UP: क्या कांशीराम को सम्मान देकर दलितों को लुभा सकेंगे अखिलेश, मायावती ने क्यों लगाई फटकार?
समाजवादी पार्टी बसपा के संस्थापक कांशीराम की जयंती (15 मार्च) को पीडीए दिवस के रूप में मनाने जा रही है। अखिलेश यादव द्वारा पार्टी पदाधिकारियों को भेजे गए पत्र में इस दिन प्रदेश के सभी जिलों में श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित करने का निर्देश दिया गया है।
विस्तार
समाजवादी पार्टी बसपा के संस्थापक कांशीराम की जयंती (15 मार्च) को पीडीए दिवस के रूप में मनाने जा रही है। अखिलेश यादव द्वारा पार्टी पदाधिकारियों को भेजे गए पत्र में इस दिन प्रदेश के सभी जिलों में श्रद्धांजलि सभाएं आयोजित करने का निर्देश दिया गया है। इसे सपा के द्वारा दलित वोटों को अपने पाले में लामबंद करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक (पीडीए) वोटों को आंशिक तौर पर साथ लाने में सफल रही थी। इससे सपा 37 सीटों पर जीत हासिल कर प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बन गई। अखिलेश यादव अब इसी फॉर्मूले को और मजबूती देकर 2027 में यूपी में सत्ता में आने की योजना बना रहे हैं। यदि अखिलेश यादव लोकसभा चुनाव वाला करिश्मा दोहरा पाते हैं तो इससे प्रदेश के सियासी समीकरण बदल सकते हैं, लेकिन क्या नई परिस्थितियों में उनकी यह कोशिश कामयाब होगी? क्या मायावती के दुबारा मजबूती से चुनाव मैदान में उतरने के बीच सपा 2024 वाली सफलता दोहरा सकेगी?
अखिलेश यादव अपने नेताओं-कार्यकर्ताओं के साथ-साथ दलित समुदाय के लोगों के बीच यह चर्चा कराना चाहते हैं कि समाजवादी पार्टी और कांशीराम के बीच संबंध पुराना रहा है। 1992 के राम मंदिर प्रकरण के बाद जिस समय भाजपा अजेय समझी जा रही थी, सपा-बसपा ने हाथ मिला लिया और प्रदेश की सियासत बदल गई। कांशीराम ने दलित-पिछड़ी जातियों को साथ लाने में अहम भूमिका निभाई और उनकी इसी करिश्माई कारीगरी ने मुलायम सिंह यादव को प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ कर दिया। अखिलेश यादव अब दलित मतदाताओं के बीच कांशीराम के उन्हीं कार्यों की याद दिलाते हुए एक बार फिर एक जिताऊ समीकरण बनाने की कोशिश में हैं। इसके लिए उन्होंने कांशीराम जयंती को ही हथियार बनाया है।
मायावती ने बताया सियासी नौटंकी
लेकिन हाल के दिनों में बेहद मजबूती से वापसी करती दिखाई पड़ रही बसपा नेता मायावती ने अखिलेश यादव की इस कोशिश को एक 'सियासी नौटंकी' करार दिया है। उन्होंने लखनऊ के 'गेस्ट हाउस कांड' की याद दिलाते हुए अपने कार्यकर्ताओं-मतदाताओं को यह बताने की कोशिश की है कि समाजवादी पार्टी कभी दलितों की हितैषी नहीं रही।
बहुजन नेता मानते हैं कि उस दौर में भी सपा ने सियासी लाभ के लिए कांशीराम का उपयोग किया था, लेकिन जैसे ही उनकी सियासत खतरे में पड़ती दिखाई दी, सपा नेताओं ने दलितों की सबसे बड़ी नेता मायावती पर शर्मनाक हमला कराने से भी गुरेज नहीं किया। इस कांड की याद दिलाते हुए मायावती अपने कोर दलित वोट बैंक को सपा की ओर जाने से रोकना चाहती हैं।
अखिलेश को क्यों मिला था दलितों का साथ
दरअसल, 2024 के लोकसभा चुनाव के जिस समीकरण को अखिलेश यादव दोहराने की कोशिश कर रहे हैं, उसके कई कारण थे। पहला तो यह कि मायावती पिछले कुछ समय से राजनीतिक तौर पर अपेक्षाकृत कम सक्रिय हो गई थीं। इससे कहीं न कहीं बसपा समर्थक मतदाताओं में यह बात घर करने लगी कि अब उन्हें कोई नया राजनीतिक विकल्प तलाशना चाहिए। इस विकल्प की तलाश में दलितों का एक वोट बैंक भाजपा के पास चला गया तो कुछ वोट बैंक सपा के खाते में आ गया।
लेकिन इसके साथ ही एक सत्य यह भी है कि पिछले लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ा बदलाव राहुल गांधी की उस कोशिश के बाद आया जिसमें उन्होंने यह आरोप लगाया था कि भाजपा 400 सीटें जीतकर संविधान बदलना चाहती है। स्वयं भाजपा के कुछ नेताओं ने आपत्तिजनक बयान देकर इस भ्रम को और मजबूत बनाने का काम किया था। आरोप है कि राहुल गांधी के इन आरोपों ने दलित समाज के एक वर्ग में भाजपा के प्रति आशंका पैदा कर दी जिसके कारण वे इंडिया गठबंधन यानी सपा-कांग्रेस के पास आ गए। इससे यूपी का सियासत पूरी तरह बदल गई। यूपी में भाजपा चारों खाने चित हो गई और सपा-कांग्रेस को अप्रत्याशित सफलता मिली।
मायावती के रहते आसान नहीं ये काम
अखिलेश यादव इसी समीकरण को एक बार फिर दोहराने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में कई ऐसे कारण हैं जिससे यह राह आसान नहीं दिखती। इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि मायावती एक बार फिर पूरी ताकत के साथ सक्रिय होती दिखाई दे रही हैं। लखनऊ में बड़ी रैली कर उन्होंने उन्हें खत्म समझने वाले राजनीतिक विरोधियों को बड़ा सियासी संदेश दिया है। इससे बसपा कार्यकर्ता उत्साहित होकर एक बार फिर सक्रिय हो गए हैं और बसपा को जिताने के लिए जमीन पर उतर चुके हैं। मायावती की सक्रियता के बीच सपा को पिछली सफलता मिल पाएगी, ऐसा होना आसान नहीं दिखता।
दूसरी बात, लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी संविधान के मुद्दे पर दलित मतदाताओं को अपने साथ लाने में सफल रहे थे, लेकिन इस बार इंडिया गठबंधन के हाथ फिलहाल ऐसा कोई बड़ा मुद्दा हाथ में दिख नहीं रहा है जिससे कि 2024 जैसी लहर पैदा की जा सके। राहुल गांधी ने केंद्र में सरकार को घेरने की कोशिश अवश्य की है, यूपी में भी कई समीकरण भाजपा सरकार के खिलाफ जाते दिख रहे हैं, लेकिन कांग्रेस या सपा को इसका कितना लाभ मिल पाएगा, अभी कहा नहीं जा सकता।
दलित मतदाताओं की पहली पसंद कौन
राजनीति वैज्ञानिक मानते हैं कि सपा को अनुसूचित जातियों का साथ तभी मिलेगा, जब उनका अपना कोई बड़ा नेता दूसरे दल के साथ चुनाव मैदान में मौजूद नहीं होगा। मायावती के मैदान में रहने की स्थिति में अनुसूचित जातियों के लोगों का पहला झुकाव उनके अपने समुदाय के नेता की ओर होता है। दूसरी बात, भाजपा भी 2024 लोकसभा चुनाव की गलती सुधारने की कोशिश करती दिखाई दे रही है। इससे भी सपा की राह मुश्किल भरी हो सकती है।
कांशीराम पर केवल बसपा का अधिकार नहीं- सपा
समाजवादी पार्टी की नेता सुमैया राना ने अमर उजाला से कहा कि उनकी पार्टी पीडीए की बात करती है, और सत्ता में रहने पर या विपक्ष के एक जिम्मेदार दल के रूप में वह पीडीए की आवाज उठाने का काम करती है। उन्होंने कहा कि कांशीराम ने समाज के दबे-कुचले लोगों के लिए काम किया था, उनकी आवाज मजबूत करने का काम किया था, और समाजवादी पार्टी उनके उन्हीं आदर्शों को आगे बढ़ाने का काम कर रही है।
सुमैया राना ने कहा कि कांशीराम देश की धरोहर हैं। उन पर किसी एक पार्टी या एक वर्ग का अधिकार नहीं है। उनके नेता अखिलेश यादव सभी बड़े नेताओं का सम्मान करने की बात करते हैं। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी पूरे प्रदेश में कांशीराम की जयंती को पूरे धूमधाम से मनाएगी।
अनुसूचित वर्ग इंडिया गठबंधन के साथ- कांग्रेस
उत्तर प्रदेश कांग्रेस उपाध्यक्ष विश्व विजय सिंह ने अमर उजाला से कहा कि कांशीराम ने अपने पूरे जीवन में दलितों-पिछड़ों और गरीबों को ताकत देने के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ी थी। उन्होंने दबे-कुचले वर्ग को शक्ति देने का काम किया था। वे उस वर्ग की आवाज बनकर उभरे थे जिसके बारे में कोई बात नहीं करता था। उन्होंने आर्थिक तौर पर कमजोर लोगों को न केवल आर्थिक ताकत दी, बल्कि उसे समाज के बीज ज्यादा प्रभावशाली और उपयोगी बनाया। ऐसे में इस तरह के नेता का सम्मान हर वर्ग और हर पार्टी को करना चाहिए।
विश्व विजय सिंह ने कहा कि कांशीराम ने समाज के जिस वर्ग के लिए आवाज उठाई थी, आज उस वर्ग की आवाज उठाने के लिए सबसे ज्यादा काम राहुल गांधी और कांग्रेस कर रही है। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी के उन्हीं कार्यों को देखते हुए दलित वर्गों के बीच कांग्रेस को लेकर भरोसा बढ़ा है। पिछले लोकसभा चुनाव में यह बात दिखाई पड़ी थी। उन्होंने दावा किया कि आगे भी इसी तरह अनुसूचित जाति वर्ग के लोगों का साथ इंडिया गठबंधन के साथ बना रहेगा।
सपा-कांग्रेस की कलई खुली, अनुसूचित वर्ग मोदी-योगी के साथ- भाजपा
भाजपा प्रवक्ता अनुरुद्ध प्रताप सिंह ने अमर उजाला से कहा कि देश के अनुसूचित वर्ग ने यह देख लिया है कि समाजवादी पार्टी के पीडीए का अर्थ केवल 'परिवार डलवपमेंट अलायंस' होता है। उन्होंने कहा कि यदि अखिलेश यादव को कांशीराम के सिद्धांतों में जरा भी विश्वास होता तो समाजवादी पार्टी के लोग मायावती के साथ गेस्ट हाउस कांड जैसी अभद्रता न करते। मायावती ने अपने मुख्यमंत्री रहते हुए जिन जिलों का नाम भीम के नाम पर रखा था, उसे भी इन्हीं अखिलेश यादव ने स्वयं मुख्यमंत्री बनने के बाद हटा दिया था। इसी से साफ समझ आ जाता है कि सपा दलितों का कितना सम्मान करती है।
उन्होंने आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस कभी दलितों का सम्मान नहीं करते। बाबा साहब अंबेडकर और बाबू जगजीवन राम का अपमान कांग्रेस ने किया था। अखिलेश यादव आज भी किसी दलित समाज के व्यक्ति को अपनी पार्टी का अध्यक्ष नहीं बना सकते क्योंकि उनकी पार्टी में केवल उन्हीं के परिवार का कब्जा है। उन्होंने कहा कि ऐसे में दलितों के सम्मान की बात करना केवल दिखावा है, इसमें कोई सच्चाई नहीं है।
काम के कारण मोदी-योगी होंगे दलितों की पहली पसंद
अनुरुद्ध प्रताप सिंह ने कहा कि देश का दलित समुदाय यह देख रहा है कि पिछले 11-12 वर्षों से केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार हर मोर्चे पर दलितों का उत्थान करने में जुटी हुई है। सपा सत्ता में आने पर केवल अपने परिवार को ताकत देने का काम करती है, जबकि भाजपा सत्ता में आने के बाद दलितों को आवास देने, शिक्षा देने और उन्हें आर्थिक ताकत देने का काम करती है। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस-सपा-बसपा की कोई कोशिश काम नहीं आएगी और दलित मतदाताओं की पहली पसंद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ही होंगे।
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