापन आखिर होता क्या है?
सरोगेट विज्ञापन यानी ऐसा अप्रत्यक्ष विज्ञापन, जिसमें किसी ऐसे उत्पाद या सेवा का प्रचार दूसरे उत्पाद या सेवा के नाम पर किया जाता है, जिसका सीधे विज्ञापन करना कानून के तहत प्रतिबंधित या सीमित है। सरल भाषा में समझें तो किसी कंपनी का ऐसा उत्पाद जिसका विज्ञापन नहीं किया जा सकता, उसके ब्रांड नाम, लोगो, रंग, डिजाइन या पहचान का इस्तेमाल किसी दूसरे उत्पाद के विज्ञापन में किया जाए, तो वह सरोगेट विज्ञापन के दायरे में आ सकता है।
उदाहरण के तौर पर अगर किसी तंबाकू या शराब ब्रांड का सीधे विज्ञापन नहीं किया जा सकता, लेकिन उसी नाम से इलायची, सोडा, माउथ फ्रेशनर या किसी दूसरे उत्पाद का विज्ञापन किया जाता है और विज्ञापन देखने वाले व्यक्ति के दिमाग में असल में प्रतिबंधित उत्पाद या उसकी ब्रांड पहचान आती है, तो नियामक यह जांच सकता है कि यह वास्तविक ब्रांड विस्तार है या सरोगेट विज्ञापन।
सिर्फ ब्रांड नाम इस्तेमाल करना ही सरोगेट विज्ञापन नहीं
यहां एक जरूरी अंतर समझना होगा। किसी शराब या तंबाकू ब्रांड के नाम से दूसरा उत्पाद बाजार में मौजूद है, तो केवल नाम समान होने से वह अपने आप सरोगेट विज्ञापन नहीं बन जाता। अगर दूसरा उत्पाद वास्तव में बाजार में उपलब्ध है, उसका वास्तविक कारोबार है और विज्ञापन उसके वास्तविक उत्पाद की बिक्री के लिए है, तो उसे वास्तविक ब्रांड विस्तार माना जा सकता है। इसलिए किसी मामले में यह देखना जरूरी होता है कि विज्ञापन किया जा रहा दूसरा उत्पाद वास्तव में मौजूद है या सिर्फ प्रतिबंधित उत्पाद के विज्ञापन के लिए नाम का इस्तेमाल किया जा रहा है।
तंबाकू के विज्ञापन पर भारत में क्या कानून है?
- भारत में तंबाकू के विज्ञापन को मुख्य रूप से सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पाद अधिनियम, 2003 यानी सीओटीपीए और 2004 के संबंधित नियमों के तहत नियंत्रित किया जाता है।
- सीओटीपीए के तहत तंबाकू उत्पादों के विज्ञापन पर व्यापक रोक है और यह रोक किसी एक माध्यम तक सीमित नहीं है। यानी टीवी, प्रिंट, डिजिटल या दूसरे माध्यमों में तंबाकू के विज्ञापन पर नियम लागू होते हैं।
- इस दायरे में सिगरेट, सिगार, बीड़ी, पाइप तंबाकू, हुक्का तंबाकू, चबाने वाला तंबाकू, तंबाकू वाला पान मसाला और गुटखा जैसे उत्पाद आते हैं।
सिर्फ कंपनी ही नहीं, विज्ञापन में शामिल लोग भी दायरे में
तंबाकू विज्ञापन के नियम सिर्फ निर्माता या वितरक पर लागू नहीं होते। विज्ञापन का माध्यम नियंत्रित करने वाले लोग और विज्ञापन में हिस्सा लेने वाले कलाकार भी इसके दायरे में आ सकते हैं। यानी किसी विज्ञापन में अभिनेता या सेलिब्रिटी की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है। यही वजह है कि मौजूदा मामले में विज्ञापन में नजर आ रहे तीनों अभिनेताओं से स्पष्टीकरण मांगा गया है।
सरोगेट विज्ञापन पर अदालतों का रुख क्या रहा है?
भारत में अदालतों और उपभोक्ता मंचों के सामने भी ऐसे मामले आ चुके हैं।
लंदन पिल्सनर सोडा मामला
2007 में लंदन पिल्सनर सोडा के विज्ञापन को लेकर विवाद हुआ। आरोप था कि यह वास्तव में उसी नाम के व्हिस्की ब्रांड का अप्रत्यक्ष विज्ञापन था। मामले में यह भी सामने आया कि लंदन पिल्सनर सोडा बाजार में उपलब्ध नहीं था और विज्ञापन में इस्तेमाल किया गया दावा वास्तव में व्हिस्की ब्रांड पर लागू होता था, सोडा पर नहीं। राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने इसे सरोगेट विज्ञापन माना और अनुचित व्यापार व्यवहार बताया।
टीवी नेटवर्क मामला
2023 में दिल्ली हाईकोर्ट के सामने एक मामले में शराब ब्रांड के लोगो और शराब की बोतल का इस्तेमाल सीडी के विज्ञापन में किया गया था। अदालत ने इसे सरोगेट विज्ञापन माना और चैनल को स्क्रीन पर माफी का संदेश चलाने का निर्देश दिया।
क्या सरोगेट विज्ञापन सिर्फ शराब और तंबाकू तक सीमित है?
नहीं। अलग-अलग कानूनों और नियमों के तहत कई ऐसे उत्पाद और सेवाएं हैं जिनके विज्ञापन पर प्रतिबंध या कड़े नियम लागू होते हैं। इनमें जुआ, सट्टा, लॉटरी, ऑनलाइन पैसे वाले खेल, हथियार और गोला-बारूद, भ्रूण के लिंग की जांच, कुछ चिकित्सा सेवाएं और अन्य नियंत्रित क्षेत्र शामिल हैं। ऑनलाइन सट्टेबाजी के मामले में भी केंद्र सरकार ने डिजिटल प्लेटफॉर्म को ऐसे विज्ञापनों और उनके सरोगेट विज्ञापनों से बचने की सलाह दी है। अक्तूबर 2022 में इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने ऑनलाइन बेटिंग प्लेटफॉर्म और उनके सरोगेट विज्ञापनों को लेकर एडवाइजरी जारी की थी। मंत्रालय ने ऑफशोर ऑनलाइन बेटिंग/गैंबलिंग के सरोगेट विज्ञापनों में सेलिब्रिटी और इन्फ्लुएंसर की भूमिका को लेकर भी 2026 में एडवाइजरी जारी की।
तंबाकू के अप्रत्यक्ष प्रचार पर डब्लूएचओ के नियम क्या हैं?
दुनिया भर में तंबाकू के विज्ञापन और उसके अप्रत्यक्ष प्रचार को लेकर नियम बनाए गए हैं। इसी दिशा में विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्यूएचओ के फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन टोबैको कंट्रोल (WHO FCTC) में आर्टिकल 13 तंबाकू के विज्ञापन, प्रचार और प्रायोजन पर रोक से जुड़ा है।
इसके तहत सिर्फ तंबाकू उत्पाद का सीधे विज्ञापन करना ही चिंता का विषय नहीं है। ऐसे प्रचार या व्यावसायिक गतिविधियों पर भी रोक की बात कही गई है, जिनका उद्देश्य या प्रभाव सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से तंबाकू उत्पाद या उसके इस्तेमाल को बढ़ावा देना हो।
यानी अगर किसी प्रतिबंधित तंबाकू ब्रांड को किसी दूसरे उत्पाद, ब्रांड या माध्यम के जरिए लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की जाती है, तो उसे भी अप्रत्यक्ष प्रचार के तौर पर देखा जा सकता है। ब्रांड स्ट्रेचिंग और ब्रांड शेयरिंग जैसे तरीके भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हैं।
डब्लूएचओ की गाइडलाइन में इंटरनेट, डिजिटल प्लेटफॉर्म और मनोरंजन के माध्यमों को लेकर भी खास चिंता जताई गई है। वजह यह है कि इन माध्यमों के जरिए तंबाकू ब्रांड का अप्रत्यक्ष प्रचार पारंपरिक विज्ञापनों से अलग तरीकों से किया जा सकता है। 68 देशों ने तंबाकू के विज्ञापन, प्रचार और प्रायोजन के सभी रूपों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया है। ये देश दुनिया की एक चौथाई से ज्यादा आबादी को कवर करते हैं।
पांच बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में इससे जुड़े क्या नियम हैं?
- अमेरिका: तंबाकू उत्पादों के विज्ञापन और प्रचार पर संघीय स्तर पर कई प्रतिबंध हैं। हालांकि, चीन या ब्रिटेन की तरह दूसरे उत्पाद के जरिए तंबाकू ब्रांड के प्रचार पर अलग से उतना स्पष्ट व्यापक प्रावधान नहीं है।
- चीन: तंबाकू विज्ञापन पर रोक के साथ-साथ किसी दूसरे उत्पाद या सेवा के विज्ञापन के जरिए तंबाकू का नाम, ट्रेडमार्क, पैकेजिंग या उससे मिलती-जुलती पहचान प्रचारित करना भी प्रतिबंधित है।
- जर्मनी: तंबाकू के विज्ञापन पर कड़े प्रतिबंध हैं, खासकर इंटरनेट, प्रिंट मीडिया, रेडियो और टेलीविजन जैसे माध्यमों में।
- जापान: यहां तंबाकू विज्ञापन पर पूर्ण कानूनी प्रतिबंध नहीं है। विज्ञापन और प्रचार पर कुछ कानूनी सीमाओं के साथ तंबाकू उद्योग के स्वैच्छिक दिशानिर्देश भी लागू होते हैं।
- ब्रिटेन: तंबाकू विज्ञापन और प्रचार पर व्यापक प्रतिबंध हैं। यहां ब्रांड शेयरिंग के लिए बाकायदा अलग नियम बनाए गए हैं, जिनमें गैर-तंबाकू उत्पाद के जरिए तंबाकू ब्रांड को बढ़ावा देने वाली स्थिति को नियंत्रित किया जाता है।