Explainer: नासा ने इसरो को मून बेस के लिए क्यों दिया न्योता, चांद पर इंसानों का ठिकाना बनाने की क्या है योजना?
नासा ने चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास लंबे समय तक इंसानों की मौजूदगी के लिए मून बेस बनाने की योजना तैयार की है और इसी में सहयोग के लिए इसरो को न्योता दिया है। भारत की चंद्र मिशनों में बढ़ती तकनीकी क्षमता, चंद्रयान-3 की सफलता और कम लागत वाली अंतरिक्ष तकनीक इस साझेदारी की अहम वजह हैं। आइए विस्तार से जानते हैं।
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विस्तार
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) को अपने मून बेस कार्यक्रम में शामिल होने का न्योता दिया है। यह जानकारी भारत-अमेरिका के बीच अंतरिक्ष सहयोग को लेकर हुई 9वीं बैठक के बाद सामने आई। इसी बैठक के दौरान दोनों देशों ने नागरिक और व्यावसायिक अंतरिक्ष सहयोग के साथ-साथ भविष्य के विज्ञान और मानव अंतरिक्ष उड़ान तकनीकों में साझेदारी बढ़ाने पर चर्चा की।
क्या है नासा का मून बेस कार्यक्रम? चंद्रमा के किस हिस्से में है बेस बनाने की योजना? क्या है इस कार्यक्रम का उद्देश्य? कितने चरण में पूरा होगा यह कार्यक्रम? इस कार्यक्रम की योजना कैसे बनी? नासा ने इसरो को न्योता क्यों दिया? भारत को क्या फायदा होगा? चंद्र मिशनों में भारत कहां है? कैसे बढ़ रही भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था? आइए जानते हैं...
क्या है नासा का मून बेस कार्यक्रम?
नासा का मून बेस कार्यक्रम चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास इंसानों की लंबे समय तक मौजूदगी स्थापित करने की महत्वाकांक्षी योजना है। इसके तहत रोबोटिक और मानव मिशनों की मदद से धीरे-धीरे एक ऐसा ठिकाना तैयार किया जाएगा, जहां अंतरिक्ष यात्री रह सकेंगे, काम कर सकेंगे और वैज्ञानिक शोध कर सकेंगे। इसका उद्देश्य सिर्फ चांद पर पहुंचना नहीं, बल्कि वहां लंबे समय तक काम करने के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा तैयार करना और आगे की बड़ी अंतरिक्ष यात्राओं के लिए रास्ता बनाना है।
चांद के दक्षिणी ध्रुव पर ही क्यों बनेगा मून बेस?
नासा ने मून बेस के लिए चांद के दक्षिणी ध्रुव के आसपास का क्षेत्र चुना है। इस इलाके में वैज्ञानिक खोज, संसाधनों की तलाश और भविष्य में लंबे समय तक इंसानों की मौजूदगी की संभावनाएं हैं। यहां मौजूद कुछ संसाधन भविष्य के अंतरिक्ष यात्रियों के लिए उपयोगी हो सकते हैं। साथ ही, यहां किए जाने वाले अध्ययन चांद, पृथ्वी और पूरे सौरमंडल के इतिहास को समझने में मदद कर सकते हैं।
हालांकि, दक्षिणी ध्रुव पर मून बेस बनाना आसान नहीं होगा। यहां सूरज की रोशनी वाले और छायादार इलाकों के बीच तापमान में बहुत ज्यादा अंतर होता है। जमीन ऊबड़-खाबड़ और बेहद कठिन है। ऐसे वातावरण में इंसानों को रहने और काम करने के लिए नई तकनीकों और मजबूत बुनियादी ढांचे की जरूरत होगी।
कैसे तैयार होगा मून बेस?
नासा मून बेस को एक साथ तैयार नहीं करेगा। इसे कई चरणों में विकसित किया जाएगा। हर चरण में हासिल अनुभव और तकनीक का इस्तेमाल अगले चरण में किया जाएगा, ताकि धीरे-धीरे एक ऐसा विस्तार योग्य ठिकाना बनाया जा सके जहां इंसान लंबे समय तक रह सकें।
पहला चरण: 2026 से 2029 तक
पहले चरण में चांद की सतह तक सुरक्षित और भरोसेमंद तरीके से पहुंचने पर जोर होगा। रोबोटिक मिशन चांद के दक्षिणी ध्रुव की खोज करेंगे, नई तकनीकों का परीक्षण करेंगे और भविष्य में मून बेस के लिए जरूरी जानकारी जुटाएंगे। इन मिशनों से यह तय करने में मदद मिलेगी कि भविष्य में बुनियादी ढांचा कहां बनाया जा सकता है और चांद पर उतरने व काम करने के जोखिम को कैसे कम किया जाए।
दूसरा चरण: 2029 से 2032 तक
दूसरे चरण में चांद पर शुरुआती बुनियादी ढांचा तैयार किया जाएगा। इसमें बिजली व्यवस्था, सामान पहुंचाने की व्यवस्था, परिवहन, संचार और लॉजिस्टिक्स जैसी सुविधाएं शामिल होंगी। अलग-अलग स्थानों पर बुनियादी ढांचा विकसित कर एक ऐसा मजबूत और लचीला आधार तैयार किया जाएगा, जिस पर आगे मून बेस का विस्तार किया जा सके।
तीसरा चरण: 2032 और उसके बाद
तीसरे चरण में स्थायी चंद्र ठिकाना तैयार करने की दिशा में काम होगा। इसमें ऐसे आवास, बिजली व्यवस्था, संचार और परिवहन सुविधाएं शामिल होंगी, जिनकी मदद से अंतरिक्ष यात्री लंबे समय तक चांद पर रह और काम सकेंगे। मून बेस के विस्तार के साथ वैज्ञानिक शोध, नई तकनीकों के परीक्षण और आगे की अंतरिक्ष यात्राओं की तैयारी भी की जाएगी।
मून बेस में नासा के साथ और कौन-कौन?
मून बेस की योजना में नासा ने निजी कंपनियों और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों की भागीदारी को भी महत्वपूर्ण रखा है। कार्यक्रम में सरकारी एजेंसियों, निजी क्षेत्र और दूसरे देशों के सहयोग को शामिल किया जाएगा। शुरुआती तकनीकी परीक्षणों से लेकर चांद की सतह पर लंबे समय तक चलने वाले अभियानों तक उद्योग और अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों के लिए अलग-अलग स्तर पर भागीदारी के अवसर होंगे।
मून बेस कार्यक्रम के कार्यक्रम प्रबंधक कार्लोस गार्सिया-गैलान हैं। उनके पास मानव अंतरिक्ष उड़ान के क्षेत्र में 30 साल से ज्यादा का अनुभव है और वह मून बेस के विकास की निगरानी कर रहे हैं।
मून बेस कार्यक्रम की शुरुआत कब हुई?
नासा ने 24 मार्च 2026 को आयोजित ‘इग्निशन’ कार्यक्रम के दौरान मून बेस की योजना की घोषणा की थी। इस कार्यक्रम में चांद पर स्थायी मानव मौजूदगी स्थापित करने के लिए चरणबद्ध योजना पेश की गई। इसके बाद नासा ने मून बेस और उससे जुड़ी प्रणालियों व सेवाओं के विकास के लिए जानकारी और प्रस्ताव मांगने की प्रक्रिया शुरू की।
मई 2026 में नासा ने मून बेस से जुड़े पहले तीन मिशनों और नई साझेदारियों की घोषणा की। इसमें एस्ट्रोलैब और लूनर आउटपोस्ट को चांद पर चलने वाले वाहनों के विकास का काम दिया गया। ब्लू ओरिजिन को इन वाहनों को चांद की सतह तक पहुंचाने से जुड़े काम के लिए चुना गया, जबकि फायरफ्लाई एयरोस्पेस को नासा के मूनफॉल ड्रोन को चांद तक पहुंचाने वाले अंतरिक्ष यान के निर्माण के लिए चुना गया।
30 जून 2026 को नासा ने 2028 के अंत में चांद पर चार नई मिशन पहुंचाने के लिए तीन कंपनियों का चयन किया। एस्ट्रोबोटिक, फायरफ्लाई एयरोस्पेस और इंट्यूटिव मशीन्स नासा के वैज्ञानिक उपकरणों को चांद की सतह तक पहुंचाएंगी।
इसके बाद 24 जुलाई 2026 को नासा ने कैपस्टोन-02 मिशन की घोषणा की। यह एक तकनीकी परीक्षण मिशन होगा, जिसमें चांद की कक्षा में उन्नत नेविगेशन, संचार और दूसरे अंतरिक्ष यानों के साथ मिलने की तकनीकों का परीक्षण किया जाएगा। इससे भविष्य के आर्टेमिस मिशनों और मून बेस के विकास के लिए जानकारी मिलेगी।
अगस्त 2026 में नासा ने अपने तीसरे मून बेस अपडेट में चांद तक नासा के वैज्ञानिक उपकरण, तकनीक और बुनियादी ढांचा पहुंचाने वाले पहले चार व्यावसायिक लैंडरों के बारे में जानकारी दी। इसमें इन अंतरिक्ष यानों की तैयारी, उन्हें जोड़ने और परीक्षण करने की प्रक्रिया की जानकारी भी दी गई।
नासा ने इसरो को न्योता क्यों दिया?
भारत ने पिछले एक दशक में अंतरिक्ष क्षेत्र में अपनी क्षमताओं को तेजी से मजबूत किया है। अंतरिक्ष कार्यक्रम अब केवल वैज्ञानिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की तकनीकी आत्मनिर्भरता, रणनीतिक क्षमता, नवाचार और वैश्विक स्तर पर भारत की भूमिका का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। भारत ने अलग-अलग मिशनों के जरिए अंतरिक्ष में अपनी तकनीकी क्षमता साबित की है।
भारत को क्या फायदा होगा?
भारत भी आने वाले वर्षों में अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम को बड़े लक्ष्यों की ओर ले जा रहा है। इसरो के 'अंतरिक्ष विजन 2047' के तहत भारत की महत्वाकांक्षी योजनाओं में भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन की स्थापना और भविष्य में चंद्रमा पर मानव मिशन शामिल हैं। मून बेस कार्यक्रम में सहयोग से भारत को चंद्रमा पर दीर्घकालिक मानव गतिविधियों के लिए जरूरी तकनीकों और अंतरराष्ट्रीय अनुभव से जुड़ने का अवसर मिल सकता है। वहीं, नासा को इसरो की कम लागत वाली अंतरिक्ष तकनीक, चंद्र मिशनों का अनुभव और चंद्रयान-3 से हासिल वैज्ञानिक उपलब्धियों का लाभ मिल सकता है।
सबसे बड़ा फायदा वैज्ञानिक डाटा और विशेषज्ञता के आदान-प्रदान से हो सकता है। दोनों देश खुले वैज्ञानिक डाटा साझा करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, जिससे चंद्रमा और अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़े शोध को गति मिलने की उम्मीद है। आर्टिमिस समझौता भी वैज्ञानिक डाटा को व्यापक रूप से साझा करने की प्रतिबद्धता पर जोर देता है।
भारत की चंद्र यात्रा कितनी लंबी रही है?
भारत की चंद्र यात्रा की नींव चंद्रयान-1 के साथ 2008 में रखी गई थी। यह भारत का पहला चंद्र मिशन था। इस मिशन ने चांद की सतह पर पानी के अणुओं और हाइड्रॉक्सिल के प्रमाण खोजने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसके साथ चांद के बाहरी वातावरण को समझने में भी मदद मिली।
चंद्रयान-1 को 22 अक्तूबर 2008 को श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च किया गया था। यह चांद की सतह से करीब 100 किलोमीटर की ऊंचाई पर उसकी कक्षा में रहा और चांद की रासायनिक, खनिज और भूगर्भीय विशेषताओं का अध्ययन किया। इसमें भारत, अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, स्वीडन और बुल्गारिया में बनाए गए 11 वैज्ञानिक उपकरण लगाए गए थे। चंद्रयान-1 मिशन ने मई 2009 में अपनी कक्षा को 200 किलोमीटर तक बढ़ाया था। इस मिशन ने चांद की 3,400 से अधिक परिक्रमाएं कीं। 29 अगस्त 2009 को अंतरिक्ष यान से संपर्क टूटने के बाद मिशन समाप्त हुआ।
2019 में लॉन्च हुआ चंद्रयान-2 भारत के चंद्र कार्यक्रम का अगला बड़ा कदम था। इस मिशन ने चांद की सतह की बेहद उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरें हासिल कीं। इससे चांद की सतह का करीब 30 सेंटीमीटर तक का विवरण देखने में मदद मिली। चंद्रयान-1 और चंद्रयान-2 ने भारत को चंद्र विज्ञान में एक महत्वपूर्ण देश के तौर पर स्थापित किया और आगे के मिशनों के लिए आधार तैयार किया।
23 अगस्त 2023 भारत के चंद्र अभियान के इतिहास में बेहद महत्वपूर्ण दिन रहा। चंद्रयान-3 ने चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास सफल सॉफ्ट लैंडिंग की। इसके साथ भारत चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास उतरने वाला पहला देश बना और चांद की सतह पर सफल सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला दुनिया का चौथा देश बना। विक्रम लैंडर ने चांद की सतह पर 69.3 डिग्री दक्षिण अक्षांश पर लैंडिंग की। यह ऐसा क्षेत्र था, जहां इससे पहले किसी अंतरिक्ष यान ने पहुंचकर सफल लैंडिंग नहीं की थी। मिशन के वैज्ञानिक उपकरणों ने चांद की सतह पर सीधे अध्ययन किए और सल्फर की मौजूदगी की पुष्टि की।
अब भारत की आगे की तैयारी क्या है?
भारत की चंद्र योजनाएं चंद्रयान-3 पर खत्म नहीं होतीं। चंद्रयान-4 को 2027 के लिए योजनाबद्ध किया गया है। इसका लक्ष्य चांद पर उतरना, वहां से नमूने इकट्ठा करना और उन्हें पृथ्वी पर वापस लाना है।
इसके बाद चंद्रयान-5 यानी लुपेक्स मिशन की योजना है। इसका उद्देश्य चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास हमेशा छाया में रहने वाले क्षेत्रों में पानी और दूसरे वाष्पशील पदार्थों का अध्ययन करना है। इससे भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव और वहां मौजूद संसाधनों की खोज के अगले चरण में प्रवेश करेगा।
कैसे बढ़ रही भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था?
भारत भी वैश्विक स्पेस इकोनॉमी में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। राज्यसभा में केंद्रीय विज्ञान व प्रौद्योगिकी व अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने बताया था कि भारत की स्पेस इकोनॉमी का आकार बढ़कर 8.4 अरब डॉलर हो गया है। देश में 399 स्टार्टअप्स लॉन्च व्हीकल, सैटेलाइट, प्रोपल्शन सिस्टम और स्पेस-ग्रेड इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में काम कर रहे हैं।
सरकार का लक्ष्य अगले दशक में इस उद्योग को पांच गुना बढ़ाकर 40 से 45 अरब डॉलर तक पहुंचाना है। साथ ही 2030 तक वैश्विक स्पेस इकोनॉमी में भारत की हिस्सेदारी आठ प्रतिशत तक ले जाने की योजना है। डॉ. सिंह के अनुसार, 2019 के बाद निजी क्षेत्र के लिए अंतरिक्ष गतिविधियों को खोलने और इन-स्पेस की स्थापना जैसे फैसलों ने इस वृद्धि को गति दी है। इन-स्पेस निजी कंपनियों और इसरो के बीच सिंगल-विंडो इंटरफेस के रूप में काम करता है।