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जिज्ञासा से शुरू हुई नशे की लत ले जा रही अपराध तक: घर-हॉस्टल से फैल रहा जहर, नशा छीन रहा युवाओं का भविष्य

अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू Published by: Nikita Gupta Updated Mon, 13 Apr 2026 12:35 PM IST
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सार

जम्मू-कश्मीर में नशा एक गंभीर समस्या बनता जा रहा है जहां जिज्ञासा से शुरू हुई ड्रग्स की लत युवाओं को अपराध और विनाश की ओर धकेल रही है। जम्मू के नशा मुक्ति केंद्र के अनुसार 2013 से 2025 के बीच 18,312 युवा ओपीडी में पहुंचे।

In the peaceful valleys of Jammu and Kashmir, drugs have become a silent disaster which is proving to be more
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Adobe Stock
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विस्तार

जम्मू-कश्मीर की शांत वादियों में ड्रग एक ऐसी खामोश आपदा बन चुका है जो आतंकवाद से भी घातक साबित हो रहा है। अमर उजाला की पड़ताल में सामने आया कि घर, हॉस्टल और दोस्तों के बीच पनप रहा यह जहर प्रदेश की युवा पीढ़ी को भीतर से खोखला कर रहा है।

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जम्मू में पुलिस की ओर से संचालित नशा मुक्ति केंद्र के आंकड़े इस भयावह स्थिति की पुष्टि करते हैं। अप्रैल 2013 से दिसंबर 2025 के बीच यहां 18,312 युवा ओपीडी में पहुंचे जो नशे की गंभीर गिरफ्त को दर्शाता है। पढ़ाई के लिए बाहर जाने वाले छात्र हों या स्थानीय युवा जिज्ञासा और मजाक से शुरू होने वाले ड्रग के सेवन का सफर अक्सर उन्हें अपराध और जेल की दहलीज तक ले जाता है।
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पढ़ाई के नाम पर प्रदेश से बाहर जाने वाले सहित प्रदेश के ही हर साल हजारों युवा नशे के इस दलदल में फंस रहे हैं। कई युवा अपनी मां की जमापूंजी और अपना भविष्य इस दलदल में स्वाहा कर चुके हैं। हालांकि, नशा मुक्ति केंद्रों की मदद से कुछ युवा संभल रहे हैं लेकिन कई के लिए यह अंधेरा जानलेवा साबित हो रहा है। अमर उजाला टीम ने जम्मू में पुलिस के नशा केंद्र में जाकर ऐसे युवाओं की आपबीती सुनी जो नशे के जाल में तरह फंसे हुए हैं। नशे की वजह से उन्होंने क्या खोया.. हर कहानी होश उड़ा देने वाली है।

केस 1
पढ़ाई के लिए पंजाब गए, मां की मेहनत की कमाई उड़ा दी थी नशे में
नशा मुक्ति केंद्र में भर्ती बिश्नाह के आहन (बदला हुआ नाम) ने बताया कि वह पढ़ाई के लिए पंजाब गया था। वहां हॉस्टल में कुछ ऐसे युवकों से दोस्ती हो गई जिन्होंने मुझे नशे की अंधी खाई में धकेल दिया। शुरुआत दोस्तों के साथ मजाक से हुई जो जल्द ही जानलेवा लत बन गई। पिता के साये के बिना मां ने मेहनत की गाढ़ी कमाई मेरी पढ़ाई के लिए भेजी लेकिन मैंने वह सब नशे में उड़ा दिया।

शुरुआत में दो-तीन बार मुफ्त में ड्रग मिला लेकिन बाद में उससे पैसे मांगे जाने लगे। जब पैसे कम पड़े तो मैं अपराधी गैंग में शामिल हो गया और जेल की हवा भी खाई। जम्मू लौटा तो नशे की तलब में शरीर टूटने लगा और बेचैनी ने फिर से अपराध की राह पर डाल दिया। आखिरकार, रिश्तेदारों के सहयोग से मैं नशा मुक्ति केंद्र पहुंचा हूं। आज मुझे एहसास है कि मैंने अपनी मां का भरोसा तोड़ा है। अब मैं इस नर्क से निकलकर एक नई और बेहतर शुरुआत करना चाहता हूं।

चौंकाने वाले हैं ये आंकड़े :
जम्मू स्थित पुलिस नशा मुक्ति केंद्र में बीते वर्षों के नशे की बढ़ती चुनौती को साफ दिखाते हैं। यहां अप्रैल 2013 से दिसंबर 2025 तक 18,312 ओपीडी में पहुंचे। 2,226 को भर्ती किया गया। 2013 में ओपीडी में 510 मरीज आए जो 2017 में बढ़कर 3,460 तक पहुंच गए। इसके बाद भी हर साल संख्या बढ़ती रही। भर्ती मरीजों की संख्या में भी लगातार इजाफा होता रहा। वर्ष 2016 में जहां केवल 2 मरीज भर्ती हुए थे वहीं 2017 में यह संख्या 296 तक पहुंच गई। 2025 में 311 मरीजों को में भर्ती किया गया जो अब तक का सबसे अधिक है।

केस 2
गलत संगत ने जिंदगी नरक में धकेली, कॉलेज के चार साल में 22 लाख उड़ा दिए नशे में

भद्रवाह के प्रांजल (काल्पनिक नाम) ने बताया कि वह हिमाचल प्रदेश में बी-फार्मेसी की पढ़ाई करने गया था। वहां कॉलेज और हॉस्टल में कुछ ऐसे छात्रों से दोस्ती हो गई जो पहले से नशा करते थे। गलत संगत ने मेरी जिंदगी नरक में धकेली दी। दोस्तों ने पढ़ाई का तनाव कम होगा कहकर नशे की शुरुआत कराई जो धीरे-धीरे एक भयानक लत बन गई। फिर वही दोस्त ड्रग देने से मना करने लगे। साल 2019 से 2022 के बीच नशे की भूख मिटाने के लिए करीब 22 लाख रुपये लुटा दिए।

पढ़ाई के लिए मां का एटीएम कार्ड मेरे पास था मैंने उसकी पूरी जमापूंजी नशे में फूंक दी। नतीजा यह हुआ कि फीस न भरने के कारण मेरी डिग्री रोक दी गई और कॉलेज प्रबंधन के जरिए घर वालों को मेरी सच्चाई पता चली। 15 दिसंबर 2025 की रात रूह कंपा देने वाली थी। नशे की हालत में मैं बेसुध था और ब्लोअर हीटर से आग लगने ही वाली थी। परिवार ने समय रहते बचा लिया। अगले दिन होश आने पर अपनी बर्बादी का अहसास हुआ। अब मैं नशा मुक्ति केंद्र में हूं और बिखरी जिंदगी संवारने की कोशिश कर रहा हूं।

पुलिस नशा केंद्र 2011 में के रूप में शुरू हुआ था। 2013 के बाद ओपीडी और सेवाएं दी जा रही हैं। पहले ये केंद्र गुलशन ग्राउंड था, दो साल पहले छन्नी में शिफ्ट हुआ है। यहां 25 बेड की सुविधा हैं। ओपीडी में मरीजों को लगातार फालोअप लिया जाता है। यहां एक महीने के लिए भर्ती किया जाता है। नशा से बाहर निकले में दवाइयों का योगदान 40 से 50 फीसदी रहता है। इसमें उनकी भूख, नींद और कमजोरी को दूर करते हैं। इसके बाद उसे पूरी तरह ठीक करने के लिए अन्य चीजों की जरूरत होती है। एक महीने में उसके हर पहलू को जानते हैं क वह नशे के दलदल में कैसे फंसा और कैसे बाहर आ सकता है। - गुलनाज चौधरी, मेडिकल ऑफिसर, पुलिस नशा मुक्ति केंद्र जम्मू

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