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Udhampur News: कोकून मंडी में कीमतों का नया इतिहास, छठे दिन 2050 रुपये तक पहुंची बोली
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उधमपुर। सेरिकल्चर विभाग की तरफ से आयोजित कोकून मंडी में कीमतें लगातार नए कीर्तिमान स्थापित कर रही हैं। विभाग की ओर से मुहैया रेशम कीट के अंडे, उपकरणों और सहायता का लाभ साफ दिख रहा है। मंगलवार को जहां अधिकतम बोली 1900, बुधवार को 2010 तो वीरवार को 2050 रुपये प्रति किलो पहुंच गई।
वीरवार को छठे दिन 6683.700 किलोग्राम कोकून की बिक्री हुई, जिससे किसानों ने 33,01,070.65 रुपये का कारोबार किया। 305 किसानों ने भाग लिया, जिनमें 189 पुरुष और 116 महिला शामिल थी। लगातार बढ़ रही कीमतों से किसानों को उनकी मेहनत का बेहतर लाभ मिल रहा है। हालांकि मौसम खराब मौसम के कारण मंडी को निर्धारित समय से पहले स्थगित कर दिया गया।
रेशम कीट वितरण में डिब्बी प्रणाली का महत्व
रेशम कीट पालन के लिए सेरिकल्चर विभाग किसानों को विशेष डिब्बियों में अंडे वितरित करता है। किसानों को उनकी आवश्यकता और पालन क्षमता के आधार पर आधी या पूरी डिब्बी दी जाती है। एक पूरी डिब्बी में लगभग एक औंस रेशम कीट के अंडे होते हैं। इन अंडों का उत्पादन बटोत, लड्डन व अन्य बीज केंद्रों में किया जाता है।
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90 प्रतिशत तक सब्सिडी
जिले में समग्र कृषि विकास कार्यक्रम के तहत सेरीकल्चर में अब तक लगभग 5,000 से अधिक लोगों को लाभ मिल चुका है। इस योजना के तहत किसानों को 300 तक सहतूत के पौधे दिए जाते हैं। सरकार द्वारा प्रति पौधा 70 रुपये की सब्सिडी प्रदान की जाती है। किसानों को कीड़ों की सुरक्षित परवरिश के लिए पालन-पोषण गृह बनाने के लिए 1,75,000 तक की आर्थिक सहायता भी दी जाती है। इसमें 90 प्रतिशत तक सब्सिडी सरकार द्वारा प्रदान की जाती है। साथ ही पालन-पोषण के उपकरण जैसे ट्रे, मेट्स, शेलफ, माइक्रो क्लाइमेट कंट्रोल उपकरण आदि सरकार द्वारा उपलब्ध करवाए जाते हैं।
साल में दो सीजन में रेशम के कीड़ों का पालन
साल में दो सीजन में रेशम के कीड़ों का पालन किया जाता है। मार्च से अप्रैल और अगस्त से सितंबर तक किसान अपने घरों में ही कीड़ों की परवरिश करते हैं। कोकून तैयार होने के बाद इन्हें विभाग के माध्यम से बेचा जाता है।
कोट
मैंने इस बार पहले से अधिक डिब्बी ले ली थी। उत्पादन तो उम्मीद के मुताबिक ज्यादा नहीं हुआ लेकिन कोकून के अच्छे दाम मिलने से काफी राहत मिली है।- शारदा देवी, बडोल।
रेश्म कीट पालन में बहुत मेहनत लगती है। कीड़ों की देखभाल से लेकर कोकून तैयार होने तक लगातार निगरानी रखनी पड़ती है।
- प्रकाश चंद, भुग्तरयान
कई बार इसकी गंध भी सहन करना मुश्किल हो जाती है, यह सिर्फ एक व्यक्ति का काम नहीं है, कीड़ों को दिन में चार बार पत्ते काट कर डालने पड़ते हैं।
- शारदा, कतील गंजू।
उत्पादन सामान्य रहा, लेकिन अच्छी कीमत मिलने से मेहनत का उचित फल मिल रहा है। आने वाले दिनों में कीमतों में और बढ़ने की उम्मीद है।
- हंस राज, भुग्तरयान।
वीरवार को छठे दिन 6683.700 किलोग्राम कोकून की बिक्री हुई, जिससे किसानों ने 33,01,070.65 रुपये का कारोबार किया। 305 किसानों ने भाग लिया, जिनमें 189 पुरुष और 116 महिला शामिल थी। लगातार बढ़ रही कीमतों से किसानों को उनकी मेहनत का बेहतर लाभ मिल रहा है। हालांकि मौसम खराब मौसम के कारण मंडी को निर्धारित समय से पहले स्थगित कर दिया गया।
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रेशम कीट वितरण में डिब्बी प्रणाली का महत्व
रेशम कीट पालन के लिए सेरिकल्चर विभाग किसानों को विशेष डिब्बियों में अंडे वितरित करता है। किसानों को उनकी आवश्यकता और पालन क्षमता के आधार पर आधी या पूरी डिब्बी दी जाती है। एक पूरी डिब्बी में लगभग एक औंस रेशम कीट के अंडे होते हैं। इन अंडों का उत्पादन बटोत, लड्डन व अन्य बीज केंद्रों में किया जाता है।
90 प्रतिशत तक सब्सिडी
जिले में समग्र कृषि विकास कार्यक्रम के तहत सेरीकल्चर में अब तक लगभग 5,000 से अधिक लोगों को लाभ मिल चुका है। इस योजना के तहत किसानों को 300 तक सहतूत के पौधे दिए जाते हैं। सरकार द्वारा प्रति पौधा 70 रुपये की सब्सिडी प्रदान की जाती है। किसानों को कीड़ों की सुरक्षित परवरिश के लिए पालन-पोषण गृह बनाने के लिए 1,75,000 तक की आर्थिक सहायता भी दी जाती है। इसमें 90 प्रतिशत तक सब्सिडी सरकार द्वारा प्रदान की जाती है। साथ ही पालन-पोषण के उपकरण जैसे ट्रे, मेट्स, शेलफ, माइक्रो क्लाइमेट कंट्रोल उपकरण आदि सरकार द्वारा उपलब्ध करवाए जाते हैं।
साल में दो सीजन में रेशम के कीड़ों का पालन
साल में दो सीजन में रेशम के कीड़ों का पालन किया जाता है। मार्च से अप्रैल और अगस्त से सितंबर तक किसान अपने घरों में ही कीड़ों की परवरिश करते हैं। कोकून तैयार होने के बाद इन्हें विभाग के माध्यम से बेचा जाता है।
कोट
मैंने इस बार पहले से अधिक डिब्बी ले ली थी। उत्पादन तो उम्मीद के मुताबिक ज्यादा नहीं हुआ लेकिन कोकून के अच्छे दाम मिलने से काफी राहत मिली है।- शारदा देवी, बडोल।
रेश्म कीट पालन में बहुत मेहनत लगती है। कीड़ों की देखभाल से लेकर कोकून तैयार होने तक लगातार निगरानी रखनी पड़ती है।
- प्रकाश चंद, भुग्तरयान
कई बार इसकी गंध भी सहन करना मुश्किल हो जाती है, यह सिर्फ एक व्यक्ति का काम नहीं है, कीड़ों को दिन में चार बार पत्ते काट कर डालने पड़ते हैं।
- शारदा, कतील गंजू।
उत्पादन सामान्य रहा, लेकिन अच्छी कीमत मिलने से मेहनत का उचित फल मिल रहा है। आने वाले दिनों में कीमतों में और बढ़ने की उम्मीद है।
- हंस राज, भुग्तरयान।