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Srinagar News: हाईकोर्ट ने 4,000 रुपये की रिश्वत के मामले में पूर्व अधिकारी की सजा बरकरार रखी
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संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार के एक मामले में स्टेट फॉरेस्ट कॉर्पोरेशन के एक पूर्व अधिकारी की सजा को बरकरार रखा है। कोर्ट ने कहा कि रिश्वत के पैसे की बरामदगी और रिश्वत मांगने व लेने के भरोसेमंद सबूत, उसकी सजा को सही ठहराने के लिए काफी थे।
जस्टिस संजय धर की बेंच ने फलील उर रहमान की अपील खारिज कर दी। उन्होंने श्रीनगर के एंटी-करप्शन स्पेशल जज के 2020 के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसमें उन्हें प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट और रणबीर पीनल कोड की धारा 161 के तहत दोषी ठहराया गया था।
यह मामला मार्च 2008 का है, जब एक शिकायतकर्ता ने विजिलेंस ऑर्गनाइजेशन कश्मीर से संपर्क किया और आरोप लगाया कि पीसी डिपो, परिमपोरा के तत्कालीन इंचार्ज ने उसके नाम मंजूर हो चुकी 50 सीएफटी लकड़ी जारी करने के लिए 7,500 रुपये की मांग की थी। बाद में बातचीत के बाद यह मांग 4,000 रुपये तय हुई।
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विजिलेंस ऑर्गनाइजेशन ने एक ट्रैप (जाल) बिछाया, जिसके दौरान आरोपी ने कथित तौर पर रिश्वत के नोट लिए। पैसे उसकी पैंट की पिछली जेब से बरामद किए गए जबकि उसके हाथों और जेब पर किए गए सोडियम कार्बोनेट टेस्ट के नतीजे पॉजिटिव आए, जिससे पता चला कि उसका रिश्वत के नोटों से संपर्क हुआ था।
हाईकोर्ट ने अपील करने वाले की इस दलील को खारिज कर दिया कि अभियोजन पक्ष मुकदमा चलाने की मंजूरी साबित करने में नाकाम रहा। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल के दौरान कोई आपत्ति नहीं उठाई गई थी और न्याय में कोई कमी नहीं पाई गई थी। कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग और उसे लेने की बात साबित करने में नाकाम रहा क्योंकि शैडो गवाह ने शिकायतकर्ता की बात की पूरी तरह पुष्टि नहीं की थी।
कोर्ट ने कहा कि रिश्वत के हर मामले में शिकायतकर्ता के बयान की पुष्टि होना जरूरी नहीं है। कोर्ट ने माना कि अगर शिकायतकर्ता का बयान भरोसेमंद हो और आस-पास की परिस्थितियों से मेल खाता हो, तो उस पर भरोसा किया जा सकता है।
कोर्ट ने अपीलकर्ता को निर्देश दिया कि वह बाकी सजा काटने के लिए तीन हफ्ते के अंदर ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करे, ऐसा न करने पर उसे हिरासत में लेने के लिए सख़्त कदम उठाए जाएंगे।
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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार के एक मामले में स्टेट फॉरेस्ट कॉर्पोरेशन के एक पूर्व अधिकारी की सजा को बरकरार रखा है। कोर्ट ने कहा कि रिश्वत के पैसे की बरामदगी और रिश्वत मांगने व लेने के भरोसेमंद सबूत, उसकी सजा को सही ठहराने के लिए काफी थे।
जस्टिस संजय धर की बेंच ने फलील उर रहमान की अपील खारिज कर दी। उन्होंने श्रीनगर के एंटी-करप्शन स्पेशल जज के 2020 के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसमें उन्हें प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट और रणबीर पीनल कोड की धारा 161 के तहत दोषी ठहराया गया था।
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यह मामला मार्च 2008 का है, जब एक शिकायतकर्ता ने विजिलेंस ऑर्गनाइजेशन कश्मीर से संपर्क किया और आरोप लगाया कि पीसी डिपो, परिमपोरा के तत्कालीन इंचार्ज ने उसके नाम मंजूर हो चुकी 50 सीएफटी लकड़ी जारी करने के लिए 7,500 रुपये की मांग की थी। बाद में बातचीत के बाद यह मांग 4,000 रुपये तय हुई।
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विजिलेंस ऑर्गनाइजेशन ने एक ट्रैप (जाल) बिछाया, जिसके दौरान आरोपी ने कथित तौर पर रिश्वत के नोट लिए। पैसे उसकी पैंट की पिछली जेब से बरामद किए गए जबकि उसके हाथों और जेब पर किए गए सोडियम कार्बोनेट टेस्ट के नतीजे पॉजिटिव आए, जिससे पता चला कि उसका रिश्वत के नोटों से संपर्क हुआ था।
हाईकोर्ट ने अपील करने वाले की इस दलील को खारिज कर दिया कि अभियोजन पक्ष मुकदमा चलाने की मंजूरी साबित करने में नाकाम रहा। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल के दौरान कोई आपत्ति नहीं उठाई गई थी और न्याय में कोई कमी नहीं पाई गई थी। कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग और उसे लेने की बात साबित करने में नाकाम रहा क्योंकि शैडो गवाह ने शिकायतकर्ता की बात की पूरी तरह पुष्टि नहीं की थी।
कोर्ट ने कहा कि रिश्वत के हर मामले में शिकायतकर्ता के बयान की पुष्टि होना जरूरी नहीं है। कोर्ट ने माना कि अगर शिकायतकर्ता का बयान भरोसेमंद हो और आस-पास की परिस्थितियों से मेल खाता हो, तो उस पर भरोसा किया जा सकता है।
कोर्ट ने अपीलकर्ता को निर्देश दिया कि वह बाकी सजा काटने के लिए तीन हफ्ते के अंदर ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करे, ऐसा न करने पर उसे हिरासत में लेने के लिए सख़्त कदम उठाए जाएंगे।