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Srinagar News: अब पीने लायक नहीं रही मीठे पानी की झील
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अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। मध्य कश्मीर के गांदरबल जिले में स्थित प्रसिद्ध मीठे पानी की झील मानसबल में प्रदूषण का स्तर बेहद खतरनाक स्थिति में पहुंच गया है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की एक नई रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है। इसमें स्थानीय लोगों के बीच स्वास्थ्य को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हो गई हैं। यह झील गांदरबल और बांदीपोरा जिलों की एक बड़ी आबादी के लिए पीने के पानी का मुख्य स्रोत है। हाल ही में सीपीसीबी की ओर किए गए परीक्षणों से पुष्टि हुई है कि इस जल निकाय में मल-मूत्र, सीवेज का पानी और ठोस कचरा भारी मात्रा में मिला हुआ है।
पर्यावरण कार्यकर्ता राजा मुजफ्फर भट की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने इस वर्ष जनवरी में जांच का आदेश दिया था। याचिकाकर्ता का आरोप था कि लार नहर के माध्यम से 14 गांवों का अनुपचारित सीवेज और कीटनाशक सीधे मानसबल झील में बह रहे हैं, जिससे झील का पारिस्थितिकी तंत्र नष्ट हो रहा है। इसके बाद एनजीटी के निर्देशों का पालन करते हुए सीपीसीबी ने इस साल अप्रैल में झील के अलग-अलग हिस्सों से पानी के नमूने एकत्र करके इनकी जांच की थी।
सीपीसीबी की इस रिपोर्ट के निष्कर्ष बेहद भयावह हैं। सात नमूनों में से एक भी नमूना क्लास-बी श्रेणी के मानकों पर खरा नहीं उतरा, जिसका साफ मतलब है कि झील का पानी अब बाहरी तौर पर नहाने लायक भी नहीं बचा है। जांच किए गए सात नमूनों में मानसबल झील के चार, प्राकृतिक झरनों के दो और लार नहर का एक नमूना शामिल था। इनमें से पांच स्थानों के पानी को क्लास-डी श्रेणी में रखा गया है, यानी यह पानी केवल वन्यजीवों और मत्स्य पालन के लिए ही बचा है। केवल एक झरना क्लास-सी श्रेणी (उपचार के बाद पीने योग्य) के मानकों को पूरा कर सका, जबकि दूसरा झरना तो किसी भी श्रेणी में शामिल होने के योग्य नहीं पाया गया।
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जांच में फिकल और टोटल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया का स्तर काफी अधिक मिला है, जो इंसान और जानवरों के सीवेज से हुए प्रदूषण की पुष्टि करता है। हालांकि, राहत की बात यह रही कि अधिकतर भारी धातुएं जांच की सीमा से नीचे पाई गईं। सीपीसीबी ने निरीक्षण के दौरान पाया कि कोंडाबल क्षेत्र के आसपास किनारों पर प्लास्टिक और कचरा खुले में फेंका जा रहा है और आसपास के सात पड़ोसी गांवों का गंदा पानी बिना किसी ट्रीटमेंट के सीधे लार नहर के जरिए झील में गिर रहा है।
याचिकाकर्ता राजा मुजफ्फर भट ने इस पूरे मामले को अधिकारियों की आपराधिक लापरवाही करार दिया है। उन्होंने कहा कि सफापोरा के स्थानीय नागरिक सालों से पानी की बिगड़ती स्थिति को लेकर आवाज उठा रहे थे, लेकिन प्रशासन ने उनकी चेतावनियों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। सरकार ने झील को बचाने के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) लगाने का दावा किया था, लेकिन वह कभी जमीनी स्तर पर नहीं बन सका। आज लगभग 50 से 60 हजार लोगों को यही दूषित पानी पीने के लिए दिया जा रहा है, जो जनता की सेहत के साथ बड़ा खिलवाड़ है।
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श्रीनगर। मध्य कश्मीर के गांदरबल जिले में स्थित प्रसिद्ध मीठे पानी की झील मानसबल में प्रदूषण का स्तर बेहद खतरनाक स्थिति में पहुंच गया है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की एक नई रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है। इसमें स्थानीय लोगों के बीच स्वास्थ्य को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हो गई हैं। यह झील गांदरबल और बांदीपोरा जिलों की एक बड़ी आबादी के लिए पीने के पानी का मुख्य स्रोत है। हाल ही में सीपीसीबी की ओर किए गए परीक्षणों से पुष्टि हुई है कि इस जल निकाय में मल-मूत्र, सीवेज का पानी और ठोस कचरा भारी मात्रा में मिला हुआ है।
पर्यावरण कार्यकर्ता राजा मुजफ्फर भट की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने इस वर्ष जनवरी में जांच का आदेश दिया था। याचिकाकर्ता का आरोप था कि लार नहर के माध्यम से 14 गांवों का अनुपचारित सीवेज और कीटनाशक सीधे मानसबल झील में बह रहे हैं, जिससे झील का पारिस्थितिकी तंत्र नष्ट हो रहा है। इसके बाद एनजीटी के निर्देशों का पालन करते हुए सीपीसीबी ने इस साल अप्रैल में झील के अलग-अलग हिस्सों से पानी के नमूने एकत्र करके इनकी जांच की थी।
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सीपीसीबी की इस रिपोर्ट के निष्कर्ष बेहद भयावह हैं। सात नमूनों में से एक भी नमूना क्लास-बी श्रेणी के मानकों पर खरा नहीं उतरा, जिसका साफ मतलब है कि झील का पानी अब बाहरी तौर पर नहाने लायक भी नहीं बचा है। जांच किए गए सात नमूनों में मानसबल झील के चार, प्राकृतिक झरनों के दो और लार नहर का एक नमूना शामिल था। इनमें से पांच स्थानों के पानी को क्लास-डी श्रेणी में रखा गया है, यानी यह पानी केवल वन्यजीवों और मत्स्य पालन के लिए ही बचा है। केवल एक झरना क्लास-सी श्रेणी (उपचार के बाद पीने योग्य) के मानकों को पूरा कर सका, जबकि दूसरा झरना तो किसी भी श्रेणी में शामिल होने के योग्य नहीं पाया गया।
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जांच में फिकल और टोटल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया का स्तर काफी अधिक मिला है, जो इंसान और जानवरों के सीवेज से हुए प्रदूषण की पुष्टि करता है। हालांकि, राहत की बात यह रही कि अधिकतर भारी धातुएं जांच की सीमा से नीचे पाई गईं। सीपीसीबी ने निरीक्षण के दौरान पाया कि कोंडाबल क्षेत्र के आसपास किनारों पर प्लास्टिक और कचरा खुले में फेंका जा रहा है और आसपास के सात पड़ोसी गांवों का गंदा पानी बिना किसी ट्रीटमेंट के सीधे लार नहर के जरिए झील में गिर रहा है।
याचिकाकर्ता राजा मुजफ्फर भट ने इस पूरे मामले को अधिकारियों की आपराधिक लापरवाही करार दिया है। उन्होंने कहा कि सफापोरा के स्थानीय नागरिक सालों से पानी की बिगड़ती स्थिति को लेकर आवाज उठा रहे थे, लेकिन प्रशासन ने उनकी चेतावनियों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। सरकार ने झील को बचाने के लिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) लगाने का दावा किया था, लेकिन वह कभी जमीनी स्तर पर नहीं बन सका। आज लगभग 50 से 60 हजार लोगों को यही दूषित पानी पीने के लिए दिया जा रहा है, जो जनता की सेहत के साथ बड़ा खिलवाड़ है।