प्रो. बीएस सहाय से खास बातचीत: 'पश्चिमी बिजनेस माॅडल के दिन बीत गए, हम ग्लोबल लीडर तैयार करने में सक्षम'
आईआईएम जम्मू के संस्थापक निदेशक प्रो. बीएस सहाय ने इंटरव्यू में बताया कि संस्थान सिर्फ मैनेजमेंट छात्रों को नहीं, बल्कि राष्ट्रहित और नेतृत्व क्षमता से भरपूर लीडर तैयार कर रहा है। संस्थान की स्थापना 2016 में 47 छात्रों से हुई थी, जो अब 1400 छात्रों तक पहुंच चुका है और भारतीय ज्ञान व संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए आनंदम सेंटर भी चलाया जा रहा है।
विस्तार
प्रो. बीएस सहाय आईआईएम जम्मू के संस्थापक निदेशक हैं। दो साै एकड़ में फैला संस्थान अब भव्य आकार ले चुका है और इसी वर्ष अपना दसवां वर्ष पूरा करने जा रहा है। बात जब संस्थान की उपलब्धियों और फ्यूचर प्लान को गिनाने की आती है तो वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पंचमंत्र को दोहाराते हुए कहते हैं-टैलेंट, ट्रेडिशन, टूरिज्म, ट्रेड और टेक्नोलाॅजी हमारी ताकत हैं। वे गर्व से कहते हैं कि संस्थान भावी प्रबंधक ही नहीं, देश के लिए समर्पित, जोखिम लेने वाले और राष्ट्र हित की भावना से भरे लीडर तैयार कर रहा है। संस्थान की उपलब्धियों, भविष्य के रोडमैप के साथ ही ईरान-इस्राइल-अमेरिका युद्ध से उपजे हालात में भारत की बढ़ती भूमिका पर अमर उजाला के महेंद्र तिवारी ने उनसे बात की। पेश हैं बातचीत के प्रमुख अंश...
जम्मू में आईआईएम को लाने का उद्देश्य क्या था, स्थापना से लेकर अब तक की यात्रा कैसी रही?
देश में अभी 21 भारतीय प्रबंधन संस्थान हैं। शुरुआत कोलकाता और अहमदाबाद में पहले दो संस्थानों की स्थापना के साथ हुई थी। इसके बाद बंगलूरू और लखनऊ आए और कारवां बढ़ता गया। देश में बेहतरीन प्रबंधन शिक्षा प्रदान करने के लिए इन संस्थानों की स्थापना योजना आयोग की सिफारिशों पर की गई थीं। आईआईएम की संख्या बढ़ने से काफी बदलाव आए। देश के आर्थिक विकास के लिए प्रबंधन कौशल की आवश्यकता अब समझ में आ रही है। यदि वक्त पर ध्यान नहीं दिया गया होता तो एक वैक्यूम पैदा हो जाता। अगस्त 2016 में आईआईएम जम्मू की स्थापना हुई। 47 छात्रों से शुरू हुआ कारवां आज 1400 तक पहुंच गया है। सभी राज्यों से बच्चे यहां आकर पढ़ रहे हैं। आईआईएम जम्मू एक मिनी भारत है।
संवेदनशील जम्मू में संभावनाएं
जम्मू सीमावर्ती इलाका है। पाकिस्तान से सटा होने के कारण ज्यादा संवेदनशील है। दुश्मन को हम बदल नहीं सकते पर भारत में वो नेतृत्व क्षमता है जो हर स्थिति से निपटने में सक्षम है। एक उदाहरण देना चाहूंगा। बात पुलवामा हमले के समय की है। उस वक्त 140 बच्चों को कंबाइंड एप्टीट्यूड टेस्ट (कैट) में सफलता मिली थी। एडमिशन के दिन 95 बच्चे आए जिनमें एक भी लड़की नहीं थी। यह सोचने वाली बात थी। आज की तारीख में हमारे संस्थान में 50 फीसदी लड़कियां पढ़ रही हैं। कैंपस पूरी तरह से सुरक्षित है।
आनंदम सेंटरः भारतीय ज्ञान को छात्रों तक पहुंचा रहा है
हमारी सबसे बड़ी ताकत हमारी संस्कृति और सभ्यता है। एक दौर ऐसा भी रहा जब इन सबको भुला दिया गया था। मौजूदा सरकार की कोशिशें ने हमारी ताकत वापस दिलाई है। इसी कड़ी में यहां आनंदम सेंटर की स्थापना की गई। इसका मकसद भारतीय ज्ञान को हर छात्र तक पहुंचाना है।
नई पीढ़ी प्राॅफिट एंड लाॅस को लेकर आगे बढ़ रही है। आप क्या सोचते हैं?
देखिए, प्राॅफिट बहुत जरूरी है। पैसा ही नहीं होगा तो लोग काम क्यों करेंगे। पर, पैसा ही सबकुछ हो ये सोच नहीं होनी चाहिए। आनंदम सेंटर खोलने के पीछे ‘सर्वे भवंतु सुखिन:’ का मूल मंत्र है। एआई समिट की भी टैगलाइन यही थी। जी-20 का भी मंत्र था- वसुधैव कुटुंबकम। यह भारत की ही सोच है कि हम सबके कल्याण की बात करते हैं। कोरोना के समय में पूरे विश्व में हाहाकार था। भारत ने यहां फिर खुद को साबित किया और 100 से अधिक देशों की मदद की। मैत्रीपूर्ण व्यवहार बनाने में समय लगता है और इसे सबको समझने की जरूरत है।
पश्चिम के मैनेजमेंट माॅडल से हम कैसे अलग हैं
आजादी के बाद एक काॅमन लैंग्वेज की परिकल्पना की गई थी। दुर्भाग्यवश ऐसा हो नहीं सका। जो लोग विदेश गए उनमें से अधिकांश ने खुद को भारतीय के बजाय साहब माना। सौभाग्य से कुछ ऐसे भी रहे जिन्होंने पूरे विश्व को भारतवर्ष के महत्व का अहसास कराया। हमें अपनी संस्कृति और ज्ञान को महत्व देना होगा। हमने अपने यहां लाइब्रेरी का नाम नालंदा इसी उद्देश्य से रखा, ताकि लोग जानें कि नालंदा का क्या महत्व था। हर एक क्लास रूम का नाम ऋषियों के नाम पर है। हर क्लासरूम के बाहर क्यूआर कोड लगा है जिसे स्कैन कर हम उस नाम की अहमियत जान सकते हैं।
सरकार के साथ कर रहे कदमताल
सेंटर फॉर इनोवेशन एंड ट्रांसफॉर्मेशन इन गवर्नेंस आईआईएम और प्रदेश सरकार के योजना, विकास व निगरानी विभाग की एक संयुक्त पहल है। यह केंद्र जम्मू-कश्मीर में शासन को डिजिटल बनाने, डेटा-आधारित निर्णय लेने और ‘विकसित भारत 2047’ के विजन के अनुरूप सतत विकास के लिए काम कर रहा है। इसमें 28 लोग काम करते हैं।
एआई से नौकरी जाने की सोच ही बेकार है
हमें हर ज्ञान को आत्मसात करने की जरूरत है। एआई को जानना, उसे समझना आज के वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है। एआई की वजह से नौकरी चली जाएगी, यह एक बेकार की सोच है। नौकरी उनकी जाएगी जो काम नहीं कर रहे या जिनमें सीखने की ललक नहीं है।
एआई समिट में फ्रांस के राष्ट्रपति ने 10 साल पहले से तुलना करते हुए भारत के यूपीआई सिस्टम की सराहना की थी। उन्होंने कहा था कि यहां के स्ट्रीट वेंडर अपने मोबाइल से पैसा ट्रांसफर कर सकते हैं। आज 20 से अधिक देश इस तकनीक को इस्तेमाल करने के लिए आगे आए हैं।
ऊर्जा का दुरुपयोग करने से बचें
ईरान-इस्राइल-अमेरिका के बीच युद्ध के चलते यह निर्णायक दौर है। यह सच है कि दुनिया की 20 फीसदी ऊर्जा उधर के रास्तों से आती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब सौर ऊर्जा की बात की थी तो कुछ लोग हंसे थे। हमें समझना होगा कि क्यों सौर ऊर्जा या वैकल्पिक ऊर्जा की बात की जा रही है। हाइड्रोजन से हम क्यों वाहन चलाना चाहते हैं... हमें वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोत तलाशने होंगे। पूरी दुनिया में पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ रहे हैं। भारत कीमतें नियंत्रित रखने में सक्षम है। सिर्फ प्रीमियम पर दो रुपये बढ़ाया गया है। जनता पर कीमतों का बोझ नहीं डाला गया है। एनर्जी का सदुपयोग जरूरी है। हमें प्राकृतिक स्रोतों के दुरुपयोग का कोई अधिकार नहीं है। हमें भारत सरकार के साथ खड़े रहना होगा।
राष्ट्र सर्वोपरि
मेरा मानना है कि राष्ट्र सर्वोपरि है। अगर किसी में यह भाव नहीं है तो इसका मतलब है कि कमी हमारे भीतर है। पहले राष्ट्र के बारे में सोचना होगा, फिर संस्था और अंत में अपने बारे में। हम इसी नीति पर आगे बढ़ रहे हैं। 10 हजार साल पहले किए गए ऋषियों के शोध आज भी हमारा आधार हैं। एक दौर था जब हम अपनी परंपरा, रीति-रिवाज के बारे में कुछ कहने में हिचकते थे। आज गर्व से हम इनकी बातें कर रहे हैं, उन्हें जी रहे हैं। आज यह फर्क महसूस किया जा सकता है। हम विश्व गुरु थे, हैं और रहेंगे।
एचआर अब रणनीतिक साझेदार
आज के डिजिटल और प्रतिस्पर्धी दौर में एचआर की भूमिका पारंपरिक प्रशासनिक कार्यों से आगे बढ़कर रणनीतिक साझेदार की हो गई है। यह न केवल प्रतिभाओं की भर्ती और पे रोल का प्रबंधन करता है बल्कि कंपनी की संस्कृति, कर्मचारी के जुड़ाव, डिजिटल परिवर्तन और व्यावसायिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अब कंपनी के बोर्ड तक में इनकी मौजूदगी होती है।
कंपनियों को रिस्क मैनेजमेंट सीखना होगा
एचआर का काम नियुक्ति के साथ ही कर्मचारी को अपने साथ बनाए रखना है। कर्मचारी का विकास कैसे हो, इस पर उनको फोकस करना होगा। कोई कंपनी यदि यह सोचती है कि हम तैयार करेंगे और वे चले जाएंगे तो उसको अपने भविष्य को लेकर सोचना चाहिए। यह एक रिस्क मैनेजमेंट है। कोई छोड़कर जाता भी है तो दूसरी कंपनी में काम तो करेगा ही। वसुधैव कुटुंबकम हमारा मूल सिद्धांत है। जो स्किल सीख कर जाएगा उसका दूसरी जगह इस्तेमाल तो करेगा ही।
कुछ अलग सोचना और करना होगा
हम उस दिन का इंतजार कर रहे हैं जब एक रुपया एक डॉलर के बराबर होगा। वह दिन दूर नहीं है, हमें आशावादी होकर काम करना होगा। हम जो कह रहे हैं उसको सुनकर बहुत से लोगों को आश्चर्य हो सकता है। हमें इनोवेशन और टेक्नोलाॅजी पर फोकस करना होगा। हर वो नया काम करना होगा जो पूरा विश्व नहीं कर पा रहा है। तभी पूरा विश्व हमारा बाजार होगा।
एक ही कंपनी से रिटायर होने का जमाना गया
जिस कंपनी से शुरुआत की उसी से रिटायर होने का जमाना गया। योग्यता के पैमाने पर लोग नौकरियां बदल रहे हैं। कंपनियों को भी सोचना होगा कि टैलेंट को रोकने के लिए, बनाए रखने के लिए वे क्या कर रही हैं। आज के दौर में किसी का एक कंपनी में दो साल तक टिक कर काम करना बहुत बड़ी बात है। जाॅब सैटिस्फैक्शन पैसे से ज्यादा महत्वपूर्ण है।
हम लोकल नहीं...ग्लोबल लीडर हैं
हमारे यहां एडमिशन के कुछ नियम हैं। दुनिया के बच्चे यहां नहीं हैं, पर हमारा बाहर के देशों के संस्थानों के साथ संपर्क और समझौता है। हमारे छात्र और फैकल्टी दोनों बाहर जाते हैं। उनको भी प्रशिक्षित किया जाता है। दुनिया को समझना जरूरी है, उसके साथ कदमताल करना जरूरी है। हम लोकल नहीं, ग्लोबल प्लेयर हैं। दुनिया में कुछ भी हो, भारत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। आज जो ईरान और अमेरिका के बीच चल रहा है, उसमें यहां तक कहा जा रहा है कि यदि कोई अहम भूमिका निभा सकता है तो वो भारत है।
हस्तशिल्प सहेज रहे
आईआईएम जम्मू क्षेत्र के पारंपरिक हस्तशिल्प और कला को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहा है। बसोहली कला जैसी स्थानीय विरासतों पर हम कार्यशालाएं आयोजित करते हैं। सिर्फ कलाकार ही नहीं बल्कि हमारा स्टाफ और स्टूडेंट्स इसका हिस्सा बनते हैं।
दूरदर्शिता, ईमानदारी और आत्मविश्वास लीडरशिप के लिए जरूरी
स्टूडेंट्स में लीडरशिप क्वालिटी विकसित करनी है तो पहले खुद रोल माॅडल बनें। स्किल तो सीखी जा सकती है, पर एटीट्यूड को सही रखना जरूरी है। लीडरशिप की मुख्य क्वालिटी में दूरदर्शिता, ईमानदारी, आत्मविश्वास, टीम को प्रेरित करने की क्षमता और सहानुभूति शामिल हैं।
नई शिक्षा नीति का प्रभाव
नई नीति ने बंधनों को तोड़ा है और काम करने के नए आयाम विकसित किए हैं। इसने सारी जरूरतों को एक ही छत के नीचे पूरा करने में मदद की है। हमारे लिए अवसरों के द्वार खोले हैं।
2026 से 2030 तक 100 फीसदी प्लेसमेंट का लक्ष्य
आईआईएम जम्मू आगामी पांच वर्षों (2026-2030) के लिए एक महत्वाकांक्षी रोडमैप पर काम कर रहा है। हमारा उद्देश्य विश्व स्तरीय शिक्षा, अनुसंधान और उद्यमिता को बढ़ावा देना है। कैंपस के पूर्ण विकास के साथ-साथ अकादमिक उत्कृष्टता के माध्यम से 100 प्रतिशत प्लेसमेंट रिकॉर्ड बनाए रखना शामिल है।
प्लेसमेंट के अवसर और स्टार्टअप की चुनौतियां
आईआईएम जम्मू तीसरी पीढ़ी का संस्थान है, इसके बावजूद हमारे छात्रों को प्लेसमेंट की चुनौतियों का सामना नहीं करना पड़ता है। स्टार्टअप की चुनौतियां अब नहीं हैं। 50-50 लाख रुपये तक का लोन मिल रहा है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप ईकोसिस्टम है, जिसमें 1.59 लाख से अधिक मान्यता प्राप्त स्टार्टअप्स हैं। ‘स्टार्टअप इंडिया’ के तहत ये देश के विकास, 16.6 लाख से अधिक प्रत्यक्ष नौकरियों और महिला उद्यमिता को बढ़ावा दे रहे हैं। भविष्य में एआई, डीपटेक और विनिर्माण पर जोर के साथ भारत एक प्रमुख वैश्विक नवाचार केंद्र बनने की राह पर है।
पांच वर्षों में देश के शीर्ष बिजनेस स्कूलों में शामिल होगा आईआईएम जम्मू
जम्मू-कश्मीर भारत का ऐसा केंद्र शासित प्रदेश है जहां संभावनाएं तो अपार हैं, पर उन तक पहुंचने के लिए चुनौतियों के बीच से रास्ता निकालना होता है। एक तरफ आतंक तो दूसरी ओर आपदाओं के जोखिम यहां इम्तिहान लेते हैं। प्रदेश को लेकर देश-दुनिया में गढ़े जा चुके नैरेटिव के बीच लोगों के दिलों में अपने लिए भरोसा जगा ले जाना सामान्य बात नहीं है। पर, भारतीय प्रबंध संस्थान जम्मू ने यह कर दिखाया। महज 47 स्टूडेंट्स के साथ जम्मू के कैनाल रोड कैंपस में शुरू हुआ भारतीय प्रबंध संस्थान आज 1400 का आंकड़ा छू रहा है। आईआईएम जम्मू के संस्थापक निदेशक प्रो. बीएस सहाय बता रहे हैं कि कैसे संस्थान जेन जी को नई दिशा देने के साथ ही राष्ट्र प्रथम की चेतना का संचार कर रहा है।
दुनिया के टाॅप 100 बिजनेस स्कूल में शामिल होने के लिए कर रहे काम
सहाय कहते हैं कि इसी साल अगस्त में आईआईएम जम्मू दस साल का हो जाएगा। महज इतने ही वर्षों के सफर में हमने तीन प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मान्यताओं में से दो हासिल कर ली हैं। संस्थान ने बिजनेस ग्रेजुएट्स एसोसिएशन (बीजीए) से पांच साल की संस्थागत मान्यता और एमबीए कार्यक्रम के लिए यूरोपियन फाउंडेशन फॉर मैनेजमेंट डेवलपमेंट (ईएफएमडी) से तीन साल के कार्यक्रम की मान्यता प्राप्त की है। इस दोहरी मान्यता के साथ आईआईएम जम्मू उन 21 आईआईएम में से शीर्ष पांच में शामिल हो गया है जिनके पास बीजीए और ईएफएमडी दोनों मान्यताएं हैं। अब हम तीसरी मान्यता हासिल करेंगे। इसी के साथ हम देश के शीर्ष 25 और दुनिया के शीर्ष 100 बिजनेस स्कूलों में शामिल होने के लिए काम कर रहे हैं।
इस साल दो नए प्रोग्राम शुरू करने की तैयारी, एआई और ई-बीबीए पढ़ने का मिलेगा मौका
प्रो. सहाय कहते हैं, आईआईएम का मुख्य प्रोग्राम एमबीए है। इसके बाद हमने पीएचडी शुरू की। पांच साल का इंटीग्रेटेड प्रोग्राम शुरू किया। तीन साल का बीबीए और दो साल का एमबीए। कोरोना के समय में एम्स शुरू नहीं हुआ था। लिहाजा आईआईटी के साथ मिलकर हमने एमबीए इन हेल्थ केयर एंड हाॅस्पिटल मैनेजमेंट कोर्स शुरू किया।
इस साल हम एशियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलाॅजी बैंकाॅक के साथ मैनेजमेंट इन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस प्रोग्राम शुरू कर रहे हैं। इसमें एक साल बच्चे यहां पढ़ेंगे तो दूसरे साल बैंकाॅक में। दूसरा प्रोग्राम उन बच्चों के लिए है जो कैट क्वालिफाई नहीं कर पाते हैं। उद्योग जगत के साथ सहयोग बढ़ाने के लिए एक्सेंचर जैसी प्रमुख कंपनियों के साथ एमओयू पर हस्ताक्षर किए हैं। यह चार साल का ई-बीबीए प्रोग्राम है जो हाइब्रिड मोड पर होगा। इसमें 60 फीसदी पढ़ाई क्लासरूम में होगी और 40 फीसदी एक्सेंचर प्रैक्टिकल एक्सपोजर देगा।
ग्लोबल बेस्ड कंपनियों को बड़ी संख्या में मैनपावर की जरूरत है। हमारी कोशिश होगी कि जो बच्चे इस कार्यक्रम को जॉइन करें उन्हें रोजगार के अवसर मिलें। इसमें हम संख्या बल ज्यादा रखेंगे ताकि ज्यादा से ज्यादा बच्चों को सपोर्ट मिल सके।
जम्मू से निकलेंगे ग्लोबल लीडर
प्रो. सहाय कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकसित भारत के संकल्प को साकार करने के लिए पंचमंत्र दिए हैं। ये पांच स्तंभ हैं-टैलेंट, ट्रेडिशन, टूरिज्म, ट्रेड और टेक्नोलॉजी। हम ग्लोबल लीडर तैयार कर रहे हैं। छात्र नौकरी करने जाएं या बड़े पदों पर जाएं तो राष्ट्र की पहचान को कायम रखें, हम ऐसे बीज बोने की कोशिश कर रहे हैं।
थ्योरी और प्रैक्टिकल नाॅलेज के साथ भारतीय ज्ञान भी हमारे कॅरिकुलम का हिस्सा
सब्जेक्ट का नाॅलेज बहुत जरूरी है। थ्योरी और प्रैक्टिकल नाॅलेज के साथ परंपरा, संस्कृति और राष्ट्रीय संस्कारों को भी जानना जरूरी है। दुनिया के सभी बड़ी संस्थाओं में उच्च पदों पर भारतीय हैं और वे अपना बेस्ट दे रहे हैं। हार्वर्ड बिजनेस स्कूल समेत कई प्रमुख संस्थानों में भारतीय अहम पदों पर हैं। होता यह है कि हम अपनी पहचान को पहचान नहीं पाते हैं। अब वो दौर है जब हम खुद को न केवल पहचान पा रहे हैं बल्कि अपनी योग्यता के दम पर पूरी दुनिया हमें मान दे रही है।
जेन जी आलसी नहीं...बेचैन है
जेन जी आलसी नहीं बल्कि बेचैन है। जेन जी में जल्दी परिणाम पाने की आकांक्षा है जिसे सही मेंटरशिप के माध्यम से एक सकारात्मक और स्थायी प्रभाव में बदलने की आवश्यकता है। केंद्र सरकार ने इस बात को समझा। इसीलिए कौशल विकास मंत्रालय की स्थापना की गई। जरूरी नहीं कोई ग्रेजुएशन करे। कौशल विकास जरूरी है। जब यह होगा तो कोई भूखा नहीं मरेगा, हर युवा को एक दिशा मिलेगी।
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