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Srinagar News: कश्मीर में एलओसी से सटे सीमावर्ती क्षेत्रों में अब डर नहीं, बढ़ रहा पर्यटन कारोबार
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श्रीनगर। कभी सीमा पार से होने वाली गोलाबारी और असुरक्षा के लिए जाने जाने वाले उत्तरी कश्मीर में नियंत्रण रेखा (एलओसी) से सटे सीमावर्ती गांव आज एक बड़े पर्यटन केंद्र के रूप में उभर रहे हैं।
जानकारी के अनुसार उत्तरी कश्मीर के केरन, माछिल, टीटवाल, तंगधार, गुरेज और बंगस घाटी जैसे दूर-दराज के इलाके देश भर से आने वाले पर्यटकों के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र बन चुके हैं। विशेष रूप से कुपवाड़ा जिले में किशनगंगा नदी के तट पर बसा केरन गांव कश्मीर का सबसे पसंदीदा बॉर्डर टूरिस्ट डेस्टिनेशन बन गया है।
किशनगंगा नदी भारत और पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा का काम करती है, जहां नदी के इस पार खड़े होकर पर्यटक सीमा पार (पीओके) के जीवन की एक दुर्लभ झलक देख सकते हैं। नदी के किनारों पर जुटे सैलानी अक्सर दूसरी तरफ के लोगों की ओर हाथ हिलाकर अभिवादन करते हैं और यहां के खूबसूरत जंगलों, पहाड़ों और बहते झरनों का आनंद लेते हैं।
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पर्यटकों की इस भारी आमद ने स्थानीय निवासियों के लिए आर्थिक समृद्धि के नए द्वार खोल दिए हैं। सीमा पर रहने वाले कई परिवारों ने अपने घरों को होमस्टे में बदल दिया है और पर्यटकों के लिए आधुनिक सुविधाएं विकसित की हैं।
केरन के एक स्थानीय युवक नसीम दुर्रानी जोकि अक्सर अपने इस क्षेत्र को बढ़ावा देने का प्रयास करते रहते हैं, ने बताया कि स्थानीय लोगों ने गुलमर्ग और पहलगाम जैसे स्थापित पर्यटन स्थलों से बहुत कुछ सीखा है। उन्होंने अपने घरों को खूबसूरती से सजाया है, होमस्टे तैयार किए हैं और पर्यटकों को आस-पास के खूबसूरत इलाकों की सैर कराने के लिए घोड़ों की सवारी की व्यवस्था भी की है। उन्होंने कहा कि दशकों तक संघर्ष के साए में जीने वाले सीमांत वासियों के लिए अब पर्यटन आजीविका का सबसे बड़ा साधन बन चुका है।
साल 2021 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए संघर्ष विराम समझौते के बाद यहां स्थिरता आई है, जिससे पर्यटन और विकास को एक नई दिशा मिली है। नसीम बताते हैं कि आज से कुछ साल पहले इस इलाके में कभी कोई आने की सोच भी नहीं सकता था लेकिन भारतीय सेना के सहयोग से आज यहां के स्थानीय युवा अपने पैरों पर खड़े होने के काबिल हो गए हैं। इस क्षेत्र में बॉर्डर टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए सेना द्वारा कई बड़े प्रयास किए गए हैं।
उन्होंने बताया कि स्थानीय लोगों के साथ साथ पर्यटक अब आते हैं। प्रतिदिन करीब 300 पर्यटक यहां आते हैं और यहां से पीओके के नज़ारे देख एक अनोखा अनुभव साथ ले जाते हैं। नसीम ने बताया कि सेना ने यहां आने वाले पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए एलओसी पर किशनगंगा नदी के किनारे ओपन एयर थिएटर भी रखा है जिससे वह एक अनोखा अनुभव करते हैं। उन्होंने लोगों से अपील की कि वह यहां आएं और यहां के दिलकश और अनोखी यादें साथ लेकर जाएं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस साल अब तक उत्तरी कश्मीर के सीमावर्ती पर्यटन स्थलों पर 4.30 लाख से अधिक पर्यटक पहुंच चुके हैं। इनमें से अकेले कुपवाड़ा जिले के विभिन्न क्षेत्रों में लगभग तीन लाख सैलानी आए जबकि गुरेज में 60,000 और उड़ी सेक्टर में करीब 70,000 पर्यटकों की आमद दर्ज की गई। केरन और करनाह के अलावा बंगस घाटी, लोलाब, मछिल, टीटवाल, तंगधार और तुलेल घाटी जैसी अनछुई जगहें भी पर्यटकों को अपनी ओर खींच रही हैं।
इस पर्यटन उछाल से स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं और परिवहन, घोड़ा सवारी व आतिथ्य सत्कार जैसे छोटे व्यवसायों को काफी बढ़ावा मिला है।
जानकारी के अनुसार उत्तरी कश्मीर के केरन, माछिल, टीटवाल, तंगधार, गुरेज और बंगस घाटी जैसे दूर-दराज के इलाके देश भर से आने वाले पर्यटकों के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र बन चुके हैं। विशेष रूप से कुपवाड़ा जिले में किशनगंगा नदी के तट पर बसा केरन गांव कश्मीर का सबसे पसंदीदा बॉर्डर टूरिस्ट डेस्टिनेशन बन गया है।
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किशनगंगा नदी भारत और पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा का काम करती है, जहां नदी के इस पार खड़े होकर पर्यटक सीमा पार (पीओके) के जीवन की एक दुर्लभ झलक देख सकते हैं। नदी के किनारों पर जुटे सैलानी अक्सर दूसरी तरफ के लोगों की ओर हाथ हिलाकर अभिवादन करते हैं और यहां के खूबसूरत जंगलों, पहाड़ों और बहते झरनों का आनंद लेते हैं।
पर्यटकों की इस भारी आमद ने स्थानीय निवासियों के लिए आर्थिक समृद्धि के नए द्वार खोल दिए हैं। सीमा पर रहने वाले कई परिवारों ने अपने घरों को होमस्टे में बदल दिया है और पर्यटकों के लिए आधुनिक सुविधाएं विकसित की हैं।
केरन के एक स्थानीय युवक नसीम दुर्रानी जोकि अक्सर अपने इस क्षेत्र को बढ़ावा देने का प्रयास करते रहते हैं, ने बताया कि स्थानीय लोगों ने गुलमर्ग और पहलगाम जैसे स्थापित पर्यटन स्थलों से बहुत कुछ सीखा है। उन्होंने अपने घरों को खूबसूरती से सजाया है, होमस्टे तैयार किए हैं और पर्यटकों को आस-पास के खूबसूरत इलाकों की सैर कराने के लिए घोड़ों की सवारी की व्यवस्था भी की है। उन्होंने कहा कि दशकों तक संघर्ष के साए में जीने वाले सीमांत वासियों के लिए अब पर्यटन आजीविका का सबसे बड़ा साधन बन चुका है।
साल 2021 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए संघर्ष विराम समझौते के बाद यहां स्थिरता आई है, जिससे पर्यटन और विकास को एक नई दिशा मिली है। नसीम बताते हैं कि आज से कुछ साल पहले इस इलाके में कभी कोई आने की सोच भी नहीं सकता था लेकिन भारतीय सेना के सहयोग से आज यहां के स्थानीय युवा अपने पैरों पर खड़े होने के काबिल हो गए हैं। इस क्षेत्र में बॉर्डर टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए सेना द्वारा कई बड़े प्रयास किए गए हैं।
उन्होंने बताया कि स्थानीय लोगों के साथ साथ पर्यटक अब आते हैं। प्रतिदिन करीब 300 पर्यटक यहां आते हैं और यहां से पीओके के नज़ारे देख एक अनोखा अनुभव साथ ले जाते हैं। नसीम ने बताया कि सेना ने यहां आने वाले पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए एलओसी पर किशनगंगा नदी के किनारे ओपन एयर थिएटर भी रखा है जिससे वह एक अनोखा अनुभव करते हैं। उन्होंने लोगों से अपील की कि वह यहां आएं और यहां के दिलकश और अनोखी यादें साथ लेकर जाएं।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस साल अब तक उत्तरी कश्मीर के सीमावर्ती पर्यटन स्थलों पर 4.30 लाख से अधिक पर्यटक पहुंच चुके हैं। इनमें से अकेले कुपवाड़ा जिले के विभिन्न क्षेत्रों में लगभग तीन लाख सैलानी आए जबकि गुरेज में 60,000 और उड़ी सेक्टर में करीब 70,000 पर्यटकों की आमद दर्ज की गई। केरन और करनाह के अलावा बंगस घाटी, लोलाब, मछिल, टीटवाल, तंगधार और तुलेल घाटी जैसी अनछुई जगहें भी पर्यटकों को अपनी ओर खींच रही हैं।
इस पर्यटन उछाल से स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं और परिवहन, घोड़ा सवारी व आतिथ्य सत्कार जैसे छोटे व्यवसायों को काफी बढ़ावा मिला है।