Jammu: नावलेकर समिति के सामने छलका कश्मीरी पंडितों का दर्द, कहा- हम माइग्रेंट नहीं, कश्मीर से जबरन विस्थापित
समिति के समक्ष कश्मीरी पंड़ितों ने कहा कि उन्हें ‘माइग्रेंट’ कहना उनकी त्रासदी की वास्तविकता को छोटा करता है। वे रोजगार या बेहतर जीवन की तलाश में जम्मू नहीं आए, बल्कि आतंक, लक्षित हत्याओं, धमकियों और उत्पीड़न के बीच जान बचाकर अपने पुश्तैनी घर छोड़ने को मजबूर हुए।
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प्रवासी शिविर जगती का माहौल मंगलवार को बदला-बदला नजर आया। गुस्सा सिस्टम पर था, गम अपने मूल से बिछुड़ने का और एक उल्लास भी कि नावलेकर समिति दर्द जानने आई है। अपनापन जताने आई है। समिति ने भी पूरी आत्मीयता से उनकी बातों को सुना और कश्मीरी पंड़ितों ने जीभर सुनाया भी। समिति के समक्ष कश्मीरी पंड़ितों ने कहा कि उन्हें ‘माइग्रेंट’ कहना उनकी त्रासदी की वास्तविकता को छोटा करता है। वे रोजगार या बेहतर जीवन की तलाश में जम्मू नहीं आए, बल्कि आतंक, लक्षित हत्याओं, धमकियों और उत्पीड़न के बीच जान बचाकर अपने पुश्तैनी घर छोड़ने को मजबूर हुए। अब समुदाय ने राहत और अस्थायी पुनर्वास से आगे बढ़कर न्याय, सुरक्षा, सम्मान और स्थायी राजनीतिक समाधान की मांग उठाई है।
जनसांख्यिकीय बदलाव की जांच करने सोमवार को यहां पहुंची नावलेकर समिति बुधवार को भी प्रदेश में रहेगी। कश्मीर के कुछ हिस्सों का हाल जानने जा सकती है। यहां से पंजाब, उत्तर प्रदेश और फिर उत्तराखंड जाएगी। इन तीनों प्रदेशों में भी बड़ी संख्या में जनसांख्यिकीय बदलाव की बात सामने आ रही है।
जगती जेनोसाइड विक्टिम्स एंड सर्वाइवर्स कॉलोनी ने समिति को 13 सूत्री ज्ञापन सौंपकर 1989-90 में कश्मीरी पंडितों के साथ हुई हिंसा और जबरन विस्थापन की औपचारिक मान्यता देने की मांग की। प्रवासियों की तरफ से पनुन कश्मीर संगठन के विधिक सलाहकार एडवोकेट विश्व रंजन पंडिता ने उनकी बातों को समिति के समक्ष रखा।
उन्होंने कहा कि जेनोसाइड (नरसंहार) बिल अथवा समान व्यापक कानूनी व्यवस्था बनाई जाए। विस्थापित समुदाय के लिए जम्मू-कश्मीर में अलग, सुरक्षित और संरक्षित होमलैंड स्थापित करने की मांग को स्थायी समाधान बताया गया। उन्होंने दोहराया कि कश्मीरी पंडित विस्थापित नहीं बल्कि निष्कासित हैं।
राहत नहीं, अधिकार और सम्मान चाहिए
समिति से बातचीत में पनुन कश्मीर ने कहा कि 35 वर्ष से अधिक समय से विस्थापित परिवारों का जीवन शिविरों, कॉलोनियों और किराये के मकानों तक सीमित है। मौजूदा 3250 रुपये मासिक नकद राहत को महंगाई के अनुरूप बढ़ाने और भविष्य में इसे लागत-ए-जीवन सूचकांक से जोड़ने की मांग की। राहत कोई स्थायी समाधान नहीं, बल्कि लंबे विस्थापन के दौरान राज्य की अंतरिम जिम्मेदारी है। 1991 के मार्गदर्शन प्रस्ताव का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें कश्मीरी हिंदुओं की सम्मानजनक वापसी और पुनर्वास के राजनीतिक ढांचे के साथ घाटी में संविधान के तहत अलग मातृभूमि की मांग रखी गई थी, जिसमें जीवन, स्वतंत्रता, आस्था, समानता और कानून के शासन की गारंटी शामिल थी। इसपर अभी तक हमें कुछ नहीं मिला।
20 हजार सरकारी नौकरी और 3-बीएचके मकान दें
विस्थापन के कारण रोजगार के अवसर गंवा चुके युवाओं के लिए केंद्र सरकार से कम से कम 15 हजार और जम्मू-कश्मीर प्रशासन से पांच हजार अतिरिक्त सरकारी नौकरियों की बात रखी गई। उम्र सीमा में विशेष छूट, योग्यता में आवश्यक राहत और अधिक उम्र पार कर चुके युवाओं के लिए एकमुश्त मुआवजा व पुनर्वास पैकेज की बात भी उठाई गई।
जगती व अन्य विस्थापित कॉलोनियों में परिवारों के बढ़ते आकार और जर्जर आवासों को देखते हुए पात्र परिवारों के लिए नए 3-बीएचके मकान बनाने की मांग की गई। किराये पर रह रहे विस्थापित परिवारों के लिए जम्मू में कम से कम एक हजार फ्लैट बनाने का प्रस्ताव भी रखा गया।
घाटी में वापसी संग न्याय, सुरक्षा, सम्मान और संपत्ति भी मिले
कश्मीरी पंडित विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षण संस्थानों में विशेष प्रवेश प्रावधान, छात्रवृत्ति और फीस में रियायत, पीएम पैकेज कर्मचारियों के लिए समान सेवा सुविधाएं तथा विस्थापित परिवारों की संपत्तियों, मंदिरों और सांस्कृतिक संस्थानों के संरक्षण व पुनर्स्थापन के लिए व्यापक व्यवस्था की मांग की गई।
जगती को सिर्फ कॉलोनी नहीं, विस्थापन की पीड़ा के रूप में देखें
एडवोकेट विश्व रंजन पंडिता ने समिति को बताया कि प्रवासी शिविर जगती का दौरा केवल कॉलोनी के निरीक्षण तक सीमित न रहे। यहां की अधूरी सुविधाओं और जर्जर ढांचे के पीछे उस बड़े मानवीय संकट को देखा जाए, जिसमें एक समुदाय अपने घर से उजड़कर दशकों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहा है। केंद्र सरकार तक जगती की आवाज पहुंचनी चाहिए। राहत न्याय का विकल्प नहीं हो सकती, पुनर्वास संपत्ति की पुनर्बहाली का विकल्प नहीं हो सकता और कल्याणकारी योजनाएं औपचारिक पहचान का विकल्प नहीं हो सकतीं। 36 वर्ष बाद कश्मीरी हिंदुओं के सवाल के समाधान के लिए कानून, न्याय, गरिमा और सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण पर आधारित व्यापक राष्ट्रीय नीति की जरूरत है।