Explainer: सजा-ए-मौत का तरीका बदलने वाली याचिका क्यों हुई खारिज, दुनिया में मृत्युदंड के कैसे-कैसे तरीके?
सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की जगह लीथल इंजेक्शन जैसे दूसरे तरीकों की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। भारत में फिलहाल बीएनएसएस की धारा 393(5) के तहत फांसी ही मृत्युदंड देने का कानूनी तरीका है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भविष्य में मौत की सजा का तरीका बदलने पर विचार किया जा सकता है?
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विस्तार
भारत में मौत की सजा देने के तरीके को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की जगह दूसरे विकल्प अपनाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। याचिका में फांसी की जगह घातक इंजेक्शन जैसे विकल्प को अपनाने की मांग की गई थी।
आखिर ये पूरा मामला क्या था? सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा? भारत में मौत की सजा का कानून क्या है? फांसी कैसे दी जाती है? इसका इतिहास क्या रहा है? घातक इंजेक्शन कैसे काम करता है? दुनिया में मृत्युदंड देने के कौन-कौन से तरीके अपनाए जाते हैं? क्या देश में भविष्य में मृत्युदंड के दूसरे तरीके अपनाए जा सकते हैं?
सुप्रीम कोर्ट में मामला क्या था?
वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा की ओर से जनहित याचिका दायर की गई थी। याचिका में दंड प्रक्रिया संहिता यानी सीआरपीसी की धारा 354(5) को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई। साथ ही सम्मानजनक तरीके से मृत्यु पाने के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार माना जाए। याचिकाकर्ता का कहना था कि फांसी की प्रक्रिया लंबे समय तक दर्द और पीड़ा पैदा कर सकती है। इसके मुकाबले उन्होंने घातक इंजेक्शन, गोली मारने, बिजली से मौत या गैस चैंबर जैसे तरीकों पर विचार करने की मांग की। याचिका में यह तर्क भी दिया गया कि अगर मौत की सजा दी ही जाती है तो उसे ऐसे तरीके से लागू किया जाना चाहिए जिससे न्यूनतम संभव पीड़ा हो।
याचिका में कहा गया है कि फांसी की प्रक्रिया में कैदी की मौत की पुष्टि करने में 40 मिनट से ज्यादा समय लग सकता है, जबकि गोली मारने की प्रक्रिया में कुछ ही मिनट लगते हैं। वहीं, नस के जरिए दिए जाने वाले घातक इंजेक्शन की प्रक्रिया करीब 5 मिनट में पूरी हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका क्यों खारिज की?
मौजूदा मामले में कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ऐसा पर्याप्त वैज्ञानिक, संवैधानिक या अनुभवजन्य आधार पेश नहीं कर पाया जिससे यह साबित हो कि पुराने फैसले का आधार अब बदल चुका है। कोर्ट ने यह भी कहा कि पहले के फैसले में बिजली से मौत, जहरीली गैस, गोली मारने और घातक इंजेक्शन जैसे विकल्पों की जांच की जा चुकी है और इनमें से किसी को भी फांसी पर कोई स्पष्ट या साबित फायदा नहीं मिला।
याचिकाकर्ता ने कहा था कि कुछ देशों में आर्मी एक्ट, एयर फोर्स एक्ट और नेवी एक्ट में मौत की सजा को फांसी या गोली मारकर लागू करने की अनुमति है, जबकि नागरिकों के लिए फांसी का प्रावधान है। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि सैन्य कानून एक अलग क्षेत्र में लागू होते हैं और अलग वर्ग के लोगों पर लागू होते हैं। इसलिए सैन्य कानूनों में गोली मारने का विकल्प होना नागरिकों के लिए निर्धारित फांसी के तरीके की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने का आधार नहीं बन सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पहले के फैसलों को भी देखा। 1983 के दीना बनाम भारत संघ मामले में तीन जजों की पीठ ने फांसी की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी थी। बाद में 1992 में संविधान पीठ ने भी इस फैसले को मंजूरी दी थी।
भारत में मौत की सजा का कानून क्या है?
भारत में मौत की सजा कानून में सबसे गंभीर दंडों में से एक है। भारतीय न्याय संहिता यानी बीएनएस, 2023 की धारा 4 में इसे सजा के एक रूप के तौर पर शामिल किया गया है। कुछ बेहद गंभीर अपराधों में अदालत मौत की सजा सुना सकती है। किसी व्यक्ति को मौत की सजा सुनाए जाने के बाद उसे तुरंत लागू नहीं किया जाता। इसके लिए कानूनी प्रक्रिया पूरी करनी होती है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी बीएनएसएस, 2023 की धारा 407 के अनुसार, सेशन कोर्ट द्वारा सुनाई गई मौत की सजा की हाईकोर्ट से पुष्टि कराना जरूरी है। हाईकोर्ट सजा की पुष्टि कर सकता है, उसे बदल सकता है या दोषी को बरी कर सकता है। अगर हाईकोर्ट मौत की सजा बरकरार रखता है तो दोषी के पास सुप्रीम कोर्ट में अपील और पुनर्विचार जैसे कानूनी विकल्प भी होते हैं। इसके बाद दया याचिका का रास्ता भी उपलब्ध होता है।
मौत की सजा देने की प्रक्रिया
बीएनएसएस की धारा 393(5) के मुताबिक, मौत की सजा के आदेश में दोषी को गर्दन से तब तक फांसी देने का निर्देश होता है, जब तक उसकी मृत्यु न हो जाए। यानी भारत में कानून में निर्धारित तरीका फांसी है। यही वह प्रावधान है जिसे मौजूदा याचिका में चुनौती दी गई थी।
भारत में मौत की सजा का इतिहास कितना पुराना है?
भारत में मौत की सजा का इतिहास काफी पुराना है। विधि आयोग की 35वीं रिपोर्ट, 1967 के अनुसार, अलग-अलग दौर में अपराधों और उन्हें दी जाने वाली सजाओं के नियम बदलते रहे हैं।
मुगल काल में क्या नियम था?
मुस्लिम आपराधिक कानून में हत्या को अलग-अलग श्रेणियों में बांटा गया था। जानबूझकर की गई हत्या को गंभीर अपराध माना जाता था और कुछ परिस्थितियों में इसके लिए मौत की सजा का प्रावधान था।
हत्या के मामलों में मृतक के परिजनों की भूमिका भी महत्वपूर्ण थी। अगर मृतक के करीबी रिश्तेदार हत्यारे को माफ कर देते थे और खून के बदले मिलने वाले मुआवजे यानी दियत को स्वीकार कर लेते थे, तो मौत की सजा से बचने की स्थिति बन सकती थी।
मौत की सजा केवल हत्या तक सीमित नहीं थी। कुछ अन्य गंभीर अपराधों में भी मृत्युदंड का प्रावधान था। इनमें कुछ परिस्थितियों में बार-बार चोरी और ऐसी डकैती जिसमें हत्या भी हुई हो, शामिल थे।
ब्रिटिश शासन आया तो क्या बदला?
ब्रिटिश शासन की शुरुआत के बाद मुस्लिम आपराधिक कानून को तुरंत पूरी तरह नहीं बदला गया। शुरुआती दौर में ब्रिटिश प्रशासन ने इसमें सीमित हस्तक्षेप की नीति अपनाई और कुछ बदलाव किए।
1772 में डकैती रोकने के लिए एक प्रावधान किया गया था, जिसके तहत डकैतों को उनके गांव में फांसी देने की व्यवस्था की गई थी। हालांकि, डकैतों के परिवार और गांव वालों को दी जाने वाली अतिरिक्त सजा बाद में लागू होना बंद हो गईं।
इसके बाद ब्रिटिश शासन में भारत के आपराधिक कानून को व्यवस्थित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। इसी क्रम में भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी, 1860 आई। इसमें कई गंभीर अपराधों के लिए मौत की सजा का प्रावधान किया गया। हत्या के अलावा सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ना, सेना में विद्रोह के लिए उकसाना, निर्दोष व्यक्ति को फांसी दिलाने वाली झूठी गवाही और हत्या के साथ डकैती जैसे अपराधों में भी मृत्युदंड का प्रावधान था।
फांसी कब बनी मौत की सजा का तरीका?
मौत की सजा देने के लिए फांसी का इस्तेमाल भी पुरानी कानूनी व्यवस्था का हिस्सा रहा है। पुराने प्रावधानों में दोषी को गर्दन से लटकाकर मौत की सजा देने का उल्लेख मिलता है। बाद के कानूनी ढांचे में भी फांसी का यह तरीका जारी रहा। 1967 तक भारत में मौत की सजा फांसी के जरिए दी जाती थी। उस समय यह सवाल भी उठाया गया था कि मृत्युदंड बरकरार रहने की स्थिति में इसे लागू करने के तरीके में कोई बदलाव किया जाना चाहिए या नहीं।
आजादी के बाद क्या हुआ?
1947 में भारत आजाद हुआ, लेकिन मौत की सजा खत्म नहीं की गई। आजादी के बाद भी मृत्युदंड भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था का हिस्सा रहा और इससे जुड़े मामले अदालतों में आते रहे।
नवाब सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि उचित मामलों में मौत की सजा के अमल में अत्यधिक देरी सजा कम करने का आधार बन सकती है। हालांकि, इसे कोई सामान्य कानूनी नियम नहीं माना गया।
फांसी के तरीके पर पहले भी सवाल उठे
मौत की सजा को लेकर बहस सिर्फ इसे बनाए रखने या खत्म करने तक सीमित नहीं रही। यह सवाल भी उठता रहा कि अगर मृत्युदंड बरकरार रहता है तो इसे किस तरीके से लागू किया जाए। उस समय फांसी के तरीके को लेकर सुझाव मांगे गए थे। इसके साथ यह सवाल भी रखा गया था कि क्या कुछ वर्गों, जैसे बच्चों और महिलाओं, को मौत की सजा से बाहर रखा जाना चाहिए।
2024 में कितने लोगों को मौत की सजा दी गई?
एनसीआरबी के प्रिजन स्टैटिस्टिक्स इंडिया रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में देश में कुल 193 लोगों को मौत की सजा दी गई। मौत की सजा पाने वाले इन लोगों में से सबसे ज्यादा 76 लोग उत्तर प्रदेश से थे। इसी दौरान 84 दोषियों की मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया गया।
लीथल इंजेक्शन क्या है और कैसे असर करता है?
लीथल इंजेक्शन यानी घातक इंजेक्शन मौत की सजा लागू करने की एक विधि है। इसमें नस के जरिए ऐसी दवाएं दी जाती हैं जिनका असर धीरे-धीरे शरीर की जरूरी गतिविधियों को बंद करने तक पहुंचता है। इसमें हर जगह एक जैसी दवाएं इस्तेमाल नहीं होतीं।अमेरिका में अलग-अलग समय और राज्यों में अलग-अलग तरीके अपनाए गए हैं।
पुराने तीन-दवा वाले तरीके में मुख्य रूप से:
- सोडियम थायोपेंटल: गहरी बेहोशी पैदा करता है।
- पैनक्यूरोनियम ब्रोमाइड: सांस लेने वाली मांसपेशियों की गतिविधि रोकता है।
- पोटैशियम क्लोराइड: हृदय की गतिविधि को रोकता है।
बाद में कुछ जगहों पर पेंटोबार्बिटल का इस्तेमाल शुरू हुआ। अमेरिका की संघीय सरकार ने 2026 में भी पेंटोबार्बिटल आधारित प्रोटोकॉल को फिर से अपनाया है। डेथ पेनल्टी इंफॉर्मेशन सेंटर की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में लीथल इंजेक्शन सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला मृत्युदंड लागू करने का तरीका रहा है। 1976 के बाद से अमेरिका में 1,482 निष्पादन लीथल इंजेक्शन के जरिए हुए हैं। अमेरिका के अलावा चीन और वियतनाम में भी मृत्युदंड के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है।
दुनिया में मृत्युदंड देने के दूसरे तरीके क्या-क्या हैं?
- गोली मारना: कुछ देशों में मृत्युदंड देने के लिए गोली मारने का तरीका अपनाया जाता है।
- सिर कलम करना: सऊदी अरब में सिर कलम करने का तरीका इस्तेमाल किया जाता है।
- नाइट्रोजन गैस से दम घुटना: अमेरिका के कुछ राज्यों में नाइट्रोजन गैस से दम घुटने का तरीका मृत्युदंड देने के तरीकों में शामिल है।
- बिजली की कुर्सी: अमेरिका के कुछ राज्यों में बिजली की कुर्सी यानी इलेक्ट्रोक्यूशन अभी भी कानूनी विकल्प है।
- जहरीली गैस: अमेरिका के कुछ राज्यों में जहरीली गैस भी मृत्युदंड देने की कानूनी विधियों में शामिल है।
सुप्रीम कोर्ट ने भविष्य के लिए क्या रास्ता खुला रखा?
सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा याचिका खारिज करते हुए फांसी को बदलने की मांग स्वीकार नहीं की, लेकिन अदालत ने यह भी साफ किया कि भविष्य में इस मुद्दे पर विचार पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। अगर आगे मजबूत वैज्ञानिक, चिकित्सकीय या अनुभवजन्य प्रमाण सामने आते हैं और यह साबित होता है कि 1983 के दीना फैसले का वैज्ञानिक या तथ्यात्मक आधार महत्वपूर्ण रूप से बदल चुका है, तो संवैधानिक समीक्षा की जा सकती है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार विशेषज्ञों की समिति बनाकर मौजूदा तरीके की व्यापक समीक्षा कर सकती है। इस समिति में कानून, फॉरेंसिक मेडिसिन, न्यूरोसाइंस, दंड व्यवस्था और दूसरे संबंधित क्षेत्रों के विशेषज्ञ शामिल हो सकते हैं।
2023 में भी उठा था यही सवाल
यह पहली बार नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट के सामने फांसी के विकल्प का सवाल आया हो। 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा था कि क्या फांसी से ज्यादा मानवीय और कम पीड़ादायक विकल्प तलाशे जा सकते हैं। इसके बाद अटॉर्नी जनरल ने अदालत को बताया था कि सरकार विशेषज्ञ समिति बनाने पर विचार कर रही है।