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Explainer: सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने वाले विधेयक पर बवाल क्यों, कानून से कितनी बदलेगी व्यवस्था?

Fri, 07 Aug 2026 06:08 AM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Fri, 07 Aug 2026 06:08 AM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने वाले संशोधन विधेयक को संसद की मंजूरी मिल गई है। सरकार का दावा है कि इससे लंबित मामलों के निपटारे में तेजी आएगी, जबकि विपक्ष ने इसे मनी बिल के रूप में लाने और न्यायिक सुधारों की दिशा पर सवाल उठाए हैं। आखिर इस विधेयक से क्या बदलेगा और विवाद क्यों हुआ?

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Why Is the Supreme Court Judges Expansion Bill Controversial? Will It Transform the Justice System?
सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक 2026 - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

संसद ने सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक 2026 को मंजूरी दे दी है। 3 अगस्त 2026 को यह विधेयक लोकसभा से पारित हुआ, जबकि 6 अगस्त 2026 को राज्यसभा ने भी इसे ध्वनिमत से पास कर दिया। अब राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद यह कानून बन जाएगा। इसके तहत सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ा दी जाएगी। सरकार का कहना है कि इससे लंबित मामलों के निपटारे में तेजी आएगी, लेकिन विपक्ष ने इसे अध्यादेश के जरिए लाने, मनी बिल के रूप में पेश करने और केवल चार जज बढ़ाने से न्याय व्यवस्था में कितना बदलाव आएगा, जैसे कई सवाल उठाए।

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आइए आसान भाषा में समझते हैं कि यह विधेयक क्या है? इसे लाने की जरूरत क्यों पड़ी? इससे क्या बदलेगा? सरकार का क्या कहना है? इस पर इतना विवाद क्यों हुआ?

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सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक क्या है?

यह विधेयक सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 1956 में संशोधन करता है। इसके तहत सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर न्यायाधीशों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 कर दी जाएगी। यानी अब सुप्रीम कोर्ट में कुल 38 जज (1 मुख्य न्यायाधीश + 37 अन्य न्यायाधीश) होंगे। सरकार का कहना है कि इससे अधिक बेंचें बनाई जा सकेंगी और मामलों की सुनवाई तेजी से हो सकेगी।

Why Is the Supreme Court Judges Expansion Bill Controversial? Will It Transform the Justice System?
सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक 2026 - फोटो : Amar Ujala

सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या पहले कितनी थी?

सुप्रीम कोर्ट की स्थापना के समय जजों की संख्या काफी कम थी। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(1) में कहा गया है कि भारत में एक मुख्य न्यायाधीश और संसद द्वारा तय की गई संख्या में अन्य न्यायाधीश होंगे। यानी जरूरत के अनुसार संसद कानून बनाकर जजों की संख्या बढ़ा सकती है।

इसी प्रावधान के तहत 1सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक बनाया गया। उस समय मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर सुप्रीम कोर्ट में अधिकतम 10 जज रखने का प्रावधान था। इसके बाद जैसे-जैसे आबादी बढ़ी, मुकदमों की संख्या बढ़ी और अदालतों पर काम का बोझ बढ़ा, वैसे-वैसे संसद ने कई बार जजों की संख्या बढ़ाई। समय के साथ यह संख्या इस तरह बढ़ी;

  • 1956: 10 जज
  • 1960: 13 जज
  • 1977: 17 जज
  • 1986: 25 जज
  • 2008: 30 जज
  • 2019: 33 जज
  • 2026: अब नए संशोधन के बाद 37 जज (मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर)
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सरकार को इसकी जरूरत क्यों पड़ी?

सरकार ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। आंकड़ों के अनुसार,

  • 1 जनवरी 2026 तक सुप्रीम कोर्ट में 92,101 मामले लंबित थे।
  • वर्ष 2025 में 75,410 नए मामले दर्ज हुए।
  • जबकि केवल 65,615 मामलों का निपटारा हो सका।

यानी हर साल जितने मामले निपटाए जा रहे हैं, उससे ज्यादा नए मामले अदालत में पहुंच रहे हैं। सरकार का कहना है कि इससे पुराने मामलों और संविधान पीठ के मामलों की सुनवाई प्रभावित हो रही है। इसलिए न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना जरूरी हो गया था।

Why Is the Supreme Court Judges Expansion Bill Controversial? Will It Transform the Justice System?
सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक 2026 - फोटो : Amar Ujala

विधेयक का उद्देश्य क्या है?

सरकार के अनुसार इस विधेयक का उद्देश्य,

  • सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक क्षमता बढ़ाना।
  • अधिक बेंचों का गठन करना।
  • संविधान पीठों की नियमित सुनवाई सुनिश्चित करना।
  • लंबित मामलों का बोझ कम करना।
  • लोगों को समय पर न्याय उपलब्ध कराना।

राज्यसभा में कानून एवं न्याय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने कहा कि यह सरकार के न्यायिक सुधारों का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि जजों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ सरकार मध्यस्थता (ADR), आर्बिट्रेशन और सुलह जैसी वैकल्पिक विवाद समाधान प्रणाली को भी बढ़ावा दे रही है ताकि अदालतों पर मुकदमों का बोझ कम हो सके।

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सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले - फोटो : Amar Ujala

अध्यादेश पहले क्यों लाया गया?

सरकार ने 16 मई 2026 को संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत एक अध्यादेश जारी कर पहले ही जजों की संख्या बढ़ा दी थी। संविधान के अनुसार जब संसद का सत्र नहीं चल रहा होता और तत्काल कानून बनाने की जरूरत होती है, तब सरकार अध्यादेश ला सकती है। लेकिन अध्यादेश को संसद का अगला सत्र शुरू होने के छह सप्ताह के भीतर दोनों सदनों से पारित कराना अनिवार्य होता है, अन्यथा वह स्वतः समाप्त हो जाता है। सरकार का कहना था कि इसलिए मानसून सत्र में इस अध्यादेश को विधेयक के रूप में पारित कराना जरूरी था।

मनी बिल क्या होता है?

यही इस विधेयक का सबसे बड़ा विवाद रहा। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 110 के अनुसार मनी बिल वह विधेयक होता है जो मुख्य रूप से,

  • कर लगाने या हटाने,
  • सरकार की उधारी,
  • भारत की संचित निधि या आकस्मिक निधि से धन के विनियोजन,
  • या सरकारी धन से जुड़े अन्य वित्तीय मामलों से संबंधित हो।

मनी बिल और सामान्य विधेयक में क्या अंतर है?

  • मनी बिल केवल लोकसभा में पेश किया जा सकता है।
  • लोकसभा अध्यक्ष तय करते हैं कि कोई विधेयक मनी बिल है या नहीं।
  • राज्यसभा इसमें संशोधन नहीं कर सकती, केवल सिफारिश दे सकती है।
  • अंतिम निर्णय लोकसभा का होता है।

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सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक 2026 - फोटो : Amar Ujala

सरकार ने इसे मनी बिल क्यों बताया?

सरकार का तर्क था कि चार अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति से उनके वेतन, भत्ते, स्टाफ, सरकारी आवास और अन्य सुविधाओं पर खर्च होगा। यह पूरा खर्च भारत की संचित निधि से किया जाएगा। इसलिए इसे मनी बिल के रूप में पेश किया गया।

विपक्ष ने मनी बिल पर क्या आपत्ति जताई?

विपक्ष का कहना था कि यह विधेयक केवल खर्च से संबंधित नहीं है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट की संरचना में भी बदलाव करता है। इसलिए इसे सामान्य विधेयक के रूप में लाकर दोनों सदनों में विस्तृत चर्चा कराई जानी चाहिए थी। विपक्ष का मानना था कि मनी बिल के रूप में लाने से राज्यसभा की भूमिका सीमित हो गई और व्यापक संसदीय बहस का अवसर कम हो गया।

मनी बिल का दायरा क्या होना चाहिए, यह मुद्दा पहले से ही सुप्रीम कोर्ट की सात-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष लंबित है। इससे पहले आधार अधिनियम , धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) और ट्रिब्यूनल संशोधन कानूनों को भी मनी बिल के रूप में पारित किए जाने पर विवाद हो चुका है।

विपक्ष ने और क्या सवाल उठाए?

1. अध्यादेश की इतनी जल्दबाजी क्यों?
कांग्रेस सांसद विवेक तन्खा ने कहा कि यदि सभी राजनीतिक दल जजों की संख्या बढ़ाने के पक्ष में थे, तो सरकार इसे सीधे संसद में सामान्य विधेयक के रूप में क्यों नहीं लाई। उन्होंने पूछा कि पहले अध्यादेश जारी करने की जरूरत क्यों पड़ी।

2. क्या सिर्फ चार नए जज बढ़ाने से समस्या हल होगी?
विवेक तन्खा ने सवाल उठाया कि जब सुप्रीम कोर्ट में 92 हजार से ज्यादा मामले लंबित हैं, तो केवल चार नए जज जोड़ने से क्या वास्तव में न्याय व्यवस्था में बड़ा बदलाव आएगा। उन्होंने कहा कि व्यापक न्यायिक सुधारों की जरूरत है।

3. निचली अदालतों की अनदेखी
कई सांसदों ने कहा कि सबसे ज्यादा लंबित मामले जिला अदालतों और हाईकोर्ट में हैं। इसलिए वहां भी बड़ी संख्या में जजों की नियुक्ति होनी चाहिए। केवल सुप्रीम कोर्ट में जज बढ़ाने से पूरी न्याय व्यवस्था की समस्या दूर नहीं होगी।

4. न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व
बहस के दौरान कई सांसदों ने सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में एससी, एसटी, ओबीसी, महिलाओं और अन्य वंचित वर्गों के प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाया। कुछ सांसदों ने कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाने और नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार की भी मांग की।

5. कोर्टरूम और इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी
बीजेडी सांसद सस्मित पात्रा ने कहा कि केवल जज बढ़ाने से काम नहीं चलेगा। सुप्रीम कोर्ट में कोर्टरूम, जजों के चैंबर और वकीलों के लिए पर्याप्त जगह भी नहीं है। उन्होंने न्यायिक आधारभूत ढांचे को मजबूत करने की मांग की।

चार नए जजों पर कितना खर्च आएगा?

विधेयक के वित्तीय ज्ञापन के अनुसार,

  • चार नए जजों, उनके स्टाफ, वेतन, भत्ते, परिवहन और अन्य सुविधाओं पर लगभग ₹10.56 करोड़ प्रति वर्ष खर्च होगा।
  • सरकारी आवास, कार और अन्य प्रारंभिक व्यवस्थाओं पर करीब ₹3.47 करोड़ का एकमुश्त खर्च आएगा।
  • कुल मिलाकर चार नए जजों के पद सृजित करने पर लगभग ₹14.04 करोड़ का अतिरिक्त खर्च होगा।
  • यह पूरा खर्च भारत की संचित निधि से किया जाएगा।

क्या केवल जज बढ़ाने से लंबित मामले खत्म हो जाएंगे?

सरकार का मानना है कि इससे सुप्रीम कोर्ट की क्षमता बढ़ेगी और मामलों का निपटारा तेज होगा। लेकिन बहस के दौरान कई सांसदों ने कहा कि केवल चार जज बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। लंबित मामलों को कम करने के लिए हाईकोर्ट और निचली अदालतों में रिक्त पद भरना, नए कोर्टरूम बनाना, न्यायिक ढांचे को मजबूत करना, तकनीक का बेहतर उपयोग करना और नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार भी जरूरी है।

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