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Srinagar News: घाटी में बंद हुआ हिंसा का दौर, अनुच्छेद 370 हटने के बाद 85 फीसदी तक घटीं आतंकी घटनाएं
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पथराव पर लगा ब्रेक, कड़े सुरक्षा प्रबंधों, टेरर फंडिंग पर नकेल और एलओसी पर कड़ाई से बदला माहौल, 2015 से 2023 के आंकड़ों में दिखा अंतर
अमृतपाल सिंह बाली
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में पांच अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 और 35 ए हटाए जाने के बाद से सुरक्षा परिदृश्य में एक व्यापक और ऐतिहासिक बदलाव देखा गया है। वर्ष 2015 से 2023 तक के आंकड़े बताते हैं कि अनुच्छेद 370 हटने से पहले जहां घाटी में हिंसा का ग्राफ तेजी से चढ़ रहा था, वहीं इसके बाद सुरक्षा स्थिति में अभूतपूर्व सुधार हुआ। वर्ष 2018 में 614 आतंकी घटनाएं हुई थीं, जबकि वर्ष 2023 में यह आंकड़ा गिरकर 94 रह गया। वर्ष 2023 में आतंकी हमलों में करीब 85 फीसदी तक की कमी हुई।
वर्ष 2015 में 208 आतंकी घटनाएं हुईं थीं, जिनमें 20 नागरिकों और 41 सुरक्षाकर्मियों की मौत हुई थी, जबकि 113 आतंकवादी मारे गए थे। वर्ष 2016 में बुरहान वानी के मारे जाने के बाद आतंकी घटनाओं में भारी इजाफा हुआ। 322 घटनाओं में 88 सुरक्षाबल शहीद हुए, 18 नागरिकों की मौत हुई और 165 आतंकवादी मारे गए। वर्ष 2017 में 342 घटनाएं हुईं, जिनमें 54 नागरिक और 83 सुरक्षाबलों की जान गई, जबकि 218 आतंकवादी भी मार गिराए गए। हिंसा का यह ग्राफ वर्ष 2018 में अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया, जब रिकॉर्ड 614 आतंकी घटनाएं हुईं, जिनमें 86 नागरिकों और 91 सुरक्षाकर्मियों की शहादत हुई, जबकि सुरक्षाबलों ने कार्रवाई करते हुए 271 आतंकियों को ढेर किया। पांच अगस्त 2019 से पहले पुलवामा हमले समेत 255 घटनाएं हुईं, जिनमें 44 नागरिकों और 80 सुरक्षाकर्मियों की जान गई, जबकि 157 आतंकवादियों को भी ढेर किया गया। 2015 से 2019 के बीच प्रतिवर्ष औसतन 70 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए थे। इसके अलावा हर शुक्रवार को पथराव की घटनाएं आम बात थी।
पांच अगस्त 2019 के बाद सुरक्षा परिदृश्य पूरी तरह बदल गया। वर्ष 2020 में आतंकी घटनाओं की संख्या घटकर 244 रह गई। इसमें 63 सुरक्षाकर्मियों और 38 आम नागरिकों की जान गई, जबकि 221 आतंकवादी मारे गए। वर्ष 2021 में 229 आतंकी घटनाएं घटीं, जिनमें 42 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए और 41 स्थानीय नागरिक मारे गए, जबकि 180 आतंकवादियों को सुरक्षा बलों ने मौत के घाट उतारा। वर्ष 2022 में यह आंकड़ा 242 घटनाओं और 32 सुरक्षाबलों की शहादत तक पहुंच गया। इस दौरान 31 स्थानीय नागरिक मारे गए और 187 आतंकवादियों को ढेर किया गया। वर्ष 2023 तक आते-आते यह ग्राफ अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया, पूरे साल में केवल 94 आतंकी घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें 14 नागरिकों की जान गई 30 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए। सुरक्षा बलों ने भी 73 आतंकवादियों को मार गिराया गया। वर्ष 2018 के मुकाबले 2023 में आतंकी घटनाओं में 85 फीसदी तक की गिरावट दर्ज की गई, जबकि संगठित पथराव और अलगाववादी बंद की घटनाएं पूरी तरह समाप्त हो गईं।
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गौरतलब है कि ग्राफ में आए इस बड़े बदलाव के मुख्य कारणों में सुरक्षा तंत्र का पुनर्गठन, टेरर फंडिंग पर कड़ी नकेल और सीमा पार से होने वाली घुसपैठ पर रोक शामिल है। अनुच्छेद 370 हटने के बाद सुरक्षाबलों को ''जीरो टॉलरेंस'' नीति के तहत काम करने की पूरी छूट मिली, जिससे स्थानीय पुलिस, सीआरपीएफ और सेना के बीच बेहतर समन्वय स्थापित हुआ। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) और राज्य जांच एजेंसी (एसआईए) ने अलगाववादी नेटवर्क, अवैध फंडिंग के रास्तों और ओवर ग्राउंड वर्कर्स (ओजीडब्ल्यू) के तंत्र को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर एंटी-इनफिल्ट्रेशन ग्रिड मजबूत होने से सीमा पार से होने वाली घुसपैठ न के बराबर रह गई। इसके साथ ही केंद्र सरकार ने युवाओं को खेल, शिक्षा, रोजगार और मुख्यधारा के विकास से जोड़ा, जिससे उनका अलगाववाद से मोहभंग हुआ। यद्यपि हताशा में आतंकवादियों ने अल्पसंख्यकों और गैर-स्थानीय मजदूरों को निशाना बनाकर ''टारगेट किलिंग'' जैसी रणनीति अपनाने की कोशिश की, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों के त्वरित एक्शन ने उनके इन मंसूबों को भी नाकाम कर दिया। आज कश्मीर शांति, रिकॉर्ड पर्यटन और बुनियादी ढांचे के अभूतपूर्व विकास के एक नए युग में प्रवेश कर चुका है।
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अनुच्छेद 370 के बाद ढेर हुए ''सुप्रीम कमांडर''
श्रीनगर। पांच अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में सुरक्षाबलों ने ''ऑपरेशन ऑल-आउट'' के तहत हिजबुल मुजाहिद्दीन के रियाज नायकू और डॉ. सैफुल्ला जैसे शीर्ष कमांडरों का सफाया कर आतंकी तंत्र की कमर तोड़ दी, जिससे संगठन पूरी तरह नेतृत्वहीन हो गए। सुरक्षा एजेंसियों ने आधुनिक तकनीक, मजबूत ह्यूमन इंटेलिजेंस और यूएपीए के जरिए ओवर ग्राउंड वर्कर्स (ओजीडब्ल्यू) पर शिकंजा कसकर आतंकियों का छिपने का ठिकाना और रसद तंत्र ध्वस्त कर दिया। शीर्ष नेतृत्व के खात्मे से 2020 के बाद किसी भी नए कमांडर का जीवनकाल महज कुछ हफ्तों का रह गया। इस हताशा में पाकिस्तान समर्थित आकाओं ने द रेजिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ - मूल संगठन: लश्कर ए तैयबा), पीपुल्स एंटी-फासिस्ट फ्रंट (पीएएफएफ - मूल संगठन: जैश ए मोहम्मद) और कश्मीर टाइगर्स (मूल संगठन: जैश ए मोहम्जैमद) जैसे शैडो संगठन बनाए, हालाँकि, सुरक्षाबलों की आक्रामक कार्रवाई से अब घाटी में न प्रशिक्षित नेतृत्व बचा है और न ही कैडर। आतंकवाद का ढांचा पूरी तरह चरमरा चुका है।
ये सुप्रीम कमांडर हुए ढेर
रियाज़ नायकू: मई 2020 में पुलवामा के बेगपोरा में हुए एनकाउंटर में हिजबुल मुजाहिद्दीन का मुख्य रणनीतिकार और टॉप कमांडर रियाज नायकू मारा गया।
सैफुल्ला मीर उर्फ ''डॉक्टर सैफुल्ला'': नायकू के मारे जाने के बाद हिजबुल का नया चीफ बना सैफुल्ला मीर नवंबर 2020 में श्रीनगर के रंगरेट इलाके में मुठभेड़ में मारा गया।
सज्जाद हैदर और उस्मान: अगस्त 2020 में बारामुला मुठभेड़ में लश्कर का मुख्य भर्तीकर्ता सज्जाद उर्फ हैदर और पाकिस्तानी कमांडर उस्मान ढेर हुए।
यासिर पर्रे और अबु सैफुल्ला: जनवरी 2022 में पुलवामा में जैश-ए-मोहम्मद का आईईडी विशेषज्ञ यासिर पर्रे और 2019 पुलवामा हमले से जुड़ा पाकिस्तानी आतंकी अबु सैफुल्ला (लंबू) मारा गया।
सलीम पर्रे और हमज़ा भाई: जनवरी 2022 में श्रीनगर के शालीमार में महज 15 मिनट के भीतर चले दो ऑपरेशनों में लश्कर के खूंखार कमांडर सलीम पर्रे और पाकिस्तानी आतंकी हमज़ा भाई को मार गिराया गया।
वर्ष 2018 में 614 और वर्ष 2023 में 94 हुई घटनाओं में कितने प्रतिशत की कमी हुई है।
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अमृतपाल सिंह बाली
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में पांच अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 और 35 ए हटाए जाने के बाद से सुरक्षा परिदृश्य में एक व्यापक और ऐतिहासिक बदलाव देखा गया है। वर्ष 2015 से 2023 तक के आंकड़े बताते हैं कि अनुच्छेद 370 हटने से पहले जहां घाटी में हिंसा का ग्राफ तेजी से चढ़ रहा था, वहीं इसके बाद सुरक्षा स्थिति में अभूतपूर्व सुधार हुआ। वर्ष 2018 में 614 आतंकी घटनाएं हुई थीं, जबकि वर्ष 2023 में यह आंकड़ा गिरकर 94 रह गया। वर्ष 2023 में आतंकी हमलों में करीब 85 फीसदी तक की कमी हुई।
वर्ष 2015 में 208 आतंकी घटनाएं हुईं थीं, जिनमें 20 नागरिकों और 41 सुरक्षाकर्मियों की मौत हुई थी, जबकि 113 आतंकवादी मारे गए थे। वर्ष 2016 में बुरहान वानी के मारे जाने के बाद आतंकी घटनाओं में भारी इजाफा हुआ। 322 घटनाओं में 88 सुरक्षाबल शहीद हुए, 18 नागरिकों की मौत हुई और 165 आतंकवादी मारे गए। वर्ष 2017 में 342 घटनाएं हुईं, जिनमें 54 नागरिक और 83 सुरक्षाबलों की जान गई, जबकि 218 आतंकवादी भी मार गिराए गए। हिंसा का यह ग्राफ वर्ष 2018 में अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया, जब रिकॉर्ड 614 आतंकी घटनाएं हुईं, जिनमें 86 नागरिकों और 91 सुरक्षाकर्मियों की शहादत हुई, जबकि सुरक्षाबलों ने कार्रवाई करते हुए 271 आतंकियों को ढेर किया। पांच अगस्त 2019 से पहले पुलवामा हमले समेत 255 घटनाएं हुईं, जिनमें 44 नागरिकों और 80 सुरक्षाकर्मियों की जान गई, जबकि 157 आतंकवादियों को भी ढेर किया गया। 2015 से 2019 के बीच प्रतिवर्ष औसतन 70 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए थे। इसके अलावा हर शुक्रवार को पथराव की घटनाएं आम बात थी।
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पांच अगस्त 2019 के बाद सुरक्षा परिदृश्य पूरी तरह बदल गया। वर्ष 2020 में आतंकी घटनाओं की संख्या घटकर 244 रह गई। इसमें 63 सुरक्षाकर्मियों और 38 आम नागरिकों की जान गई, जबकि 221 आतंकवादी मारे गए। वर्ष 2021 में 229 आतंकी घटनाएं घटीं, जिनमें 42 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए और 41 स्थानीय नागरिक मारे गए, जबकि 180 आतंकवादियों को सुरक्षा बलों ने मौत के घाट उतारा। वर्ष 2022 में यह आंकड़ा 242 घटनाओं और 32 सुरक्षाबलों की शहादत तक पहुंच गया। इस दौरान 31 स्थानीय नागरिक मारे गए और 187 आतंकवादियों को ढेर किया गया। वर्ष 2023 तक आते-आते यह ग्राफ अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया, पूरे साल में केवल 94 आतंकी घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें 14 नागरिकों की जान गई 30 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए। सुरक्षा बलों ने भी 73 आतंकवादियों को मार गिराया गया। वर्ष 2018 के मुकाबले 2023 में आतंकी घटनाओं में 85 फीसदी तक की गिरावट दर्ज की गई, जबकि संगठित पथराव और अलगाववादी बंद की घटनाएं पूरी तरह समाप्त हो गईं।
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बॉक्स
अनुच्छेद 370 के बाद ढेर हुए ''सुप्रीम कमांडर''
श्रीनगर। पांच अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू-कश्मीर में सुरक्षाबलों ने ''ऑपरेशन ऑल-आउट'' के तहत हिजबुल मुजाहिद्दीन के रियाज नायकू और डॉ. सैफुल्ला जैसे शीर्ष कमांडरों का सफाया कर आतंकी तंत्र की कमर तोड़ दी, जिससे संगठन पूरी तरह नेतृत्वहीन हो गए। सुरक्षा एजेंसियों ने आधुनिक तकनीक, मजबूत ह्यूमन इंटेलिजेंस और यूएपीए के जरिए ओवर ग्राउंड वर्कर्स (ओजीडब्ल्यू) पर शिकंजा कसकर आतंकियों का छिपने का ठिकाना और रसद तंत्र ध्वस्त कर दिया। शीर्ष नेतृत्व के खात्मे से 2020 के बाद किसी भी नए कमांडर का जीवनकाल महज कुछ हफ्तों का रह गया। इस हताशा में पाकिस्तान समर्थित आकाओं ने द रेजिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ - मूल संगठन: लश्कर ए तैयबा), पीपुल्स एंटी-फासिस्ट फ्रंट (पीएएफएफ - मूल संगठन: जैश ए मोहम्मद) और कश्मीर टाइगर्स (मूल संगठन: जैश ए मोहम्जैमद) जैसे शैडो संगठन बनाए, हालाँकि, सुरक्षाबलों की आक्रामक कार्रवाई से अब घाटी में न प्रशिक्षित नेतृत्व बचा है और न ही कैडर। आतंकवाद का ढांचा पूरी तरह चरमरा चुका है।
ये सुप्रीम कमांडर हुए ढेर
रियाज़ नायकू: मई 2020 में पुलवामा के बेगपोरा में हुए एनकाउंटर में हिजबुल मुजाहिद्दीन का मुख्य रणनीतिकार और टॉप कमांडर रियाज नायकू मारा गया।
सैफुल्ला मीर उर्फ ''डॉक्टर सैफुल्ला'': नायकू के मारे जाने के बाद हिजबुल का नया चीफ बना सैफुल्ला मीर नवंबर 2020 में श्रीनगर के रंगरेट इलाके में मुठभेड़ में मारा गया।
सज्जाद हैदर और उस्मान: अगस्त 2020 में बारामुला मुठभेड़ में लश्कर का मुख्य भर्तीकर्ता सज्जाद उर्फ हैदर और पाकिस्तानी कमांडर उस्मान ढेर हुए।
यासिर पर्रे और अबु सैफुल्ला: जनवरी 2022 में पुलवामा में जैश-ए-मोहम्मद का आईईडी विशेषज्ञ यासिर पर्रे और 2019 पुलवामा हमले से जुड़ा पाकिस्तानी आतंकी अबु सैफुल्ला (लंबू) मारा गया।
सलीम पर्रे और हमज़ा भाई: जनवरी 2022 में श्रीनगर के शालीमार में महज 15 मिनट के भीतर चले दो ऑपरेशनों में लश्कर के खूंखार कमांडर सलीम पर्रे और पाकिस्तानी आतंकी हमज़ा भाई को मार गिराया गया।
वर्ष 2018 में 614 और वर्ष 2023 में 94 हुई घटनाओं में कितने प्रतिशत की कमी हुई है।