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कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी आखिर किस मुहाने पर आकर खड़ी है कांग्रेस?

शशिधर पाठक, नई दिल्ली Published by: शशिधर पाठक Updated Sat, 08 Jun 2019 10:18 PM IST
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where is congress party heading towards rahul gandhi sonia gandhi priyanka gandhi jyotiraditya
सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मनमोहन सिंह - फोटो : रवि बत्रा
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देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी का सबसे गंभीर समय चल रहा है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक कांग्रेस पार्टी में हार की खीज, टकराव, अंतर्विरोध है। इससे पार पाना न केवल कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लिए बल्कि सोनिया गांधी के लिए भी कठिन है। चुनाव बाद नतीजों का विश्लेषण करने वाले कांग्रेस पार्टी के एक पूर्व महासचिव का कहना है कि हम दर्जन भर से अधिक सीटें तो अपने ही नेताओं में तालमेल न बिठा पाने के कारण हार गए। राजस्थान में अशोक गहलोत के खिलाफ बगावत का सुर लगातार तेज हो रहा है। आग भीतर धधक रही है। पार्टी के नेता अविनाश पांडे पूरी तरह से अशोक गहलोत का साथ दे रहे हैं, लेकिन सचिन पायलट को चाहने वालों के लिए यही आखिरी अवसर की तरह दिखाई दे रहा है। सचिन पायलट के समर्थक हार के लिए गहलोत को तो गहलोत हार के लिए पायलट को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। 
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म.प्र., महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र, हरियाणा पंजाब

मध्य प्रदेश (म.प्र.) में ज्योतिरादित्य सिंधिया का चुनाव हारना देश की राजनीति की नब्ज टटोलने वालों को चौंकाता है। सिंधिया के समर्थक और ग्वालियर चंबल संभाग के कई नेता इस पर तरह-तरह की बयानबाजी कर रहे हैं। ज्योतिरादित्य, कमलनाथ और दिग्विजय के बीच में संतुलन बनाने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कड़ी मेहनत कर रहे हैं। इसमें प्रियंका की भूमिका अहम है। 
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पंजाब से खबर आ चुकी है। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपने मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू का विभाग बदल दिया है। एक तरह से कैप्टन ने बता दिया है कि नवजोत चाहें तो अपना रास्ता चुन लें। कैप्टन धीरे-धीरे पार्टी के अपने विरोधियों को अब किनारे लगा रहे हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रताप सिंह बाजवा खामोशी से सबकुछ देख रहे हैं। कैप्टन को पता है कि लोकसभा चुनाव में उन्होंने अच्छा करके दिया है। लिहाजा यह सही समय है।

तेलंगाना में आइए। 17 सीटों में से तीन कांग्रेस जीत सकी। चुनाव नतीजे आए पखवाड़ा भर नहीं बीते कि 12 कांग्रेस विधायक तेलंगाना राष्ट्र समिति में जा रहे हैं। आंध्र प्रदेश में मुख्यमंत्री बनने के बाद जगनमोहन रेड्डी ताकतवर होकर उभरे हैं। कांग्रेस नेताओं को यह स्थिति कम पच रही है। महाराष्ट्र की दशा देख लीजिए। शीर्ष स्तर पर नेताओं में खींचतान मची है।

महाराष्ट्र की तरह ही आइए हरियाणा की ओर बढ़ते हैं। हरियाणा में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र और उनके पुत्र दीपेंद्र के चुनाव हारने से सबसे ज्यादा खुश कई कांग्रेसी नेता हैं। उन्हें लग रहा है कि हुड्डा जी निबट लिए। हरियाणा में विधानसभा चुनाव होना है। यही हाल रहा तो सीटें भले न आएं लेकिन पार्टी की कमान थामने के लिए जूतम-पैजार जैसी स्थिति बनी हुई है। 

उ.प्र. में कांग्रेस का क्या बचा?

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वायनाड में रोड शो के दौरान राहुल गांधी - फोटो : ANI
राहुल गांधी अमेठी से लोकसभा का चुनाव हार गए हैं। सिमटकर कांग्रेस एक सीट पर आ गई है। लेकिन पिछले कुछ साल से बड़ा सवाल है कि पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष और संगठन इसी तरह से चलता रहेगा। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी या ज्योतिरादित्य सिंधिया की घुट्टी से क्या काम चल जाएगा? अब तो प्रदेश कांग्रेस के कई नेता दबी जुबान से कहने लगे हैं कि उत्तर प्रदेश (उ.प्र.) कांग्रेस के लिए हाई कमान के पास समय ही नहीं है। उत्तराखंड में फिलहाल पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की कांग्रेस बची है। हिमांचल में वीरभद्र और सुक्खू की लड़ाई का कोई अंत नहीं हो पा रहा है। झारखंड प्रदेश कांग्रेस को लेकर राजीव गांधी के जमाने के नेता कुछ बोलने से पहले सीधे अपना कान पकड़ ले रहे हैं। 

दक्षिण भारत और केरल

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के केरल में वायनाड सीट से चुनाव लडऩे, जीतने के बाद पार्टी के साथ दक्षिण की भावनाएं मजबूत हुई हैं। इसका थोड़ा सा असर कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस में और कुछ असर तमिलनाडु प्रदेश कांग्रेस में दिखाई दे रहा है। तमिलनाडु से कांग्रेस के नेता एसवी रमणी कहते हैं, केरल से चुनाव लडऩे का अच्छा संदेश गया है। यह सुझाव देने वाले केसी वेणुगोपाल का पार्टी में कद भी बढ़ा है, लेकिन क्या इतने भर से कांग्रेस एक प्रमुख विपक्षी दल की हैसियत का दम हासिल कर सकेगी? बड़ा सवाल है? इस सवाल के जवाब में उत्तर भारत के एक बड़े पुराने कांग्रेसी नेता का कहना है कि संकेत अच्छे नहीं है। अभी भी समय है। क्या पता हमारी पार्टी रास्ते पर आ जाए।

राहुल गांधी ने क्या किया?

कांग्रेस के भीतर एक घमासान मचा है। इसकी आहट सोनिया, राहुल, प्रियंका सब महसूस कर रहे हैं। इसे साधने की कोशिश हो रही है। दबी जुबान से एक सवाल पार्टी के नेताओं की तरफ से उठाया जा रहा है कि आखिर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने क्या किया? वह न तो संगठन को युवा बना पाए और न ही चुनाव से पहले युवाओं को कोई संदेश दे पाए। राहुल गांधी ने तालकटोरा स्टेडियम में पार्टी के अधिवेशन में कहा था कि उन्होंने पार्टी के मंच को युवाओं के लिए खाली कर दिया है।

लेकिन वह न तो इसे कर पाए और न ही कांग्रेस की मकडज़ाल वाली राजनीति से पार्टी को कोई दिशा दिखा सके। गुजरात के एक नेता तो व्यंग भी करते हैं। उनका कहना है कि अशोक गहलोत, पी चिदंबरम और कमलनाथ के पुत्र मोह पर अध्यक्ष जी ने सवाल उठाया है। उन्हें सोचना चाहिए कि क्या इसके सिवा पार्टी में कुछ और भी हो रहा है। भाजपा ने तो कड़ा अनुशासन दिखाकर राजनीतिक संदेश दे दिया। इसके मुकाबले में हमले क्या किया?
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