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Supreme Court: लिव-इन में रहने वाली महिला को भी मिलेगा IPC 498A का संरक्षण; सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
Mon, 03 Aug 2026 04:22 PM IST
प्रशांत तिवारी
पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली
Published by: प्रशांत तिवारी
Updated Mon, 03 Aug 2026 04:22 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए कहा है कि यदि कोई लिव-इन रिलेशनशिप 'शादी जैसे रिश्ते' की श्रेणी में आती है, तो उसमें रहने वाली महिला के साथ क्रूरता करने पर पुरुष के खिलाफ IPC की धारा 498A के तहत मुकदमा चलाया जा सकेगा। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह व्याख्या केवल धारा 498A तक सीमित रहेगी और गिरफ्तारी से पहले प्रारंभिक जांच अनिवार्य होगी।
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सुप्रीम कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A का दायरा बढ़ाते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता से संबंधित यह प्रावधान उन लिव-इन रिलेशनशिप पर भी लागू होगा, जो 'शादी जैसे रिश्ते' (In the Nature of Marriage) की श्रेणी में आते हैं। न्यायालय के अनुसार, ऐसे मामलों में महिला के साथ क्रूरता करने वाले पुरुष के खिलाफ भी धारा 498A के तहत मुकदमा चलाया जा सकेगा।
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किन लिव-इन रिश्तों पर लागू होगी धारा 498A?
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने स्पष्ट किया कि धारा 498A केवल उन्हीं लिव-इन रिलेशनशिप पर लागू होगी, जो वास्तव में 'शादी जैसे रिश्ते' हों। अदालत ने कहा कि ऐसे रिश्तों में विवाह करने का इरादा संबंध का एक महत्वपूर्ण तत्व होना चाहिए। पीठ ने यह भी कहा कि यह सुरक्षा केवल दो सहमति से साथ रहने वाले बालिग व्यक्तियों के बीच बने रिश्तों पर ही लागू होगी।
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क्या यह व्याख्या अन्य कानूनी धाराओं पर भी लागू होगी?
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि धारा 498A की यह विस्तारित व्याख्या केवल इसी प्रावधान तक सीमित रहेगी। इसका प्रभाव भारतीय दंड संहिता या किसी अन्य कानून की किसी दूसरी धारा पर नहीं पड़ेगा।
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गिरफ्तारी को लेकर अदालत ने क्या कहा?
शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में गिरफ्तारी और अन्य कानूनी कार्रवाई से जुड़े सभी सुरक्षा प्रावधानों का सख्ती से पालन किया जाएगा। यदि किसी 'शादी जैसे' लिव-इन रिलेशनशिप में महिला के साथ क्रूरता का आरोप लगाया जाता है, तो आरोपी व्यक्ति या उसके रिश्तेदार को बिना प्रारंभिक जांच के गिरफ्तार नहीं किया जाएगा।
रिश्तों और कानून पर सुप्रीम कोर्ट की क्या टिप्पणी रही?
अदालत ने कहा कि कोई भी व्यक्ति यह सोचकर किसी रिश्ते में नहीं जाता कि उसके साथ भविष्य में क्रूरता होगी। सामान्यतः जब दो लोग साथ जीवन शुरू करते हैं तो उनका उद्देश्य सुखद और सम्मानजनक जीवन जीना होता है। लेकिन समय के साथ कुछ रिश्ते ऐसे मोड़ पर पहुंच जाते हैं, जहां कानूनी संरक्षण की आवश्यकता पड़ती है। इसलिए कानून में ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए पर्याप्त प्रावधान होना चाहिए।
अनुच्छेद 14 का हवाला देते हुए अदालत ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 498A के तहत सुरक्षा के मामले में 'विवाहित महिला' और "शादी जैसे लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला" के बीच अंतर करना घरेलू हिंसा रोकने के उद्देश्य से तार्किक नहीं है। अदालत के अनुसार, ऐसा भेदभाव संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित समानता के अधिकार का उल्लंघन करता है।
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यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा?
यह फैसला उस कानूनी प्रश्न पर सुनवाई के दौरान दिया गया कि क्या लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले पुरुष के खिलाफ भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 498A के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है। इस महत्वपूर्ण निर्णय के साथ सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि यदि लिव-इन संबंध "शादी जैसे रिश्ते" की कसौटी पर खरा उतरता है, तो उसमें रहने वाली महिला को भी धारा 498A के तहत वही कानूनी संरक्षण मिलेगा, जो एक विवाहित महिला को प्राप्त है।