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Bengal: महिलाओं की बंपर वोटिंग से उलझी बंगाल की सियासी गुत्थी, मतदान में पुरुषों को 2.5 फीसदी से पीछे छोड़ा
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सार
प्रतिशत की दृष्टि से भले ही राज्य में मतदान के सारे पुराने कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए हैं, मगर हकीकत में इस चुनाव में लोकसभा के मुकाबले 29.41 लाख कम लोगों ने वोट किए हैं। हालांकि लोकसभा की तुलना में एसआईआर के कारण मतदाताओं की संख्या में 68 लाख की कमी आई है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव
- फोटो : ANI
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विस्तार
पश्चिम बंगाल का इस बार का विधानसभा चुनाव महज राजनीतिक दावों का नहीं, बल्कि टूटे हुए रिकॉर्ड्स का गवाह बन रहा है। एक तरफ जहां तृणमूल और भाजपा सार्वजनिक मंचों के जरिये अपनी जीत के प्रति आश्वस्ति का भाव प्रदर्शित कर रहे हैं, वहीं अंदरखाने इनमें एक गहरी बेचैनी और मंथन का दौर जारी है।
चुनावी इतिहास में पहली बार पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का ढाई फीसदी अधिक मतदान और ग्रामीण व शहरी दोनों क्षेत्रों में 90 प्रतिशत से ज्यादा वोटिंग इस बात का साफ संकेत है कि इस बार बंगाल की जनता ने खामोशी से कोई बड़ा फैसला लिख दिया है। मसलन राज्य के चुनावी इतिहास में रिकॉर्डतोड़ संख्या में मतगणना केंद्र पहुुंची महिला अपनी सुरक्षा के मामले में ममता सरकार से नाराज थी या कन्याश्री, रूपाश्री, लक्ष्मी भंडार योजना के लिए सरकार को अभयदान देने पहुंची थी। पहली बार ग्रामीणों की तर्ज पर मतदान करने वाले शहरी मतदाता तृणमूल के बंगाल अस्मिता के मोहपाश में बंधे थे या बेरोजगारी- जनसांख्यिकी बदलाव से संंबंधित भाजपा के आक्रामक प्रचार के प्रभाव में थे।
महिला भागीदारी ने तोड़े सारे कीर्तिमान
पश्चिम बंगाल में 2011 के चुनाव के पहले तक लोकसभा और विधानसभा के सभी चुनावों में महिलाएं मतदान के मामले में पुरुषों से पीछे रही हैं। 2011 के बाद महिलाओं के मतप्रतिशत में बढ़ोत्तरी तो हुई मगर यह कभी भी .50 फीसदी से ज्यादा नहीं रही। हालांकि इस चुनाव में महिलाएं (93.24 फीसदी) पुरुषों (91.74%) पर पूरी तरह हावी रही। भाजपा का दावा है कि महिलाओं का बढ़ा मत प्रतिशत आरजीकर कांड के बाद असुरक्षा के भावना से उपजी परिस्थिति है जबकि तृणमूल का दावा है कि महिला वर्ग आधी आबादी केंद्रित योजनाओं के प्रभाव में सरकार की रक्षा के लिए आगे आई हैं।
शहरी बनाम ग्रामीण का भी टूटा भ्रम
अन्य राज्यों की भांति पश्चिम बंगाल में भी शहरी मतदाता आम तौर पर मतदान के प्रति विमुख रहे हैं। हालांकि इस बार शहरी मतदाताओंं ने मतदान के मामले में ग्रामीण मतदाताओं के साथ कदमताल किया है। राज्य में पहली बार शहरी और ग्रामीण मतदाताओं का मतदान प्रतिशत करीब-करीब बराबर रहा है। शहरी क्षेत्रों में आजादी के बाद पहली बार 90 फीसदी से अधिक मतदान दर्ज किया गया है।
लोकसभा की तुलना में कम मतदान
प्रतिशत की दृष्टि से भले ही राज्य में मतदान के सारे पुराने कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए हैं, मगर हकीकत में इस चुनाव में लोकसभा के मुकाबले 29.41 लाख कम लोगों ने वोट किए हैं। हालांकि लोकसभा की तुलना में एसआईआर के कारण मतदाताओं की संख्या में 68 लाख की कमी आई है।
टिकट वितरण पर दोनों पक्षों में आशंका
भाजपा में टिकट वितरण के बाद करीब पांच दर्जन सीटों से उम्मीदवारों के संदर्भ में शिकायत आई। टीएमसी में भी संख्या इतनी ही है। यही कारण है कि पीएम मोदी और ममता दोनों ने जनसभाओं में हर सीट पर खुद को ही उम्मीदवार बताया।
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महिला भागीदारी ने तोड़े सारे कीर्तिमान
पश्चिम बंगाल में 2011 के चुनाव के पहले तक लोकसभा और विधानसभा के सभी चुनावों में महिलाएं मतदान के मामले में पुरुषों से पीछे रही हैं। 2011 के बाद महिलाओं के मतप्रतिशत में बढ़ोत्तरी तो हुई मगर यह कभी भी .50 फीसदी से ज्यादा नहीं रही। हालांकि इस चुनाव में महिलाएं (93.24 फीसदी) पुरुषों (91.74%) पर पूरी तरह हावी रही। भाजपा का दावा है कि महिलाओं का बढ़ा मत प्रतिशत आरजीकर कांड के बाद असुरक्षा के भावना से उपजी परिस्थिति है जबकि तृणमूल का दावा है कि महिला वर्ग आधी आबादी केंद्रित योजनाओं के प्रभाव में सरकार की रक्षा के लिए आगे आई हैं।
शहरी बनाम ग्रामीण का भी टूटा भ्रम
अन्य राज्यों की भांति पश्चिम बंगाल में भी शहरी मतदाता आम तौर पर मतदान के प्रति विमुख रहे हैं। हालांकि इस बार शहरी मतदाताओंं ने मतदान के मामले में ग्रामीण मतदाताओं के साथ कदमताल किया है। राज्य में पहली बार शहरी और ग्रामीण मतदाताओं का मतदान प्रतिशत करीब-करीब बराबर रहा है। शहरी क्षेत्रों में आजादी के बाद पहली बार 90 फीसदी से अधिक मतदान दर्ज किया गया है।
लोकसभा की तुलना में कम मतदान
प्रतिशत की दृष्टि से भले ही राज्य में मतदान के सारे पुराने कीर्तिमान ध्वस्त कर दिए हैं, मगर हकीकत में इस चुनाव में लोकसभा के मुकाबले 29.41 लाख कम लोगों ने वोट किए हैं। हालांकि लोकसभा की तुलना में एसआईआर के कारण मतदाताओं की संख्या में 68 लाख की कमी आई है।
टिकट वितरण पर दोनों पक्षों में आशंका
भाजपा में टिकट वितरण के बाद करीब पांच दर्जन सीटों से उम्मीदवारों के संदर्भ में शिकायत आई। टीएमसी में भी संख्या इतनी ही है। यही कारण है कि पीएम मोदी और ममता दोनों ने जनसभाओं में हर सीट पर खुद को ही उम्मीदवार बताया।
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